ऐसा कितनी बार हुआ है कि पीरियड के पेन से लेकर बैक पेन और किसी अन्य तरह की चोट के दर्द के लिए आपने हॉट वाटर बैग का इस्तेमाल किया हो? अक्सर हर घर में हॉट वाटर बैग्स तो मिल जाते हैं, लेकिन हम ये ध्यान नहीं देते कि किस तरह की चोट या दर्द के लिए बर्फ से सिकाई बेहतर होगी और किसके लिए हॉट वाटर बैग से सिकाई करनी होगी। जिन्हें मसल पेन रहता है उनके लिए तो ये बहुत बड़ी समस्या हो सकती है क्योंकि सिकाई करते वक्त अगर उन्होंने गलती की तो उनकी समस्या और बढ़ सकती है।

आपने देखा होगा कि दांत के दर्द में बर्फ से सिकाई की जाती है और पीरियड पेन में हॉट वाटर बैग राहत देता है, लेकिन इसके अलावा सिकाई के क्या नियम हैं ये जानने के लिए हमने मंडल रेल हॉस्पिटल भोपाल में कार्यरत फिजियोथेरेपिस्ट डॉक्टर समर्थ सूर्यवंशी से बात की। उन्होंने हमें इससे जुड़े कई नियम बताए जो दर्द में राहत देने में मदद कर सकते हैं।

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सिकाई करने के नियम-

मुख्य तौर पर ठंडी सिकाई या गरम सिकाई करने के तीन अहम नियम होते हैं और उन्हीं के आधार पर हमें ये तय करना होता है कि कैसी सिकाई करनी है।

1. चोट कब लगी है/ दर्द कितना पुराना है
2. सूजन कितनी है
3. चोट वाली जगह का तापमान क्या है (याही स्किन जल रही है या फिर ठंडी पड़ गई है)

कब की जाती है बर्फ से सिकाई-

थंब रूल ये कहता है कि चोट लगने के तुरंत बाद हमें बर्फ की सिकाई करनी चाहिए और ये दो दिनों तक की जा सकती है। जितनी देर तक आप इसे सहन कर सकें उतनी ही देर करें जैसे 15 सेकंड, 20 सेकंड या 40 सेकंड बाद एक स्थान से आइस पैक को हटाकर दूसरे स्थान पर रख दें। ऐसा कम से कम 10 से 15 मिनट करें।

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अगर आप सूजन के हिसाब से देख रहे हैं तो पहले ये भी देखें कि सूजन किस कारण है और अगर 2 दिन से ज्यादा हो गए हैं तो गरम सिकाई करें। वैसे यहां पर चोट वाली जगह का तापमान देखना भी जरूरी है। अगर सूजन के साथ जलन भी है तो गरम सिकाई न करें। आप अपनी उंगलियों के जरिए ये चेक कर सकते हैं कि जिस जगह चोट लगी है वो ठंडी है या गरम उसी हिसाब से आइस पैक और हॉट वाटर बैग का इस्तेमाल करें। दांत के दर्द और चेहरे की सूजन में भी ठंडी सिकाई की सलाह दी जाती है।

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कब की जाती है गरम सिकाई-

गरम सिकाई मुख्यता मसल्स की एक खास कंडीशन में रिकमेंड की जाती है इसे मस्कुलर स्केलेटल कंडीशन कहते हैं। इसमें कंधे का दर्द, कमर दर्द, गर्दन दर्द, घुटने का दर्द, एड़ी का दर्द आदि शामिल हैं। गरम सिकाई से ब्लड सर्कुलेशन में बदलाव होते हैं और इससे कई तरह के फिजिकल चेंज हो सकते हैं। ऐसे में ही दर्द कम होता है।

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डीप वेन थ्रांबोसिस, रेनोड डिजीज, पुराने जख्म आदि में ठंडी सिकाई नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ अगर आपको ठंडक सहन नहीं होती जैसे साइनस वगैरह में भी ठंडी सिकाई नहीं करनी चाहिए।

दोनों तरह की सिकाई करते समय रखें सावधानी-

दोनों ही सिकाइयों में जलने की संभावना बनी रहती है। ठंडी के कारण फ्रॉस्ट बाइट और स्किन रैश हो सकते हैं और गर्म सिकाई से छाले पड़ सकते हैं और स्किन बर्न हो सकती है। अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है या फिर किसी तरह का सेंसरी लॉस है तो प्रोफेशनल सलाह लेने के बाद ही खुद से सिकाई करें।

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