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मेनोपॉज के दौरान एस्‍ट्रोजन लेवल गिरने से बढ़ता है इस बीमारी का खतरा

मेनोपॉज के दौरान महिलाओं का एस्ट्रोजन लेवल गिर जाता है जिससे ओस्टियोब्लास्ट सेल्‍स प्रभावित होती हैं। इससे पुरुषों की तुलना में महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।
Updated:- 2018-08-27, 16:48 IST
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महिलाओं की लाइफ में पीरियड्स और फिजिकल बदलाव होना बहुत महत्‍वपूर्ण है। जी हां एक महिला के लिए जितने जरूरी पीरियड्स है उतना ही उसकी लाइफ में मेनोपॉज भी अहम है। इससे महिला को पीरियड्स  के दौरान के दर्द, मूड बदलाव और सिरदर्द जैसे लक्षणों से छुटकारा मिलता है। दुनियाभर में, आमतौर पर महिलाओं की मेनोपॉज की उम्र 45 से 55 होती है। लेकिन हाल ही में 'द इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकनोमिक चेंज' के सर्वे से पता चला है कि करीब चार फीसदी महिलाओं को मेनोपॉज 29 से 34 साल की उम्र में हो जाता है, वही लाइफस्‍टाइल में बदलाव के चलते 35 से 39 साल के बीच की महिलाओं का आंकड़ा आठ फीसदी है।

मेनोपॉज और ऑस्टियोपोरोसिस के बीच के संबंध को बताते हुए वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ओथोर्पेडिक्स के एसोसियेट प्रोफेसर व जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉक्‍टर जतिन तलवार ने कहा, एस्ट्रोजन हार्मोन पुरुषों व महिलाओं दोनों में पाया जाता है और यह हड्डियों को बनाने वाले ओस्टियोब्लास्ट सेल्‍स की एक्टिविटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेनोपॉज के दौरान महिलाओं का एस्ट्रोजन लेवल गिर जाता है जिससे ओस्टियोब्लास्ट सेल्‍स प्रभावित होती हैं। इससे पुरुषों की तुलना में महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं।

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मेनोपॉज के बाद बढ़ जाती है हड्डियों की बीमारी

उन्होंने कहा, कम एस्ट्रोजन से बॉडी में कैल्शियम सोखने की क्षमता कम हो जाती है और परिणामस्वरूप हड्डियों का घनत्व गिरने लगता है। इससे महिलाओं को ओस्टियोपोरिसस और ओस्टियोआर्थराइटिस (ओए) जैसी हड्डियों से जुड़ी बीमारियां होने का रिस्क बढ़ जाता है।

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ओस्टियोआर्थराइटिस बीमारी

डॉक्‍टर जतिन तलवार ने कहा, दरअसल ओस्टियोआर्थराइटिस बीमारी नहीं है बल्कि यह उम्र के साथ जोड़ों में होने वाले घिसाव से जुड़ी स्थिति है। गौरतलब है कि प्रत्येक मनुष्य अपनी जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर इस स्थिति को महसूस करता है, मुमकिन है कि यह स्थिति किसी के साथ ज्यादा तो किसी के साथ कम हो सकती है। हालांकि अगर जोड़ों में घिसाव ज्यादा हो जाए तो यह किसी भी व्यक्ति की लाइफ को प्रभावित कर सकती है और आखिरी स्टेज पर तो जोड़ों की क्रियाशीलता भी बहुत ज्यादा प्रभावित होती है।

 

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा होता है ओस्टियोआर्थराइटिस

विभिन्न अनुसंधानों से पता चला है कि ओस्टियोआर्थराइटिस पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा होता है और मेनोपॉज के बाद हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी लेने के बावजूद इसका रिस्क ज्यादा बढ़ जाता है। हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी में नेचुरल रूप से खत्म होते एस्ट्रोजन की कमी को दवाइयों के सहारे पूरा किया जाता है।

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डॉक्‍टर तलवार कहते हैं, गंभीर आर्थराइटिस में रोगी के लिए चलना फिरना मुश्किल हो जाता है और तेज दर्द रहता है। इससे मरीज की जिंदगी बहुत ज्यादा प्रभावित होती है, ऐसे में क्षतिग्रस्त जोड़ों को बदलना ही बेहतर विकल्प रहता है। जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी में जोड़ के खराब भाग को हटाकर उस पर कृत्रिम इंप्लांट लगाया जाता है। नए इंप्लांट की मदद से दर्द में आराम मिलता है और जोड़ों की कार्यक्षमता सुचारू रूप से होती है।

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जर्मनी की ब्रीमन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित स्टडी में पाया गया कि घुटनों में ओस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित जिन लोगों ने टोटल नी रिप्लेसमेंट (टीकेआर) कराया है, उन्होंने सर्जरी कराने के बाद सालभर में खुद को ज्यादा एक्टिव महसूस किया है। टीकेआर के बाद ज्यादातर मरीज शारीरिक रूप से ज्यादा एक्टिव हुए हैं।

 

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