भारत में होने वाले आर्थराइटिस के मामलोँ में से ऑस्टियोआर्थराइटिस भी एक है, जो कि एक musculoskeletal disorder है। यह जोड़ों में लगातार कार्टिलेज की कमी के कारण होता है। कार्टिलेज की कमी हड्डियोँ में घर्षण के कारण होती है, जिसकी वजह से घुटनोँ, हिप्स, हाथोँ, पैरोँ और रीढ़ की हड्डी में अकडन होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्युएचओ) के अनुसार, 60 साल से अधिक उम्र के 10 प्रतिशत पुरुषोँ और 18 प्रतिशत महिलाओँ में इस बीमारी के लक्षण हैं, इससे पीड़ि‍त 80 प्रतिशत लोगोँ की सक्रियता कम हो जाती है, और 25 प्रतिशत लोगोँ के लिए अपने रेगुलर काम कर पाना भी कठिन हो जाता है।

नई दिल्ली के वसंत कुंज के इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के कंसल्टेंट जॉइंट रिप्लेसमेंट एंड ऑर्थ्रोस्कोपी डॉक्‍टर विवेक महाजन के अनुसार, 'लगभग 40 प्रतिशत के अनुमानित प्रसार के साथ ऑस्टियोऑर्थराइटिस सबसे बडी rheumatologic problem में से एक है। एक प्रोग्रेसिव डिजीज होने के कारण यह लोगोँ में उम्र बढने के साथ विकसित होती रहती है और महिलाओँ व पुरुषोँ दोनों को प्रभावित करती है। हालांकि महिलाओँ को यह समस्या होने की आशंका अधिक रहती है। 65 साल से कम उम्र की 45 प्रतिशत और इससे अधिक उम्र की करीब 70 प्रतिशत महिलाओँ में बीमारी का असर देखने को मिलता है।' यानी ऑस्टियोऑर्थराइटिस दूसरी सबसे आम rheumatologic problem है और यह भारतीयोँ में जोडोँ में होने वाली सबसे आम समया है जिसका प्रसार स्तर 22 से 39 प्रतिशत है!
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महिलाओँ को क्योँ रहता है अधिक खतरा?

ऐसे तो यह समस्या महिलाओँ व पुरुषोँ दोनो को प्रभावित करती है, लेकिन महिलाओँ में इसके विकसित होने का खतरा अधिक रहता है, खासतौर से menopause के बाद की आयु में, जब महिलाओँ में बीमारी तेजी से विकसित होती है। अध्ययन बताते है कि घुटनोँ और हाथोँ को पप्रभावित करने वाले ऑस्टियोऑर्थराइटिस के मामले पुरुषोँ के मुकाबले महिलाओँ मे ज्यादा आम हैं। ऑस्टियोऑर्थराइटिस, जो कि जोड़ों की एक समस्या है, महिलाओँ को menopause के बाद अधिक प्रभावित इसलिए करती है क्योंकि इस दौरान महिलाओँ में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, जिससे हड्डियोँ की समस्या को बढावा मिलता है। बीएमडी में कमी का स्तर 4 प्रतिशत से 5.7 प्रतिशत महिलाओँ में देखा जाता है।

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हाई-हील के फुटवियर पहनना

हाई-हील के फुटवियर इस तरह से डिजाइन किए गए होते हैं कि इन्हे पहनने वाले के शरीर का सारा भार पैर के अगले हिस्से पर आ जाता है। सही ढंग से और सीधे खडे रहने के लिए और संतुलन बनाए रखने के लिए व्यक्ति को अपन घुटनोँ और हिप पर अधिक दबाव बनाना पडता है, ऐसे में पीछे की ओर खिंचाव महसूस होता है। इन जोडोँ पर लम्बे समय तक दबाव पडने से thigh और calf muscles में जकडन आ जाती है, जिससे एचिल्स टेंडन डीजनरेशन  और घुटने में आर्थराइटिस की समस्या होने लगती है।

नियमित रूप से हाई हील्स पहनने की वजह से टखने के मसल्स और tendons छोटे होते रहते हैं और अकड़ जाते हैं। इसके साथ ही, ऐसे लोगोँ के घुटने भी ऊपर की तरह उठी हुई पोजिशन में रहते हैं। ये मसल tendons काफ मसल के साथ जुडे होते है और इन मसल्स का छोटापन और इनमे जकडन Achilles tendinosis की समस्या उत्पन्न करता है। इस समस्या में पैरोँ को सीधा करने में दर्द और चलने में कठिनाई व दर्द महसूस होता है। काफ मसल की यह समस्या आगे चलकर पैरोँ के टिश्यू की अन्य दिक्कतोँ का कारण बनती है।
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हाई हील्स का असर घुटनोँ पर भी पडता है, जो बॉडी को संतुलन बनाए रखने और सही ढंग से खडे होने में मदद करता है। आगे झुके रहने की वजह से इस पर अतिरिक्त प्रेशर पडता है। यह साबित हो चुका है कि घुटनोँ में आर्थराइटिस का यह एक आम कारण है। हिप्स पर लगातार दबाव पडने से कूल्होँ में और इसके आस-पास के अंगोँ में दर्द महसूस होता है जिनमेँ जांघोँ के बीच का हिस्सा, buttocks और ग्रोइन शामिल है।
 
यह फोरफुट ओवरलोड व अन्य कई समस्याओँ का कारण भी बनता है। फोरफुट ओवरलोड में पैर के अगले हिस्से में दर्द होता है और कॉर्न्स एंड कॉलस में तलवोँ की त्वचा मोटी और सख्त हो जाती है जिसमेँ दर्द होता है। पैरोँ के अगले हिस्से पर दबाव की वजह से हैलक्स वॉल्गस भी हो सकता है, यह स्थिति आगे चलकर पैर के अंगूठे में डिफॉर्मिटी का कारण बन सकती है और पैर के अगल बगल के हिस्से के सॉफ्ट टिश्यु और हड्डियोँ में भी समस्या हो सकती है।

अधिक वजन

एक तरह हड्डियां का घनत्व कम होना और दूसरी तरफ वजन बढना, ये दोनो ही कारण मिलकर महिलाओँ के लिए दोहरी चुनौती खडी करते हैं। वजन अधिक होने से न सिर्फ आपके जोडोँ पर अधिक वजन पडता है बल्कि इससे घुटने और हिप के जोडोँ पर दबाव भी बढता है, जो आपके शरीर का भार उठाते हैं।
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बचाव के उपायोँ को अपनाना है जरूरी

बचाव और प्रभावी प्रबन्धन से यह बीमारी नियंत्रण में आ सकती है। ऐसे में न सिर्फ बचाव के उपायोँ बल्कि समस्या बढने से रोकने के उपायोँ के बारे में जागरूकता भी जरूरी है। ये उपाय निम्नलिखित हैं:

अपनी जीवनशैली में लाएं बदलाव: लो-इम्पैक्ट एक्सरसाइज को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। अगर आप को समस्या हो गई है तो हेवी एक्सरसाइज से बचेँ, घुटने टेककर न बैठेँ, कोई भारी चीज न उठाएं।
हेल्‍दी वजन बरकरार रखेँ: शारीरिक सक्रियता के साथ अच्छा आहार लेकर आप अपने वजन को हेल्‍दी दायरे में रख सकती हैं।
अपनी बॉंडी को भरपूर आराम देँ: आराम करने से आपके जोडोँ को तनाव से राहत मिलती है और स्वस्थ जीवन जीने एवं तनाव मुक्त रहने के लिए भरपूर आराम बेहद जरूरी है।
संतुलित आहार और ब्लड शुगर पर नियंत्रण: कैल्शियम, प्रोटीन, मैग्नीशियम और विटामिन डी से भरपूर आहार लेकर आप बीमारी के प्रसार को डिले किया जा सकता है। इसके साथ ही अपना ब्लड शुगर नियंत्रण में रखना भी जरूरी है क्योंकि हाई ग्लूकोज स्तर ऐसे मॉलिक्यूल्स के विकास में मदद्गार होता है जो कार्टिलेज को सख्त बनाते हैं।
हाई हील्स से बचेँ:  जैसा कि पहले चर्चा अर चुके हैं,हाई हील्स पहनने से जहां तक हो सके बचेँ।

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