मैगी एक ऐसी चीज़ है जिसे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई खाना पसंद करता है। शायद ऐसा इसलिए भी है क्‍योंकि खाने में टेस्‍टी होने के साथ-साथ इसे बनाना भी बेहद आसान होता है। लेकिन सबकी फेवरेट मैगी एक बार फिर चर्चा में आ गई है और इसको लेकर फिर से विवाद छिड़ गया है। लेकिन इस बार किसी फूड डिपार्टमेंट या सरकार ने नहीं, बल्कि खुद नेस्ले ने माना है कि मैगी समेत उसके 60 फीसदी फूड प्रोडक्ट्स और ड्रिंक्स हेल्‍दी नहीं है। कंपनी के अनुसार, वह अपने प्रोडक्ट्स में न्यूट्रिशनल वैल्यू की जांच कर रही है। यह हेल्‍थ से जुड़ा मामला है और इसलिए प्रोडक्ट को टेस्टी और हेल्‍दी बनाने की कोशिश की जा रही है।

यूके बिजनेस डेली फाइनेंशियल टाइम्स में नेस्ले की एक रिपोर्ट छपी है। रिपोर्ट के अनुसार नेस्ले के 37 प्रतिशत प्रोडक्ट 3.5 है। यह रेटिंग ऑस्ट्रेलिया की हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम से जारी हुआ है। इस सिस्टम के अनुसार, प्रोडक्ट्स को रेटिंग 1 से 5 तक दी जाती है। कंपनी के सभी फूड प्रोडक्ट्स और ड्रिंक्स में 70 प्रतिशत मानकों को पूरा नहीं करते हैं। जबकि शुद्ध काफी को छोड़कर 90 प्रतिशत बिवरेज हेल्थ के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। 

ऐसे में हर मां के मन में यही सवाल आता है कि मैगी जैसे मैदे वाले प्रोडक्‍ट्स खाने से बच्‍चों को किस तरह के नुकसान हो सकते है और बच्‍चों को इसकी जगह वह क्‍या खिला सकती हैं? ताकि उनकी हेल्‍थ को किसी तरह का कोई नुकसान न हो। अगर आपके मन में भी ऐसे ही सवाल हैं तो इस आर्टिकल को जरूर पढ़ें। फैट टू स्लिम ग्रुप की सेलिब्रिटी इंटरनेशनल डाइटीशियन और न्यूट्रिशनिष्ट शिखा ए शर्मा जी हमें इससे जुड़ी जानकारी दे रही हैं।

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बच्‍चों को बनाता है मोटा

शिखा ए शर्मा जी का कहना है, ''जब बच्‍चा 5 साल का होता है तो उसकी बॉडी में फैट सेल्‍स आने शुरू हो जाते हैं। अगर वह मैदे से बने फूड्स खाएगा तो मोटापा बढ़ाने का खतरा 98 प्रतिशत ज्‍यादा हो जाता है। आजकल के बच्‍चे के मैदा बहुत ज्‍यादा खाते हैं इसलिए वह बहुत ज्‍यादा मोटापे के शिकार हो रहे हैं।''

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बच्‍चों की लंबाई कम बढ़ती है

जो बच्‍चे बहुत ज्‍यादा मैदे से भरपूर फूड का सेवन करते हैं उन बच्‍चों की हाइट ज्‍यादा बढ़ती नहीं है। ऐसा इसलिए होती है क्‍योंकि इसमें सेचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत ज्‍यादा होती है।

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इम्‍यूनिटी होती है कमजोर

कुछ पेरेंट्स अपने बच्‍चों को खुद ही बर्गर, मैगी, पिज्‍जा, न्‍यूडल्‍स आदि बनाकर देते हैं। लेकिन वह इस बात को नहीं समझते हैं कि इन सभी चीजों को खाने से उन्‍हें पोषक तत्‍व नहीं मिल पाते हैं जिससे चलते उनकी इम्‍यूनिटी कमजोर हो जाती है। इसके कारण छोटी उम्र में ही बच्‍चों को डायबिटीज, थायरॉयड आदि समस्‍याएं होने लगती हैं। इसके अलावा लड़कियों को पीरियड्स से जुड़ी समस्‍याएं होने लगती हैं। इसलिए अपने बच्‍चों को हेल्‍दी डाइट दें।

पेट की समस्‍याएं

इसमें फाइबर की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए जब कोई मैदे से बनी सामग्री का सेवन करता है तो ये पूरी तरह से पच नहीं पाता है। सही से डाइजेशन न हो पाने के कारण इसका कुछ हिस्सा आंतों में ही चिपक जाता है और कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकता है। इससे बच्‍चों को अक्सर कब्ज की समस्या हो जाती है।

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बच्‍चों की डाइट

शिखा ए शर्मा जी का कहना है कि ''बच्‍चों को मैदे की जगह दूध, पनीर, दही, मौसमी हरी सब्जियां, फलों का जूस, घर की बनी रोटी, दाल, चावल, नट्स आदि देने चाहिए क्‍योंकि यह बच्‍चों की हेल्‍थ के लिए जरूरी होते हैं और इसमें विटामिन्‍स के साथ-साथ कई तरह के पोषक तत्‍व मौजूद होते हैं। बटर की जगह देसी घी देना चाहिए। बच्‍चों को मैदे से बने स्‍नैक्‍स की जगह मखाने, रोस्‍टेड चना और नट्स आदि देना चाहिए। बच्‍चों को चॉकलेट वाले दूध की जगह हल्‍दी वाला दूध देना चाहिए। ऑलिव ऑयल की जगह सरसों का तेल और देसी घी देना चाहिए। इस तरह से हम अपने बच्‍चों की हेल्‍थ की देखभाल कर सकते हैं। 

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