जब हमारे मन का डर हमारे साहस से भी बड़ा हो जाता है, तब वह फोबिया कहलाता है। यूं तो हम कई तरह की चीजों से डरते हैं और मन में डर का भाव आना सामान्य भी है। लेकिन जब यह डर फोबिया बन जाता है तो यह व्यक्ति के लिए परेशानी खड़ी कर देता है। किसी चीज का फोबिया होने पर व्यक्ति की आम जिन्दगी भी प्रभावित होने लगती है। वैसे फोबिया सिर्फ उंचाई या पानी का ही नहीं होता, बल्कि यह किसी भी तरह का हो सकता है। ऐसा ही एक फोबिया है Arithmophobia। संख्याओं के डर को एरिथमोफोबिया कहा जाता है। चूंकि यह फोबिया नंबरों से जुड़ा है, इसलिए इसे न्यूमेरोफोबिया के रूप में भी जाना जाता है। यह फोबिया व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है, क्योंकि इससे उसे रोजमर्रा के जीवन में किसी सवाल को हल करना या नंबरों का जोड़-तोड़ करना काफी कठिन लगता है। यहां तक कि किसी तरह की कैलकुलेशन करने का ख्याल भी उसे परेशान कर देता है। इसे एक एंग्जाइटी डिसआर्डर माना गया है। तो चलिए जानते हैं विस्तार से इसके बारे में-

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होते हैं कई कारण

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एरिथमोफोबिया या न्यूमेरोफोबिया एक ऐसा फोबिया है, जो सुनने में काफी अजीब लगता है। वैसे इसकी जड़ में कई वजहें हो सकती हैं। सबसे पहले तो दूसरे किसी फोबिया की तरह अतीत में या बचपन का कोई बुरा अनुभव।  स्कूल में मैथ में फेल होने या खराब करने से अंकों का स्थायी डर पैदा हो सकता है। कई बार मैथ्य में अच्छा न करने पर दूसरे बच्चों द्वारा मजाक बनाया जाना या माता-पिता व शिक्षक से मार पड़ना भी न्यूमेरोफोबिया को ट्रिगर कर सकता है। इतना ही नहीं, अधिकतर मामलों में तो माता-पिता ही अनजाने में बच्चों में संख्या का डर पैदा कर देते हैं। दरअसल, गणित को सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक माना जाता है। अमूमन माता-पिता बच्चों पर मैथ्स में अच्छा परफार्म करने का दबाव डालते हैं और इस अतिरिक्त तनाव से संख्याओं का डर पैदा होता है। कई बार वंशानुगत, आनुवांशिक कारक और ब्रेन की केमिस्ट्री भी इस भय का कारण बन सकती है।

ऐसे पहचानें लक्षण

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न्यूमेरोफोबिया होने पर व्यक्ति में कई लक्षण नजर आते हैं। ऐसे व्यक्ति को अत्यधिक चिंता, भय और घबराहट से जुड़ी कोई भी चीज जैसे सांस की तकलीफ, तेजी से सांस लेना, अनियमित धड़कन, अत्यधिक पसीना आना, मितली, मुंह सूखना, शब्दों या वाक्यों को व्यक्त करने में असमर्थता आदि। यह फोबिया किसी भी व्यक्ति के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक है क्योंकि हम सभी किसी न किसी रूप में रोजमर्रा की जिंदगी में कैलकुलेशन करते हैं या नंबरों से हमारा सामना होता हे। लेकिन न्यूमेरोफोबिया पीड़ित अक्सर सामाजिक रूप से अयोग्य होते हैं और मैथ्स में अच्छे लोग उन्हें छोटा समझते हैं। यही कारण है कि, यह फोबिया व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकता है और एक निरंतर हीन भावना को जन्म दे सकता है।

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मुश्किल नहीं है इलाज

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एरिथमोफोबिया होने पर व्यक्ति बेहद आसानी से इससे बाहर आ सकता है। आज ऐसी कई थेरेपी हैं, जो आपके मन के संख्याओं के भय को दूर कर सकती है। इसमें दवाओं के साथ-साथ साइकोथेरेपी को भी शामिल किया जाता है। वैसे ड्रग्स का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब पीड़ित व्यक्ति में कोई खास अंतर न दिखाई दे रहा हो क्योंकि दवाइ्रयों से न उन्हें सिर्फ इसकी आदत पड़ जाती है, बल्कि इसके कई तरह के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं।  हालांकि कुछ मामलों में एंटी-डिप्रेसेंट दवाईयों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इलाज के अन्य तरीकों में विशेष रूप से न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग थेरेपी का उपयोग इस फोबिया पर काबू पाने के लिए किया जा सकता है। इस थेरेपी में ब्रेन को कुछ इस तरह से रिप्रोग्राम किया जाता है कि आपके मन-मस्तिष्क में नंबरों के प्रति बैठा डर आसानी से दूर हो जाता है। इसके अलावा एक्सपोज़र थेरेपी और हिप्नोथेरेपी भी एरिथमोफोबिया को दूर करने में सहायक है।