आज से 35 साल पहले 2-3 दिसंबर की दर्मियानी रात भोपाल के लिए बहुत ही खराब रही थी। उस रात जब भोपाल के लोग सो रहे थे तब उनकी जिंदगी बदल गई और कई लोग तो सोकर जाग ही नहीं पाए। कई लोगों की आंखों की रौशनी चली गई, कई लोगों को लाइलाज बीमारी हो गई, अजन्मे बच्चों में भी बीमारियां फैली रहीं और लगातार वो अपनी जिंदगी सही से जीने के लिए परेशान होते रहे। भोपाल ने लोगों को वो दंश दिया जो शायद कभी भी ठीक नहीं हो सकता। मैं ये सब इतनी अच्छी तरह से इसलिए जानती हूं क्योंकि मैं खुद भोपाल में 8 साल रही हूं। यही नहीं भोपाल गैस कांड वाले दिन मेरे पिता जी भोपाल में ही थे। वो 2 दिसंबर 1984 की शाम को ही भोपाल से होशंगाबाद आए थे। उसी रात भोपाल के 5 लाख लोगों को गैस कांड का सामना करना पड़ा। 

कई लोग भोपाल को एक शांत शहर मानते हैं, कई के लिए ये बहुत अच्छा टूरिस्ट डेस्टिनेशन है जहां बहुत सी झील और बहुत कुछ है देखने को, लेकिन कुछ के लिए ये बहुत ही खतरनाक शहर है जहां उनकी जिंदगी तबाह हो गई।

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क्या हुआ था उस रात- 

1984 की उस रात से पहले न जाने कितनी बार भोपाल के इस प्लांट से लीकएज के कारण कई वर्कर, इंजीनियर आदि अपनी जान गंवा बैठे थे या किसी न किसी तरह की तकलीफ से ग्रसित हो गए थे। इसे लेकर जर्नलिस्ट राजकुमार केसवानी पड़ताल भी कर रहे थे। कई सालों तक ऐसे छोटे-मोटे हादसों को नजरअंदाज़ किया गया क्योंकि भोपाल के लोगों को काम चाहिए था। भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में गैस फॉर्म में और लिक्विड फॉर्म में कैमिकल MIC मौजूद थी।  

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दिसंबर 1984 की शुरुआत होते ही कार्बाइड के इंजीनियर्स को ये समझ आ गया था कि सुरक्षा के लिए लगाए गए वॉल्व्स सही हालत में नहीं है। इसी के साथ, स्टीम बॉयलर के पास के कई पाइप साफ नहीं थे और इसके कारण गैस सही से नहीं जा पा रहे थे।  

2 दिसंबर की शाम को एक पाइप के जरिए गैस टैंक में पानी पहुंच गया। इससे एक कैमिकल रिएक्शन हुआ। रात 10.30 बजे प्रेशर नापने वाला मीटर खतरे की घंटी बजाने लगा, लेकिन कर्मचारियों को लगा कि वो मीटर खराब हो गया है। 11 बजे तक कर्मचारियों को गैस की मौजूदगी का अहसास हुआ तो उन्होंने लीक चेक करनी शुरू की और 11.45 पर एक पाइप मिला जिससे गैस रिस रही थी। उसे 12.15 तक ठीक कर दिया गया और कर्मचारी चाय ब्रेक पर चले गए, 12.40 रात में चाय ब्रेक खत्म होने के 5 मिनट बाद ही टैंक में विस्फोट हो गया। इसके बाद भी गैस को पूरे शहर में फैलने से रोका जा सकता था अगर तीन सुरक्षा डिवाइस काम कर रहे होते। पर ऐसा नहीं था।  

30 टन जहरीली गैस विस्फोट के 45-60 मिनट के अंदर हवा में फैल गई। शुरुआती दौर में पुलिस को भी यही बताया गया कि कुछ भी नहीं हुआ है और अमोनिया जैसी गैस फैली है। पर रात 2.00 बजे पब्लिक वाला सायरन फिर बजा और तब तक गैस पूरे इलाके में फैल चुकी थी। हमीदिया अस्पताल में बताया गया और उन्हें इस गैस के बारे में कुछ भी नहीं पता था। MIC अपना काम कर चुकी थी। रात 3 बजे तक लोगों की मौत होनी शुरू हो गई थी।  

क्या रोका जा सकता है ये हादसा? 

जी हां, ये हादसा रोका जा सकता था। सुरक्षा को ताक पर रखा गया जिसकी वजह से 5 लाख लोगों पर असर हुआ। अगर उस समय सुरक्षा के इंतज़ाम पुख्ता होते या इतनी सारी सुरक्षा गाइडलाइन्स में से एक आध भी ठीक से फॉलो की गई होती तो ये हादसा नहीं होता।  

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कितने लोगों पर हुआ था असर? 

सरकार ने शुरुआती आंकड़ा दिया था कि 2259 लोग मारे गए हैं, फिर इस आंकड़े को बढ़ाकर 3787 कर दिया गया। 2006 में एक सरकारी एफिडेविट ने बताया था कि 5,58,125 लोगों पर असर हुआ था और 8000 लोग सिर्फ दो हफ्ते के अंदर ही भोपाल में मारे गए थे। इतना ही नहीं अन्य 8000 लोग अगले कुछ महीनों में गैस से जुड़ी समस्याओं के चलते अपनी जान गंवा बैठे थे। लोगों की आंखें खराब हो गई थीं।  

कौन था जिम्मेदार- 

इस हादसे के लिए वॉरेन एंडरसन को जिम्मेदार माना जाता है जिसका वो प्लांट था। इतने बड़े हादसे के बाद भी एंडरसन इस हादसे के 4 दिन बाद ही आरामदायक फ्लाइट के जरिए भोपाल छोड़कर चला गया। माना जाता है कि अगर कार्बाइड में एंडरसन की तरफ से सुरक्षा के ज्यादा इंतज़ाम किए जाते तो ये सब न होता।  

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चश्मदीदों के अनुसार क्या था आलम? 

मेरे पिता जी इस हादसे के दो हफ्ते बाद भोपाल वापस गए थे। तब तक गैस का असर खत्म हो चुका था, लेकिन उन्होंने जो हालत बताए वो चौंकाने वाले थे। दो हफ्ते बाद भी सभी अस्पताल भरे हुए थे। सड़कों पर मवेशियों की और कई जगह तो इंसानों की लाशें थीं। पुलिस की गाड़ियां लगातार चक्कर लगा रही थीं और यही नहीं लोगों के लिए बहुत ही बुरा दौर था। हर गली, हर चौराहे पर मातम जैसा माहौल था। ये सब कुछ चौंकाने वाला था और मेरे पिता जी कुछ घंटों से ज्यादा भोपाल में नहीं रुक पाए। वहां लोगों के पास पीने का पानी भी खत्म होने लगा था। आलम इतना बुरा था कि पुलिस ने लाशों में नंबर डाल दिए थे। हज़ारों का नाम नहीं रिकॉर्ड में रखा जा सकता था। 

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क्या अब भी भोपाल में मौजूद है जहर?

अब भी यूनियन कार्बाइड में से वो जहर नहीं निकाला जा सका है। हां, ये प्लांट बंद है और ये प्लांट दोबारा कभी शुरू नहीं किया जाएगा, लेकिन अभी भी 340 टन जहरीला कचरा यूनियन कार्बाइड में मौजूद है और उसे नष्ट नहीं किया जा सका। इसे आप कुछ भी कह लीजिए, ये बहुत ही खराब स्थिती है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल में कार्बाइड के पास मौजूद 42 कालोनियों के भूजल की स्थिति खराब है और उसमें रसायन की मात्रा काफी ज्यादा है। इसके कारण लोगों को गंभीर बीमारियां हो रही हैं। 

मैं खुद यूनियन कार्बाइड के पास गई हूं और उसे करीब से देखा है। इस जगह के आस-पास अभी भी लोग दिख जाते हैं। कई बार तो पास की कालोनियों से आकर बच्चे भी यहां खेलते हैं। ये जगह बहुत ही खराब वातावरण वाली है, लेकिन शायद किसी को ये अंदाज़ा नहीं कि कार्बाइड में अभी भी जहर मौजूद है।