पूरी दुनिया इस समय कोरोना की महामारी से जूझ रही है। कोरोना के इन्फेक्शन से बचाव के लिए साफ-सफाई बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। कचरा और गंदगी सिर्फ हमारी सेहत को ही नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि घर और बाहर, दोनों जगह के वायु प्रदूषण गंभीर बीमारियों की वजह बन रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण की वजह से क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी सांस की गंभीर बीमारी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस बीमारी से 49 फीसदी लोग मौत के शिकार हो रहे हैं, जबकि Lung Cancer से लगभग 33 फीसदी लोग असमय मौत के शिकार हो रहे हैं। दूषित हवा में सांस लेने से फेफड़े सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। पॉल्यूशन से होने वाला नुकसान सिगरेट के दुष्प्रभाव से कहीं ज्यादा गंभीर है। आज विश्व पर्यावरण दिवस है और इस मौके पर हमें पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाने के लिए सजग होने की जरूरत है, क्योंकि पर्यावरण के स्वच्छ होने पर ही हम अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। 

भारतीय शहर विश्व के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 14 शहर भारत में हैं। प्रदूषण के कारण पिछले कुछ समय बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी को हेल्थ प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ा है। साल 2019 में दीवाली के पटाखों से हुए प्रदूषण और उसके बाद पराली जलाने के कारण दिल्ली और आसपास के इलाकों पर लंबे समय तक छाई रहने वाली धुंध आपको जरूर याद होगी। तब घरों के भीतर भी सांस लेना मुश्किल हो गया था। उस समय में बच्चों की स्कूल से छुट्टी के साथ पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी गई थी। सामान्य जनजीवन लंबे समय तक प्रभावित रहा था, विमान सेवाएं भी रद्द की गई थीं। इन हालात से गुजरते हुए हमने यह बात शिद्दत से महसूस की है कि साफ-सुथरी हवा में सांस लेना हमारे लिए कितना जरूरी है।  

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दिल की बीमारी की समस्याएं बढ़ीं

प्रदूषण से फेफड़ों के साथ-साथ दिल की बीमारियां लोगों में बढ़ रही हैं। इससे हार्ट अटैक की आशंका भी बढ़ जाती है। दूषित हवा में सांस लेने से आंखों में जलन, खांसी, सांस लेने में परेशानी, गले में दर्द, सिरदर्द जैसी कई समस्याएं सामने आती हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव देखने को मिलता है।

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. ए के शुक्ला, सीनियर कंस्टलेंट फिजीशियन, कैलाश अस्पताल, नोएडा बताते हैं, 

'जिन्हें अस्थमा की समस्या है, उन्हें वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा परेशानी होती है। वायु प्रदूषण के कारण सांस लेने में परेशानी होती है। सांस ठीक से नहीं ले पाने पर बॉडी में ऑक्सीजन का कंसेंट्रेशन कम हो जाता है, इससे हार्ट, किडनी, लीवर अपना काम ठीक से नहीं कर पाते हैं। हमारे सभी अंग ऑक्सीजन से ही चलते हैं और ऑक्सीजन की कमी से सभी अंग प्रभावित होते हैं। वायु प्रदूषण के कारण औसत उम्र भी घटती जाती है। एयर पॉल्यूशन की वजह से नॉस्ट्रिल्स और साइनसिस प्रभावित होते हैं, लगातार कफ निकलता है, स्किन का कलर डार्क हो जाता है, स्किन रिलेटेड प्रॉब्लम्स हो जाती हैं। पानी से होने वाले पॉल्यूशन से भी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। हैवी और कैमिकल युक्त वॉटर से पेट की समस्याएं हो सकती हैं।'

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डॉ. ए के शुक्ला आगे बताते हैं, 'लंबे समय तक पॉल्यूटेड वॉटर से आंतों में इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। इसके कारण खाना खाने के बाद हजम नहीं होता और आपको तुरंत फ्रेश होने की जरूरत महसूस होती है। दूषित पानी से इंटेस्टाइन में बदलाव शुरू हो जाते हैं। लंबे समय तक ये स्थितियां बनी रहें तो इनसे कैंसर होने का खतरा पैदा होता है। हैवी मेटल जैसे कि मर्करी, लेड आदि बैटरी में यूज होते है और इनसे मिट्टी और हवा में प्रदूषण बढ़ रहा है। इसकी वजह से मस्तिष्क में बहुत बदलाव आते हैं। इससे सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है, सीजर्स पड़ जाते हैं, बच्चों में ग्रोथ और डेवलपमेंट नहीं हो पाता, उनकी सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। कुल मिलाकर प्रदूषण का शरीर पर गंभीर असर होता है, जिसे लेकर जागरूक होने की जरूरत है।' 

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दिया मिर्जा ने किया है प्रकृति को बचाने का आह्वान

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बॉलीवुड एक्ट्रेस रही दीया मिर्जा वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की ब्रांड एंबेसडर रहने के बाद भारत के लिए यूएन एनवायरमेंट गुडविल एंबेसडर बनीं। दीया ने पर्यावरण को बचाने के लिए देशवासियों को निरंतर जागरूक किया। मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होने कहा, 'स्वच्छ हवा में सांस लेना हमारा अधिकार है। भारत में प्रदूषण कई स्रोतों से होता है। पावर जनरेशन से, गाड़ियों से, ईंट की भट्टियों से, निर्माण कार्यों से, कचरे के सही तरीके से निपटारा नहीं किए जाने की वजह से। अगर इनोवेटिव सोच के साथ काम किया जाए तो प्रदूषण कम करने के नए तरीके ईजाद किए जा सकते हैं। मैंने अपनी सोसाइटी में नया वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम लगवाया है। अपनी रोजाना की जिंदगी में मैंने प्लास्टिक की हर चीज की पहचान कर उसका इस्तेमाल करना बदं कर दिया है। मैं बाहर जाते हुए प्लास्टिक की बोतलें नहीं खरीदती। अपनी मेटल की बोतल लेकर चलती हूं। मैं सैनिटरी नैपकिन्स भी 100 फीसदी बायोडीग्रेडेबल यूज करती हूं। प्लास्टिक के थैलों की जगह मैं कपड़े वाला थैला इस्तेमाल करती हूं।' दीया मिर्जा ने अपनी तरफ से जो छोटी-छोटी पहल की हैं, उनसे इंस्पिरेशन लेते हुए महिलाएं प्रकृति को साफ-सुथरा रखने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

अगर सभी लोग पर्यावरण संरक्षण की दिशा में गंभीरता से विचार करें और व्यक्तिगत स्तर पर पहल करें, तो निश्चित रूप से हम अपने वातावरण को बेहतर बना सकते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी को साफ-सुथरी हवा में जीने का अनमोल तोहफा दे सकते हैं। 

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