जब भी भारत की आज़ादी के बारे में बात होती है तो बड़े-बड़े फ्रीडम फाइटर्स की याद आती है। देश को आज़ादी दिलाने में उनका बहुत योगदान रहा है और अंग्रेजों के 200 साल के शासन को खत्म करने के लिए क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी ने अपने-अपने स्तर पर मेहनत की है। इसी तरह भारत को आज़ादी दिलाने के लिए हर तबके के इंसान ने आगे बढ़कर काम किया है। इसमें राजा-महाराजा और उनकी रानियां भी शामिल रही हैं। 

जहां तक भारत के इतिहास का सवाल है तो यहां हर पीढ़ी में ऐसे कई उदाहरण हैं जो ये बताते हैं कि किस तरह से भारत की महिलाओं ने भी पुरुषों की तरह ही इस देश को संवारने का काम किया है। 15 अगस्त यानि भारत की आज़ादी के दिन हम आपको बताते हैं उन रानियों के बारे में जिन्होंने महलों के ऐशो-आराम की नहीं बल्कि देश की चिंता की और भारत के इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाया। 

1. रानी लक्ष्मी बाई

मणिकर्णिका यानि रानी लक्ष्मी बाई को कौन नहीं जानता। प्यार से मनु कही जाने वाली रानी लक्ष्मी बाई को उनके पिता ने बचपन से ही बहुत ट्रेनिंग दी थी। पंडितों का कहना था कि मनु आगे चलकर बहुत बड़े काम करेगी। झांसी के राजा गंगाधर राव से शादी के बाद वो लक्ष्मी बाई बन गईं। पति की मौत और कोई सगा बेटा न होने के कारण उन्हें राज्य अंग्रेजों को देना पड़ता और इसके विरोध में उन्होंने दामोदर राव को अपना दत्तक पुत्र बनाया। हालांकि, अंग्रेजी सरकार ने ये बात नहीं मानी और फिर शुरू हुई झांसी की ऐतिहासिक लड़ाई। 

rani laxmi bai of india

झांसी से लेकर ग्वालियर तक चली आज़ादी की लड़ाई में रानी लक्ष्मी बाई ने खून-पसीना दोनों बहाया और झलकारी बाई जैसी महिला स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ाई की। 

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2. रानी अवंती बाई

रामगढ़ की रानी अवंती बाई को रानी लक्ष्मी बाई का ही दूसरा रूप माना जाता है। अवंति बाई का जन्म भी साधारण परिवार में हुआ था जिनकी शादी राजघराने में हुई थी। दोनों रानी लक्ष्मी बाई और अवंती बाई अपने-अपने राज्य की आज़ादी के लिए लड़ते-लड़ते शहीद हो गईं। 

अवंती बाई के पति राजा विक्रमादित्य सिंह को अंग्रेजी सरकार ने पागल करार दिया था और उनके दो नाबालिग बेटों को राजगद्दी पर बैठने के लिए अमान्य घोषित कर दिया था। रानी अवंती बाई ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य ताकत को पड़ोसी राज्य के राजाओं की मदद से बढ़ाया और ब्रिटिश सरकार को रामगढ़ से बाहर निकाल दिया। हालांकि, अपनी हार देखकर अंग्रेजी सरकार ने सेना भेजकर रामगढ़ पर हमला कर दिया और रानी अवंती बाई ने अपनी ही तलवार से अपनी जान ली। अंतिम समय तक भी उन्होंने अपने सहयोगियों का नाम नहीं बताया और अमर हो गईं।  

3. बेगम हज़रत महल 

वाजिद अली शाह जिन्हें अवध का आखिरी राजा माना जाता है वो दो चीज़ों के लिए जाने जाते हैं। पहला तो कविताएं और दूसरा ये कि उनकी गद्दी अंग्रेजी सरकार ने हथिया ली थी। हालांकि, उनकी सबसे प्रसिद्ध पत्नी हज़रत महल को अंग्रेजों से टक्कर लेने के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने बेटे को राजा बनाया और ब्रिटिश फौज को लखनऊ हथियाने से रोका था।  

begum hazrat mahal

हज़रत महल को वाजिद अली शाह के हरम के लिए खरीदा गया था और वहां से उन्होंने अपनी जगह रानी बनने तक खुद बनाई। 1857 में अपने हितैषियों के साथ मिलकर चिनहट की लड़ाई में उन्होंने ब्रिटिशर्स को हराया था। ब्रिटिश सरकार उस महिला से डर गई थी और बंटवारे की बात भी की थी जिसे उन्होंने अस्वीकार किया था। 1859 तक उन्होंने ब्रिटिश फौज को लखनऊ पर कब्जा करने नहीं दिया। हालांकि, उसके बाद उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन उस समय की सरकार को दो सालों तक अपने राज्य से दूर रखना आम बात नहीं थी।  

4. वेलु नचियार 

वेलु नचियार को वो पहली रानी माना जाता है जिन्होंने ब्रिटिश फौज के खिलाफ लड़ाई की थी। वेलु नचियार तमिलनाडु के राजा रामनद की बेटी थीं जो 1730 में पैदा हुई थीं। उनका कोई भाई नहीं था और इसलिए उन्हें एक राजकुमार की तरह ही पाला गया। उन्हें युद्ध नीति और हथियारों को लेकर बहुत सारी बातें बताई गई थीं।  

velu nachiyal

अंग्रेजी सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए भारत पर कब्जा करना शुरू ही कर दिया था और उस वक्त एरकॉट के नवाब का साथ उनके लिए काफी मायने रखता था।  

इस समय वेलु की शादी शिवगंगई के राजा से हुई थी जिन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच आर्मी के बीच युद्ध में 1772 में अपनी जान गवां दी थी। अपनी बेटी के साथ वेलु भाग निकलीं और 1780 में हैदर अली शाह के साथ रानी वेलु वापस आईं और अलग-अलग जगह अपने साथियों के साथ मिलकर उन्होंने सुसाइड अटैक किए जिसने ब्रिटिश सेना के हथियारों को नष्ट कर दिया।  

लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने शिवगंगई को रिहा करवा लिया और जब तक वो जिंदा रहीं तब तक शिवगंगई एक स्वतंत्र राज्य रहा।  

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5. कित्तूर चेनम्मा 

कित्तूर रानी चेन्नम्मा जो कर्नाटक के बेलगांव में 1778 में पैदा हुई थीं वो लिंगायत समाज से थीं। राजा मल्लासराजा से शादी के बाद वो कित्तूर की रानी कहलाईं। उनका एक बेटा हुआ जो बच न सका और इसलिए रानी लक्ष्मी बाई की तरह उनके राज्य में भी ब्रिटिश सरकार का डॉक्ट्रीन ऑफ लैप्स कानून लगा जो कित्तुर को हथियाने के लिए था।  

वैसे रानी चेनम्मा का एक गोद लिया बेटा भी था, लेकिन अंग्रेजी सरकार को ये मंजूर नहीं था और 1824 में जब अंग्रेजी सरकार कित्तुर को हथियाने के लिए आ रही थी तब उन्हें फौज का सामना करना पड़ा। रानी चेनम्मा ने सिर्फ जंग ही नहीं जीती बल्कि दो अंग्रेजी अफसरों को बंदी भी बना लिया। हालांकि, 1829 में दोबारा अंग्रेजी सरकार ने कित्तुर पर हमला किया और उस बार रानी को हार का सामना करना पड़ा। 

इन महारानियों को हमारी तरफ से सलाम जो आखिरी दम तक अपने देश के लिए लड़ीं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।