द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान खूफिया एजेंसी को इस बात का एहसास हुआ कि महिलाएं दुश्मनों के इलाके में जासूसी कर सकती हैं। जिस समय केवल पुरुषों को ही तनाव के क्षेत्र में भेजा जा रहा था, अब वहां महिलाओं की भी भर्ती होनी शुरु हो गई थी। कई महिलाएं की भर्ती हुई और नूर इनायत खान, जो कि भारतीय राजकुमारी भी थीं उन्हें विश्व युद्ध 2 जासूस बना दिया गया था। नूर इनायत 28 अगस्त 2020 में यूके में ब्लू पट्टिका द्वारा सम्मानित होने वाली पहली भारतीय महिला के रूप में जानी गई हैं। फ्रांस में एक (SOE) विशेष संचालन कार्यकारी के रूप में उनके बलिदान को शीर्षक दिया गया था।

इनायत के पिता थे इंडियन और मां थी अमेरिकी

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इनायत का जन्म 1914 में मॉस्को में हुआ था और उनकी परवरिश फ्रांस में हुई थी। इनायत के पिता हजरत इनायत इंडियन थे, जो एक सूफी गायक और म्यूजिशियन थे। इनायत की मां अमीना बेगम अमेरिकी थीं और वह इनायत के पिता से अमेरीका में ट्रेवल के दौरान मिली थीं। दूसरे विश्व युद्ध के समय से ही उनका परिवार पेरिस में रहता था। बचपन से ही इनायत काफी शांत और सपनों को पूरा करने वाली लड़की थीं। उनपर 13 साल की उम्र से ही उनके तीन भाई-बहन और मां का ध्यान रखने की जिम्मेदारियां आ गई थीं। जर्मनी के हमले के बाद उनका परिवार ने ब्रिटेन चला गया था। (लक्ष्य पाने के लिए घबराएं नही बस ये 5 टिप्स अपनाएं)

इनायत का बाल मनोविज्ञान और म्यूजिक की ओर झुकाव था

जब इनायत ब्रिटेन आ गई थीं, तो उन्होंने बाल मनोविज्ञान(child psychology) पढ़ना शुरु किया और कुछ समय निकालकर नादिया बूलैंगर के पेरिस कंजर्वेटरी में संगीत सीखती थीं। बाद में इनायत ने बच्चों के लिए कविताएं और कहानियां लिखने में ही करियर बनाया था। इसके अलावा इनायत हमेशा से ही युद्ध में मदद करना चाहती थीं। उसी साल, वह महिला सहायक वायु सेना (WAAF) में भर्ती हुईं, जिसके बाद उन्होंने एडिनबर्ग में वायरलेस ऑपरेटर के रूप में छह महीने की ट्रेनिंग ली थी। एक साल बाद उन्होंने इंटेलिजेंस में कमीशन के लिए अपील की और फिर उनकी जिंदगी में बदलाव आने लगा।

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के लिए की थी जासूसी

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नूर इनायत खान के योगदान के बारे में हम सभी बहुत कम जानते हैं, लेकिन इन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के लिए जासूसी की थी। जिसके दौरान उन्हें (SOE) विशेष संचालन कार्यकारी बनाया गया था। भले ही नूर इनायत खान को धोखा देने के लिए नाजियों द्वारा पड़कर मार दिया गया था, लेकिन उनका योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता है। उनके योगदान के बाद ही लेखक श्रबानी बासु ने 2006 में नूर की जीवनी, 'स्पाई प्रिंसेस' लिखी। इनायत पहली ऐसी महिला थीं, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन से फ्रांसीसी प्रतिरोध में मदद करने के लिए भेजा गया था।

26 साल की उम्र में नूर एक रेडियो ऑपरेटर बन गई थीं

द्वितीय विश्व युद्ध के शुरुआत में, ब्रिटेन के पूर्व पीएम विंस्टन चर्चिल ने अपनी नई जासूसी एजेंसी में महिलाओं को गुप्त ऑपरेशन के लिए ट्रेनिंग देने का आदेश दिया क्योंकि पुरुषों की कमी थी। 26 साल की उम्र में, इनायत एक रेडियो ऑपरेटर बन गई और नाजी यानि कब्जे वाले फ्रांस में भेजी जाने वाली पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर बनीं। वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और लंदन में वापस जानकारी भेजने के लिए तीन महीने तक अंडरकवर रहीं और फ्रांस में ही काम किया।

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बच्चों की नर्स बनकर रहीं थी फांस में

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इनायत फ्रांस में रहने के दौरान, जीन-मैरी रीनियर के नाम से बच्चों की नर्स बनकर रही थीं। हालांकि उनके साथ के सभी जासूस पकड़े गए थे और फिर भी उन्होंने वापस लंदन जाने से मना कर दिया था। उनका तनाव पेरिस क्षेत्र और लंदन के आसपास के एजेंटों से एकमात्र लिंक बन गया था, इसलिए इनायत की एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। उसे 'फ्रांस में सबसे खतरनाक पोस्ट' पर रखने के बाद केवल 6 सप्ताह तक जीवित रहने की उम्मीद थी, लेकिन चमत्कारिक रूप से, वह 3 महीने तक उनपर किसा का ध्यान नहीं गया। (सिर्फ एक चीज की मदद से आप पूरे कर पाएंगी अपने सभी लक्ष्य)

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इनायत को लगभग 10 महीने तक जानकारी के लिए प्रताड़ित किया गया

धोखा देने के बाद जब इनायत पकड़ी गई थीं, तो उन्हें जानकारी देने के लिए लगभग 10 महीने तक जानकारी के लिए प्रताड़ित किया गया था। लेकिन इनायत ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया था और अपनी अंतिम सांस तक अपने देश के प्रति वफादार रही थीं। 13 सितंबर, 1944 को तीन अन्य SOE एजेंट के साथ Dachau में उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस साल 2020 में, नूर ब्लू प्लाक से सम्मानित होने वाली पहली दक्षिण एशियाई महिला बन गईं थीं।

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Image Credit: jagran, lallantop