80 साल की उम्र में अक्सर लोगों का हौसला कम हो जाता है और वो अपना ज्यादातर समय आराम करके बिताते हैं। पर कुछ लोगों के लिए उम्र वाकई एक नंबर होती है और किसी भी उम्र में उनका काम खत्म नहीं होता है। ऐसे लोगों को देखकर हमें बहुत ज्यादा प्रेरणा मिलती है। ऐसी ही एक महिला है 80 साल की के कमलाथल। ये पिछले 30 साल से वही काम कर रही हैं जो उन्हें पसंद है और उसके लिए वो किसी की बात नहीं सुनती।  

कमलाथल रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले उठ जाती हैं। नहा-धोकर अपनी पूजा निपटा कर वो अपने बेटे के साथ खेत जाती हैं और ताज़ा सब्जियां लेकर आती है। वो अपने हाथों से सिलबट्टे पर चटनी पीसती हैं। सब्जियां भी खुद ही काटती हैं, सांभर बनाती हैं और वो भी चूल्हे पर और वो सारा काम करती हैं जिसे करने के लिए 80 साल की महिला को बहुत हिम्मत जुटानी पड़े।  

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पिछले 30 सालों से लगातार 1 रुपए में बेच रही हैं इडली-  

सुबह 6 बजे से ही उनके दरवाजे पर भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। वो तमिल नाडु के वादीवेलमपालयम में रहने वाली कमलाथल हर रोज़ 6 बजे अपने ग्राहकों के लिए दरवाज़े खोलती हैं। वो इडली का बैटर रात में ही तैयार कर लेती हैं। लोग लाइन लगाकर उनकी बेहतरीन इडली, सांभर और तीखी चटनी का स्वाद चखते हैं और वो भी 1 रुपए प्रति इडली के दाम पर। जी हां, सिर्फ 1 रुपए प्रति इडली।  

रोज़ाना आने वाले लोग उनके कस्टमर हैं जो बिना किसी देरी के कमलाथल के घर के सामने लाइन लगा लेते हैं। हर कोई अपनी बारी का इंतज़ार करता है। वो हर रोज़ स्वादिष्ट और सेहतमंद नाश्ता करने आते हैं।  

क्योंकि कमलाथल हमेशा से खेती-किसानी वाले परिवार में रही हैं इसलिए उन्हें मेहनत से डर नहीं लगता। वो अपना मसाला और इडली का बैटर उसी सिलबट्टे पर पीसती हैं। 80 साल की महिला के लिए ये आसान बात नहीं होगी। 

हर रोज़ कई घंटों का काम-

सिर्फ इडली बनाने के लिए उन्हें 6 किलो चावल और उड़द दाल पीसनी होती है और वो 4 घंटों की मेहनत से पीसती हैं। उसके बाद रात भर इडली के बैटर को फूलने के लिए रख देती हैं और फिर अगले दिन यही रूटीन जो सुबह से शाम तक लगातार काम करके भी खत्म नहीं होता। 

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कमलाथल सिर्फ दोपहर तक ही इडली बेचती हैं। वो फ्रेश इडली बनाती हैं। एक बार में उनका इडलीमेकर 37 इडली निकालता है और वो हर रोज़ लगभग 1000 इडली बनाती हैं। जैसे ही एक बैच खत्म होता है वो दूसरा चढ़ा देती हैं। ऐसे हर आने वाले को गर्म और ताज़ा खाना मिलता है जो कई चर्चित रेस्त्रां में भी नहीं मिलता। 

हर दिन उनकी चटनी बदल जाती है, लेकिन सांभर और इडली वैसी ही रहती है। वो पत्तों पर खाना परोसती हैं वो भी खेत से ही आती हैं। 

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इसलिए नहीं बढ़ाई कीमत-

10 साल पहले एक इडली 50 पैसे में बिकती थी और अब कुछ सालों पहले 1 रुपए कर दिया। उनका कहना है कि 15 या 20 रुपए प्रति प्लेट का नाश्ता यहां के लोगों के लिए बहुत महंगा होगा। वो लोग मजदूरी का काम करते हैं और ऐसे में ये सब बहुत मेहनत वाला हो जाएगा। बाकी होटल प्रति प्लेट 3-4 इडली देते हैं और वो इन मजदूरों की मेहनत के हिसाब से काफी कम हैं। ऐसे में वो कमलाथल के पास आते हैं और सिर्फ अपनी भूख मिटाते हैं। कमलाथल का कहना है कि इससे मजदूरों को अपने परिवार के लिए पैसा बचाने में मदद मिलती है। 

दिन भर में कमा लेती हैं इतना प्रॉफिट-

इडली की कीमत को देखा जाए तो ऐसा लगेगा जैसे कमलाथल नुकसान उठा कर ये काम कर रही हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। वो 200 रुपए प्रति दिन का प्रॉफिट कमा लेती हैं। वो इसे सिर्फ लोगों की भूख मिटाने का जरिया मानती हैं।

अब उनकी इडली की खबर सुनकर दूर-दूर से लोग आते हैं। अब उन्होंने उझुंतू बोंडा भी अपने मेन्यू में जोड़ दिया है जिसकी कीमत 2.50 रुपए है। कमलथला अभी भी कीमत बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं और आगे भी वो नहीं बढ़ाना चाहती हैं।