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Chamki Fever: ये आयुर्वेदिक नुस्‍खे आजमाएं, मासूम बच्चों को चमकी बुखार से बचाएं

चमकी बुखार को एक खतरनाक बीमारी माना जाता है। इसलिए एक्‍सपर्ट हमें चमकी बुखार के लक्षण, बचाव और कुछ आयुर्वेदिक नुस्‍खों के बारे में बता रहे हैं। 
Updated:- 2019-06-24, 16:07 IST
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बिहार में ‘चमकी बुखार’का कहर ऐसा शुरू हुआ है कि वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। इससे जुड़े मामले लगातार देखने को मिल रहे हैं। जी हां यम की नजर अभी बिहार के मुजफ्फपुर के मासूम बच्चों पर है और यह 1995 से ही है। ''जेकब जॉन और अरुण शाह के रिसर्च पेपर से पता चलता है कि मुजफ्फरपुर में होने वाली मौत का संबंध लीची, ग़रीबी और कुपोषण से है। इन्होंने 2012 में रिकॉर्ड देखा तो पता चला कि ज्यादातर बच्चों को सुबह के 6 से 7 बजे के बीच दौरे पड़ते हैं। लीची को सुबह 4 से 5 बजे तोड़ी जाता है। तोड़ने वाले गरीब मजदूर होते हैं। खाली पेट मजदूर मां बाप के साथ बच्चे भी पहुंच जाते हैं और लीची तोड़ते वक्त उसे खा लेते हैं। जब कुपोषित और खाली पेट वाला बच्चा लीची खाता है तो वह एक्यूट इंसेफेलाइटिस यानि चमकी बुखार की चपेट में आ जाता है।

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चमकी बुखार एक संक्रामक और जानलेवा बीमारी है। यह बीमारी वायरस, बैक्टीरिया और फंगस की वजह से फैलती है। चमकी बुखार से बिहार में अब तक 128 बच्चों की मौत हो चुकी है। चमकी बुखार को दिमागी बुखार ,जापानी बुखार, इंसेफेलाइटिस सिड्रोंम जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चमकी बुखार को एक खतरनाक बीमारी माना जाता है क्‍योंकि उपचार में थोड़ी सी लापरवाही से मरीज की जान भी जा सकती है। इसलिए आयुर्वेदिक एक्‍सपर्ट अबरार मुल्‍तानी जो समय-समय पर हमें बीमारियों से बचाव के आयुर्वेदिक उपाय बताते हैं। आज हमें चमकी बुखार के लक्षण, बचाव और कुछ आयुर्वेदिक नुस्‍खों के बारे में बता रहे हैं। 

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चमकी बुखार के लक्षण

  • मिर्गी जैसे झटके आना (जिसकी वजह से ही इसका नाम चमकी बुखार पड़ा)
  • बेहोशी
  • सिरदर्द
  • अचानक बुखार आना
  • पूरे शरीर में दर्द होना
  • जी मिचलाना और उल्टी होना
  • बहुत ज्यादा थकान
  • पीठ में तेज दर्द
  • कमजोरी
  • चलने में परेशानी होना
  • लकवा जैसे लक्षणों का दिखना।

 

चमकी बुखार से बचाव

  • सबसे पहले तो बच्चे को खाली पेट लीची ना खाने दें, कुपोषित बच्चों को तो बिल्कुल भी नहीं।
  • लीची में हायपोग्लायसिन ए एवं मेथिलीन सायक्लोप्रोपाइल ग्लायसीन होते हैं , जो कुपोषित बच्चों के ब्‍लड में ग्लुकोज के लेवल को कम कर देता है। ऐसा तब होता है , जब ये बच्चे सुबह सुबह खाली पेट लीची के बाग़ों में नीचे गिरे हुए लीची के फल उठाकर खा लेते हैं। लीची के ये तत्व शरीर में बीटा ऑक्सीडेशन को रोक देते हैं और हाइपोग्लाइसीमिया (ब्‍लड में ग्लूकोज का कम हो जाना) हो जाता है एवं ब्‍लड में फैटी एसिड्स की मात्रा भी बढ़ जाती है। चूंकि बच्चों के लिवर में ग्लूकोज स्टोरेज कम होता है, जिसकी वजह से पर्याप्त मात्रा में ग्लूकोज ब्‍लड के द्वारा ब्रेन में नहीं पहुंच पाता और ब्रेन गंभीर रूप से प्रभावित हो जाता है। इस तरह की बीमारी का पता सबसे पहले वेस्टइंडीज में लीची की तरह ही 'एकी' फल का सेवन करने से पता चला था।

 

  • ग्लूकोज का ब्‍लड में लेवल कम होते ही बच्चे के ब्रेन पर इसका असर होने लगता है और कुपोषित बच्चों में यह घातक लेवल का मस्तिष्क शोथ उत्पन्न कर देता है। बच्चों को ब्रेन का बुखार हो जाता है और यह मुत्यु का कारण बन जाता है। प्राथमिक उपचार में अगर बच्चे को तुरंत ही ग्लूकोज दे दिया जाए तो उसे बचाया जा सकता है। ग्लुकोज उपलब्ध ना होने पर कोई मीठी चीज भी दी जा सकती है।
  • कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बच्चे लीचियों को बिना धोये दांतों से ही छीलकर खाते हैं , जिससे उनके बॉडी में घातक इंसेक्टिसाइड (एंडोसल्फान आदि) केमिकल प्रवेश कर जाते हैं और यह उनके कुपोषित बॉडी के लिए बहुत घातक बन जाते हैं। इसलिए लीची को धोकर और उसका छिलका हाथों से हटाकर खाना चाहिए।

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चमकी बुखार के लिए आयुर्वेद

  • लेखक और आयुर्वेद चिकित्सक डॉक्‍टर अबरार मुल्तानी का कहना है कि आयुर्वेद से चमकी के उपचार और बचाव में कुछ चीजों का इस्‍तेमाल किया जा सकता है
  • किसी आयुर्वेद चिकित्सक की देख-रेख में नाक और कान में नारियल के तेल में थोड़ा सा कपूर मिलाकर 2-2 बूंदे डालें।
  • सिर पर चंदनबाला लाक्षादि तेल की मालिश करें।
  • अमरसुन्दरी वटी 1-1 गोली सुबह दोपहर शाम लें।
  • ब्रह्मी वटी 1-1 गोली सुबह दोपहर शाम लें। 
  • अग्नितुण्डि वटी 1-1 गोली सुबह दोपहर शाम लें।
  • सारस्वतारिष्ट और सुदर्शनारिष्ट 2-2 चम्मच सुबह शाम भोजन के बाद पानी में मिलाकर लें।
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