हमारे देश में त्योहारों को मनाने के एक अनोखी परंपरा है। हर एक त्योहार अलग तरीके से बड़ी ही श्रद्धा भाव से मनाया जाता है और सभी का अपना अलग महत्व है। ऐसे ही त्योहारों में से एक है लोहड़ी का त्योहार जिसे मुख्य रूप से उत्तर भारत विशेष तौर पर पंजाब में बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। यह त्योहार पौष महीने के समापन में मनाया जाता है और इसके बाद माघ महीने की शुरुआत होती है।

लोहड़ी का त्योहार भारत के विभिन्न हिस्सों में फसल के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है जो पूरे देश में भव्य समारोह के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी के त्योहार के उत्सव के द्वारा फसल के मौसम की शुरुआत को चिह्नित करने की यह एक सदियों पुरानी परंपरा है। यह त्योहार हर साल 13 जनवरी को ही मनाया जाता है और ऐसा माना जाता है कि इसके बाद से एक नए महीने का आरंभ हो जाता है। आइए ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ डॉक्टर आरती दहिया जी से जानें इस त्योहार के महत्व और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में। 

लोहड़ी कब मनाते हैं

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हिंदू कैलेंडर के अनुसार लोहड़ी का उत्सव पौष माह में मनाया जाता है और जॉर्जियन कैलेंडर के अनुसार यह हर वर्ष की 13 जनवरी को पड़ता है। यह दिन मकर संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाता है। यह उसी दिन होता है जब तमिलनाडु और असम के क्षेत्रों में क्रमशः 'पोंगल' और 'भोगली बिहू' मनाए जाते हैं। आरती जी बताती हैं कि लोहड़ी का त्‍योहार सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का पर्व है। यह त्योहार विशेष रूप से पंजाबी समुदाय के लोगों के बीच बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी का त्योहार पंजाब के लोगों के द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ माना जाता है। लेकिन आजकल भारत के विभिन्न प्रांतों में यह पर्व मनाया जाने लगा है। यह त्योहार पौष माह की आखिरी रात को मनाया जाता है।

लोहड़ी की तिथि और शुभ मुहूर्त

  • इस साल भी लोहड़ी का पर्व 13 जनवरी को मनाया जाएगा। 
  • 13 जनवरी को सायं 5 बजे के बाद रोहिणी नक्षत्र शुरू हो जाएगा। 
  • लोहड़ी जलाने का शुभ मुहूर्त आरंभ: सायं 5:43 मिनट से आरंभ 
  • लोहड़ी जलाने का शुभ मुहूर्त समाप्त: सायं 7: 25 मिनट तक 

क्यों मनाया जाता है लोहड़ी का त्योहार 

लोहड़ी हिंदुओं के साथ-साथ सिख समुदायों के लोगों के बीच प्रमुख रूप से मनाया जाता है। इस दिन जलाया जाने वाला पवित्र अलाव लोहड़ी समारोह की शुरुआत का प्रतीक है जो शीतकालीन संक्रांति के अंत को भी दर्शाता है। यह सर्दियों की सर्द और लंबी रातों के अंत का प्रतीक है और गर्मियों के अधिक लंबे और गर्म दिनों की शुरुआत का प्रतीक है। यह सूर्य की उत्तर दिशा की यात्रा की शुरुआत का भी प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी का त्योहार रवि की फसल की कटाई के उत्सव का समय है। यह वह समय है जब लोग अच्छी फसल के लिए भगवान सूर्य के अनुग्रह के लिए उनका आभार और धन्यवाद देते हैं।

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लोहड़ी कैसे मनाई जाती है

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लोहड़ी के दिव्य त्योहार का उत्सव पवित्र अग्नि के प्रकाश द्वारा चित्रित किया जाता है जिसे भगवान अग्नि की उपस्थिति और आशीर्वाद को दर्शाते हुए अत्यधिक दिव्य और पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। इस दिन पवित्र अलाव के चारों ओर चक्कर लगाते हुए लोग पूजा और प्रार्थना करते हैं और मूंगफली, गुड़, पॉपकॉर्न, तिल, आदि को अग्नि में समर्पित किया जाता है। यह उत्सव आकर्षक भांगड़ा नृत्य और भक्ति गीतों के गायन के साथ चलता है जो पूरे समारोह को मनोरम और आनंदमय बनाता है। लोग पारंपरिक लोहड़ी पोशाक में आते हैं जो रेशम और सोने के धागे में की गई आकर्षक पंजाबी कढ़ाई से सजी होती है और जिसमें शीशे का काम होता है। लोग लोहड़ी भोजन का आनंद लेते हैं जो आमतौर पर पारंपरिक और शाकाहारी ही होता है।

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लोहड़ी का महत्व 

इस त्योहार का एक सामाजिक महत्व है जिसमें सभी सदस्यों को सामाजिक अपनेपन और प्रेम की भावना प्रदान की जाती है। यह एक ऐसा दिन है जब लोग अपने दिन-प्रतिदिन के कामों से मुक्त हो जाते हैं और परिवार और दोस्तों के साथ खुशी के समय का आनंद लेते हैं। इस विशेष दिन पर, हर कोई सामाजिक मेलजोल का हिस्सा बन जाता है और सामाजिक अंतर को दूर किया जाता है, लोग एक-दूसरे के घरों में जाकर बधाई का आदान-प्रदान करते हैं और एक साथ खुशियां मनाते हैं। इसके अलावा, त्योहार का फसल और उर्वरता से संबंधित विशेष महत्व भी है। भारत एक कृषि प्रधान राष्ट्र के रूप में जाना जाता है और जब खाद्यान्न उत्पादन की बात आती है तो पंजाब सबसे आकर्षक राज्यों में से एक है इसलिए कटाई और लोहड़ी त्योहार का बहुत बड़ा महत्व है। इसलिए लोहड़ी का अवसर कटाई, उर्वरता, फसलों के पकने, संस्कृति, विरासत और एकजुटता की भावना का प्रतीक माना जाता है।

शादी के बाद पहली लोहड़ी का अलग महत्व 

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लोहड़ी की रस्म के अनुसार, नवजात या नवविवाहित दुल्हन को उनकी पहली लोहड़ी पर तिल के लड्डू, भुनी हुई मूंगफली, रेवड़ी, सूखे मेवे और अन्य मिठाइयां और भोजन चढ़ाने का रिवाज है। नई दुल्हन अपनी पहली लोहड़ी पर मेहंदी लगाती है, नए और पारंपरिक कपड़े पहनती है और खुद को गहने और चूड़ियों से खूबसूरती से सजाती है। इस दिन दुल्हन सोलह श्रृंगार करके लोहड़ी की पवित्र अग्नि के चारों तरफ फेरे लेती है। नवजात शिशु की पहली लोहड़ी के संबंध में, मां बच्चे को गोद में लेकर बैठती है और सभी आमंत्रित लोग नवजात शिशु को अपनी शुभकामनाएं और उपहार देते हैं।

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लोहड़ी का इतिहास

इस त्योहार का उत्सव प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। लोहड़ी त्योहार से जुड़ी कई कहानियां हैं, जिनमें से सबसे आम और प्रसिद्ध दुल्ला भट्टी की लोहड़ी कथा है। इसके अनुसार मुगल बादशाह अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी गरीब लोगों के बीच बेहद प्रसिद्ध थे। वह अमीर लोगों और समुदायों को लूटने और फिर उन्हें जरूरतमंद और गरीब व्यक्तियों के बीच उचित रूप से वितरित करने के लिए लोकप्रिय थे। उन्होंने अपने सभी कार्यों के लिए बड़ी लोकप्रियता हासिल की। इसके बाद एक बार दुल्ला भट्टी ने एक लड़की को अपहरणकर्ताओं से बचाया और फिर अपने ही बच्चे की तरह लड़की की देखभाल करने लगा। इसलिए लोहड़ी का त्योहार दुल्ला भट्टी की याद में मनाया जाता है।

इस प्रकार लोहड़ी के त्योहार का अपना अलग महत्व है और इसे बड़ी ही धूम धाम से न सिर्फ पूरे उत्तर भारत बल्कि पूरे देश में बड़े ही उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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