दिल्ली का छत्तरपुर मंदिर जिसे श्री आद्या कात्‍यायनी शक्तिपीठ दक्षिण के नाम से भी जाना जाता है, देश का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर काफी भव्य और बड़ा है। इस मंदिर की भुजाएं करीब 70 एकड़ जमीन में फैली हुई हैं। छत्तरपुर मंदिर की वास्तुकला और नक्काशी पूरी तरह से दक्षिण भारत से प्रेरित है। इसलिए कई जगहों पर इसे दक्षिण भारत की कला का बेहतरीन नमूना भी कहा जाता है। देवी दुर्गा के छठे स्‍वरूप माता कात्यायनी को समर्पित यह मंदिर बेहद खूबसूरत है। लोगों की आस्था है कि छत्तरपुर मंदिर में जाकर जो कुछ मांगो वह मिलता है। लोगों का कहना है कि यहां न सिर्फ लोगों को मनवांछित फल मिले हैं बल्कि कई ऐसी कुंवारी कन्याओं को वर मिले हैं जिनकी सालों से शादी नहीं हो रही थी और कई महिलाओं की यहां आकर गोद भी भरी है। यह तो माता की शक्ति ही है जो लोगों की झोलियां खुशियां से भर जाती हैं। क्या आप जानते हैं कि इस मंदिर में स्थित माता की मूर्ति के लिए जो माला बनाई जाती है उसमें करीब करीब हर तरह का फूल होता है और ये सभी फूल दक्षिण भारत से आते हैं। आजकल नवरात्र चल रहे हैं। इसलिए इस मौके पर हम आपको इस मंदिर से संबंधित कुछ रोचक बातें बताने जा रहे हैं।

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साउथ इंडिया से आते हैं फूल

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छत्तरपुर मंदिर में स्थित माता की मूर्ति को रंग बिरंगे फूलों से सजाया जाता है। मंदिर में विराजमान माता कात्यायनी की मूर्ति बहुत आकर्षक और खूबसूरत है जिसे देखने के लिए दूर दूर से आते हैं। इस प्रतिमा का श्रृंगार रंग-बिरंगे फूलों की माला से किया जाता है। इस माला में कोशिश की जाती है कि हर तरह के फूल को गुथा जाएं। माला में जो भी फूल होते हैं उन सबको दक्षिण भारत से मंगाया जाता है। हालांकि माता का यह भव्य रूप नवरात्र और पूर्णिमा जैसे खास अवसरों पर ही आप देख सकते हैं।

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क्या है मंदिर का इतिहास

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छतरपुर मंदिर की स्थापना 1974 में कर्णाटक के संत बाबा नागपाल द्वारा की गई थी। आपको बता दें कि भले ही आज यह मंदिर 70 एकड़ जमीन में फैला है लेकिन आज से बहुत साल पहले यहां सिर्फ एक कुटिया हुआ करती थी। इस मंदिर में मां दुर्गा अपने छठे रूप माता कात्यायनी के रौद्र स्वरूप में दिखाई देती हैं। अगर आप इस मंदिर में गए हैं तो आपको पता होगा कि माता के एक हाथ में चण्ड-मुण्ड का सिर और दूसरे में खड्ग लिए माता, अपने भक्तों के सब दुख हरने वाली प्रतीत होती हैं। लोगों की इस प्रसिद्ध मंदिर के प्रति गहरी आस्था है।