एमसी मैरी कॉम एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन से भारत का नाम गर्व से ऊंचा किया है। उनकी कहानी बेहद अनूठी है। उन्होंने एक गरीब परिवार में जन्म लिया और कड़े संघर्ष के बाद, आज अपने लिए एक बड़ा मुकाम बनाया। छह बार विश्व चैंपियन बनीं एमसी मैरी कॉम ने टोक्यो ओलंपिक में शानदार आगाज किया। महिला बॉक्सिंग के शुरुआती दौर में उन्होंने डोमिनिकन गणराज्य की मिगुएल ना हर्नान्डिज गार्सिया को हराकर पर शानदार जीत हासिल की। इसी के साथ उन्होंने प्री-क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन इसके बाद अपने अगले मैच में मैरी कॉम कोलंबिया की मुक्केबाज विक्टोरिया इनग्रिट वेलेंसिया से हार गईं। वह भले ही मैच हारी गई, लेकिन उनके शानदार प्रदर्शन ने सबका दिल जीत लिया। भारतीय चैंपियन बॉक्सर मैरी कॉम की पहली जीत और पूरे सफर के बारे में जानें।

इस तरह जीता पहला राउंड

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मैरी कॉम ने पहले राउंड में मिगुएल ना हर्नान्डिज गार्सिया को समझने में थोड़ा सा वक्त लगाया। मुकाबले के शुरुआती दो राउंड में मैरी कॉम ने थोड़ा डिफेंसिव होकर खेला। दूसरी ओर, गार्सिया ने भी आक्रामक बॉक्सिंग की और दूसरे राउंड में कुछ दमदार मुक्कों से कुछ अंक जुटाने में सफल रहीं। हालांकि कुछ ही देर में अपने राइट हुक से मैरी कॉम ने अपना दबदबा बनाए रखा। चार जजों ने मैरी कॉम के प्रदर्शन को बेहतर बताया, वहीं केवल दूसरे जज ने गार्सिया के पक्ष में फैसला दिया। गार्सिया पैन अमेरिकी खेलों की कांस्य पदक विजेता हैं।

इनग्रिट वेलेंसिया से अगली भिड़ंत

मैरीकॉम अपने अगले दौर के मुकाबले में कोलंबिया की तीसरी वरीयता प्राप्त इनग्रिट वेलेंसिया से भिड़ी थीं, जो 2016 रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता हैं। मैरी कॉम दो बार इस कोलंबियाई मुक्केबाज से भिड़ी हैं और दोनों में जीती हैं जिसमें 2019 विश्व चैंपियनशिप का क्वार्टर फाइनल भी शामिल है। मगर इस दफा मैरी कॉम उनसे नहीं जीत पाईं।

कहा ओलिंपिक गोल्ड की कमी है

mary kom indian boxer

एक लीडिंग न्यूजपेपर से बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘मेरे पास अब सारे मेडल हैं। ओलंपिक मेडल (ब्रॉन्ज) 2012 में जीता, राष्ट्रमंडल खेलों का गोल्ड, छह बार का गोल्ड विश्व चैंपियनशिप में जीता। इन्हें गिनना आसान है लेकिन मुश्किल चीज लगातार जीतते रहना है, यह आसान नहीं है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘सिर्फ ओलिंपिक गोल्ड मेडल रह गया है। यही मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ कोशिश कर रही हूं, अगर मैं कर पायी तो यह शानदार होगा। लेकिन अगर नहीं हो पाया तो भी मैं अपने सभी मेडल से खुश रहूंगी।’

कैसा था शुरुआती जीवन

वर्ल्ड बॉक्सर चैंपियन मैरी कॉम का जन्म 1 मार्च, 1983 को मणिपुर के कन्गथेई में एक आर्थिक रुप से कमजोर और गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता एक किसान थे, जो किसी तरह से अपने परिवार का गुजर-बसर करते थे। मैरी कॉम  अपने 4 भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। उन्होंने परिवार का पालन-पोषण करने में अपने माता-पिता की बहुत मदद की।

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बॉक्सिंग में ऐसे जगी रुचि

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1998 में, मुक्केबाज डिंग्को सिंह ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता और अपनी मातृभूमि को गौरवान्वित किया। इस घटना ने उन्हें बॉक्सिंग के लिए प्रेरित किया। हालांकि इस खेल को अपनाने का काम उनके लिए चुनौती बन गया था, क्योंकि उनके माता-पिता को लगा कि यह खेल पुरुषों का है। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और इंफाल जाकर मणिपुर स्टेट बॉक्सिंग के कोच एम.नरजित सिंह को उन्हें बॉक्सिंग सीखने का अनुरोध किया। कोच के मानने के बाद, वह मन लगाकर ट्रेनिंग करने लगीं और देर रात तक भी अभ्यास करती थीं।

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करियर की शुरुआत

उनकी पहली करियर जीत 2000 में हुई जब उन्होंने मणिपुर में महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में पहले राज्य स्तरीय आमंत्रण पर सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज का पुरस्कार जीता। उसके बाद वह पश्चिम बंगाल में आयोजित सातवीं ईस्ट इंडिया महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने के लिए आगे बढ़ी। मैरी कॉम ने 18 साल की उम्र में साल 2001 में इंटरनेशनल लेवल पर अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने अमेरिका में आयोजित हुई AIBA वीमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 48 किलो भार वर्ग में सिल्वर मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया। इस तरह उन्होंने लगातार जीतकर अपना नाम बॉक्सिंग की दुनिया में बनाया।

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हमें उम्मीद है कि मैरी कॉम एक बार फिर देश का नाम रोशन करेंगी। उनके आने वाले मैच के लिए बहुत शुभकामनाएं। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे लाइक और शेयर करें। टोक्यो ओलंपिक से जुड़ी ऐसी अन्य खबरों के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी के साथ।

Image Credit : www.instagram.com/marykom