मंजरी चतुर्वेदी भारतीय क्लासिकल डांस फॉर्म कथक की मशहूर नृत्यांगना हैं। पिछले दिनों अपनी डांस परफॉर्मेंस रोके जाने की वजह से वह सुर्खियों में आईं थीं। क्लासिकल डांस के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने वाली उनके जैसी बड़ी कलाकार ने इससे प्रभावित हुए बिना कहा, 'मैं अपने डांस परफॉर्मेंस के जरिए गंगा-जमुनी तहजीब के बारे में बात करती रहूंगी।' भारत में सूफी कथक की अवधारणा विकसित करने वाली मंजरी चतुर्वेदी एकमात्र कलाकार हैं। उन्होंने सूफी रवायतों को भारतीय क्लासिकल डांस के साथ मिलाकर सूफी कथक जैसी नई विधा का सृजन किया। इस आर्ट फॉर्म के जरिए मंजरी चतुर्वेदी ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया था, जो नया भी था और जिसमें करीब 700 साल पुराने इतिहास की भी झलक मिलती थी। मंजरी ने पूरी दुनिया में 200 से ज्यादा कॉन्सर्ट किए, जिनमें यूरोप के कई देश शामिल हैं। इनमें फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, इटली, ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, यूके और आयरलैंड जैसे देश शामिल हैं। मिडल ईस्ट में उन्होंने दुबई, बहरीन, अबू धाबी, कतर, कुवैत और दक्षिण पूर्व एशिया में सिंगापुर, मलेशिया और श्रीलंका जैसे देशों में भी प्रस्तुति दी। यही नहीं सेंट्रल एशिया में भी उन्होंने तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान उज़्बेकिस्तान और तजाकिस्तान जैसे देशों में उन्होंने सूफी कथक की यादगार परफॉर्मेंसेस दीं। मंजरी चतुर्वेदी ने HerZindagi के साथ एक्सक्लूसिव बाचतीत में अपने इस अनूठे सफर के बारे में विस्तार से बातचीत की।

नृत्य में निर्गुण भक्ति से रचा नया इतिहास

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मंजरी चतुर्वेदी के सूफी कथक में निर्गुण भक्ति के भावों ऐसा है, जिससे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। माना जाता है कि संगीत में वह रुहानी ताकत है, जो इंसान के सभी तनावों को दूर कर उसे ऊर्जा और उल्लास से भर देता है। खासतौर पर सूफी संगीत को अलौकिक माना जाता है। मंजरी चतुर्वेदी बताती हैं, 'हमारे यहां सगुण भक्ति ज्यादा देखने को मिलती है। निर्गुण भक्ति अभी तक संगीत में थी, लेकिन नृत्य में नहीं थी। मेरा नृत्य निर्गुण भक्ति की बात करता है। वह उस परमात्मा की बात करता है, जो निराकार है, जो परमब्रह्म है। ब्रह्म में लीन होने की जो प्रवृत्ति है, वह मेरे नृत्य में निर्गुण में लीन होने के लिए है।' 

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मंजरी काले लिबास में बिना मेकअप के बाल खोलकर डांस करती हैं। दर्शकों के लिए यह बिल्कुल अलग अनुभव है। इस पर मंजरी कहती हैं, 'अगर आपको उस आत्मा का नृत्य देखना है, तो वह इस शरीर से परे है।' कुछ दर्शक उनकी प्रस्तुति देखकर रो भी पड़ते हैं। मंजरी ने ऐसे ही एक अनुभव के बारे में बताया, 'एक दर्शक ने बताया कि मैं आपका शो देखते हुए एक घंटे तक रोया। मुझे कोई दुख नहीं है, फिर भी मैं रोया। मैं समझती हूं कि क्यों। कहीं ना कहीं यह इमोशन होता है, जिसके कारण हमारा कनेक्ट बन जाता है।' 

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भावपूर्ण दृश्यों से मोह लेती हैं मन 

मंजरी चतुर्वेदी जब भी स्टेज पर जाती हैं, तो अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लेती हैं और उन्हें उस अलौलिक दुनिया में लेकर जाती हैं, जहां आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। कथक के लखनऊ घराने का प्रतिनिधित्व करने वाली मंजरी एनवायरमेंटल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। अपने पिता से मिले सपोर्ट के बारे में उन्होंने बताया, 'मेरे पिता आईआईटी रुढ़की के प्रोफेसर थे, रूरल डेवलपमेंट के लिए उन्होंने काफी काम किया था। उनसे प्रेरित होकर मैंने एमएससी किया। तब यानी 20 साल पहले नृत्य संगीत ऑर्गनाइज्ड नहीं था। फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिहाज से उन्होंने मुझे एमएससी की पढ़ाई करने के लिए कहा, लेकिन कभी अपनी पसंज की चीजें करने से रोका नहीं। 

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दायरों से बाहर नए प्रयोग किए

अवध की संस्कृति परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ट्रडीशन और आधुनिकता का खूबसूरती से संगम किया है। हालांकि उनकी इस विधा को बहुत से प्यूरिस्ट्स (शुद्धतावादी) ने समर्थन नहीं दिया, लेकिन इससे मंजरी प्रभावित नहीं हुईं। उनका कहना था, 'नई चीज के लिए सोचने और समझने में वक्त लगता है। शुद्धतावादियों का नजरिया अपनी जगह सही है, क्योंकि अगर वे अपना दायरा नहीं बना कर रखेंगे तो उनका वजूद बिखर जाएगा। लेकिन हमारा भी फर्ज है कि उस दायरे से बाहर निकलें और कुछ नया करें, जिसे आज आउट ऑफ द बॉक्स कहा जाता है।  

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सूफी कथक के लिए की गहन रिसर्च

मंजरी को कथक की शिक्षा पंडित अर्जुन मिश्र से मिली थी। मंजरी ने सूफी कथक की अवधारणा विकसित करने से पहले इस पर गहन रिसर्च की की। उन्होंने 13 साल तक इस विषय पर काम किया। इसके लिए वह मिस्र, किर्गिस्तान उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और तजाकिस्तान जैसे देशों की यात्रा पर गईं। यही नहीं, सूफी प्रभाव वाले देशों जैसे कि ईरान, तुर्की, मोरक्को जैसे देशों के कलाकारों से संगीत और डांस फॉर्म्स की शिक्षा ली। मंजरी बताती हैं, 

'मैंने 1995 -2000 के बीच लाइब्रेरी से रिसर्च की। आज के दौर में बहुत सी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। लेकिन मुझे जानकारी इकट्ठा करने में बहुत वक्त लगा। मैं वीडियोज को लेकर सेंट्रल एशिया, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान गई। वहां जाकर मैंने वहां के डांस फॉर्म्स को स्टडी किया।' 

सूफी कथक है एक तरह का मेडिटेशन

सूफी कथक में प्रेम, पर्शियन पोएट्री से लेकर निर्विकार ब्रह्म के लिए भक्ति का प्रभाव देखने को मिलता है। सूफी कथक को मंजूरी चतुर्वेदी शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का नृत्य मानती हैं। उनके अनुसार ईश्वर की मौजूदगी में डांस परफॉर्मेंस एक तरह का मेडिटेशन है। मंजरी चतुर्वेदी ने अपने प्रयासों से इस डांस फॉर्म को नए आयाम दिए हैं। सूफी कत्थक में राजस्थानी, कश्मीरी संस्कृति की झलक मिलने के साथ अवध की कव्वाली, पंजाब के बुल्ले शाह की पोएट्री और ईरान का आध्यात्मिक प्रभाव भी नजर आता है। हालांकि मंजरी चतुर्वेदी को इस क्षेत्र में काम करते हुए एक दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी वह उतनी ही ऊर्जा से अपनी कला को प्रभावपूर्ण बनाए रखने के प्रयासों में लगी हुई हैं।  

All Images Courtesy: Instagram(@manjarichaturvedi)