आजकल जो बीमारी महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है वो है PCOS, इस बीमारी की वजह से महिलाएं अलग-अलग तरह के लक्षणों से गुजर रही हैं और अब हर उम्र की महिला इससे ग्रसित पाई जाती है। एक तरह से देखा जाए तो ये कॉमन होती बीमारी कई तरह की अलग समस्याएं लेकर आती है। पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) एक जटिल स्थिति है जिसमें ओवरीज में गांठ हो जाती हैं। 

इन दिनों हर पांच में से एक महिला के साथ ये समस्या हो रही है और इसकी गिनती लगातार बढ़ती ही चली जा रही है। कई बार तो महिलाएं दर्द सहती रहती हैं और उनको पता भी नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। 

पीसीओएस के बारे में जानने के लिए हमने इंदिरा आईवीएफ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सह-संस्थापक डॉ. क्षितिज मुर्दिया से बात की। डॉक्टर क्षितिज लंबे समय से मेडिकल फील्ड में काम कर रहे हैं और फर्टिलिटी एक्सपर्ट भी हैं। उन्होंने हमें बताया कि किस तरह से पीसीओएस की समस्या का पता लगाया जा सकता है और किस तरह के टेस्ट जरूरी हैं। 

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इन लक्षणों से की जा सकती है पीसीओएस की पहचान-

डॉक्टर क्षितिज के मुताबिक पीसीओएस के कुछ ऐसे लक्षण हैं जिनसे इसकी पहचान की जा सकती है, जैसे कि एंड्रोजेंस (या पुरुष हार्मोन) की मौजूदगी, ओवेरियन डिस्‍फंक्‍शन, अनियमित पीरियड, इंसुलिन का अधिक प्रतिरोध, मोटापा, मुंहासे, चेहरे पर अधिक बाल आदि। पीसीओएस को चेक करने के लिए और लक्षणों की मौजूदगी में कराए जाने वाले उपचार के लिए अलग-अलग तरह के टेस्ट हैं।  

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हार्मोन्स के लिए करवाए जाते हैं ये टेस्ट-

मरीज पीसीओएस से पीड़ित है या नहीं, इसकी जांच कुछ हार्मोन्स के स्‍तरों के आधार पर की जा सकती है। 

टेस्टोस्टेरोन: यह मुख्य रूप से पुरुष हार्मोन होता है, सामान्य से अधिक स्तरों में इसकी मौजूदगी पीसीओएस का सूचक है। 

फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (FSH): एफएसएच का संबंध ओवरीज के काम को ठीक तरह से पूरा करना और एग्स को रिलीज करने से है, ये फॉलिकल्स को बढ़ाता है। पीसीओएस से प्रभावित महिलाओं में, एफएसएच का स्तर सामान्य से कम होता है। 

ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH): एलएच (LH) वह हार्मोन है जिसका संबंध एग्स के रिलीज होने (अंडोत्सर्ग (Ovulation)) से है और पीसीओएस की स्थिति में यह सामान्य से अधिक मात्रा में पाया जा सकता है। एलएच की अधिक मात्रा के चलते एंड्रोजेंस का स्तर बढ़ जाता है और जब इसके साथ-साथ एफएसएच का लेवल भी कम हो, तो ओवरीज में एग्स ठीक से नहीं डेवलप हो पाते हैं और ओव्यूलेशन बंद हो जाता है।  

ओएस्ट्रोजेन: पीसीओएस की स्थिति में ओएस्ट्रोजेन की अधिकता हो सकती है या इस हार्मोन का लेवल अधिक बढ़ सकता है।  

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कई टेस्ट जो पीसीओएस के लक्षण बता सकते हैं- 

हार्मोनल उतार-चढ़ाव के अलावा शरीर कई तरह से पीसीओएस से जुड़े लक्षणों के बारे में बताता है। इनके बारे में ऐसे जानें- 

डायबिटीज की जांच कर लें- 

इंसुलिन प्रतिरोध, पीसीओएस का एक लक्षण है। इंसुलिन ग्लूकोज को तोड़ने में मदद करता है और इस प्रकार, ब्‍लड ग्‍लूकोज के लेवल को नियंत्रित बनाए रखता है। जब पीसीओएस के चलते शरीर में इंसुलिन का प्रतिरोध विकसित होता है, तो लंबी अवधि में इसके चलते डायबिटीज की समस्या हो सकती है।  

कोलेस्ट्रॉल का स्तर- 

ब्‍लड ग्‍लूकोज का लेवल अधिक होने पर महिला का वजन बढ़ सकता है। इसके चलते ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ सकता है और गुड-कोलेस्ट्रॉल का स्तर घट सकता है। कोलेस्ट्रॉल टेस्ट के जरिए इसका पता चल सकता है और रहते उसका ट्रीटमेंट किया जा सकता है।  

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अल्ट्रासाउंड- 

अल्ट्रासाउंड के जरिए पेल्विक एरिया का इमेज स्कैन करके अंडाशयों की रूपरेखा का पता लगाया जा सकता है। इस विधि के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि उनमें गांठें मौजूद हैं या नहीं और यदि मौजूद हैं तो उनके आकार एवं संख्या का पता चल सकता है। पीसीओएस से प्रभावित महिलाओं के अंडाशय सामान्य महिलाओं की तुलना में बड़े होते हैं।  

पेल्विक जांच-  

डॉक्टर द्वारा पेल्विक जांच करके यह पता लगाया जा सकता है कि वेजाइना, सर्विक्स या रेक्टम में कहीं कुछ असामान्य तो नहीं है। इससे संक्रमण या ट्यूमर का पता चल सकता है। 

इन जांचों के अलावा, डॉक्‍टर्स द्वारा ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन (एचसीजी) टेस्‍ट या प्रेग्नेंसी टेस्‍ट के लिए परामर्श दिया जा सकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पीरियड न आने का कारण कहीं प्रेग्नेंसी तो नहीं है। 

 

एंटी-मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) टेस्‍ट एक अन्‍य जांच है जिसके जरिए पीसीओएस की संभावना का पता लगाया जा सकता है। यही नहीं, अपर्याप्त थायराइड स्तर या ट्यूमर की मौजूदगी जैसे लक्षणों से भी पीसीओएस का पता चल सकता है।  

सभी टेस्ट रिजल्ट के आधार पर, डॉक्टर द्वारा पीसीओएस को नियंत्रित करने के लिए प्लान बताया जा सकता है। नियमित रूप से ओव्यूलेशन न होने के चलते भी स्वाभाविक रूप से प्रेग्नेंट हो पाना मुश्किल हो सकता है। इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी महिलाओं को गर्भधारण कराने में सहायक साबित हो सकती है।  

ये सभी टेस्ट्स पीसीओएस की समस्या के बारे में जानने के लिए हैं, लेकिन हो सकता है कि आपकी मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर डॉक्टर आपको कुछ और टेस्ट्स करवाने के बारे में कहे। डॉक्टर्स की सलाह इस मामले में सबसे बेहतर हो सकती है और किसी भी तरह के ट्रीटमेंट को शुरू करने से पहले डॉक्टरी सलाह जरूर लें।  

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