कल यानी 17 नवंबर को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 10 दिन का 'कव्वाली फोटो प्रोजेक्ट' नाम के एग्जीबिशन का उद्घाटन हुआ। इस एग्जीबिशन का उद्घाटन नीति आयोग के अध्यक्ष अमिताभ कांत, जाने-माने फोटोग्राफर रघु राय और फिल्ममेकर मुजफ्फर अली ने किया था। 

इस अपनी तरह के अलग एग्जीबिशन को कंसेप्चुलाइज करने वाली प्रसिद्ध कथक डांसर और गुरु मंजरी चतुर्वेदी हैं। इस प्रदर्शनी की खास बात यह है कि इसमें पहली बार कव्वाली और उसके गाने वालों पर इस तरह की फोटो डॉक्यूमेंटरी बनाई गई है। उद्घाटन में कव्वाली के इतिहास पर दास्तानगो अस्करी नकवी ने दस्तानगोई और कव्वाली से समा बांध दिया था।

खास बात यह है कि प्रदर्शनी में आपको जाने-माने फोटोग्राफर दिनेश खन्ना, मुस्तफा कुरैशी और लीना केजरीवाल की तस्वीरें देखने को मिलेंगी। फोटोग्राफर दिनेश खन्ना, मुस्तफा कुरैशी और लीना केजरीवाल की नजरों से सामने आई कव्वालों की दुनिया कुछ ऐसी है, जिसे आपने पहले कभी नहीं देखा होगा। तीनों ही फोटोग्राफर ने अपनी-अपनी तस्वीरों में कव्वालों और सूफी सिंगर्स का एक अलग ही रूप दिखाया। एक अलग, जुदा और महत्वपूर्ण जुड़ाव दिखाया।

तीन फोटोग्राफर के आईने से देखें कव्वालों की दुनिया

photo documentry on qawwali singers

अपने लेंस से इन खूबसूरत तस्वीरों को सामने वाले तीनों फोटोग्राफर एक अलग कहानी दिखाते हैं। दिनेश खन्ना की कहानियां दिल्ली, अमृतसर, जयपुर, हैदराबाद और अजमेर के महत्वपूर्ण मंदिरों की यात्रा करती हैं और धार्मिक स्थलों पर संगीत के एक अभिन्न अंग के रूप में परंपराओं की पेचीदगियों को सामने लाती हैं।

मुस्तफा कुरैशी की कहानियां दो प्रमुख मंदिरों देवा शरीफ और सफीपुर में एक-दूसरे से दिलचस्प तरीके से जुड़ी है। दिलचस्प बात यह है कि ऐसा कहा जाता है कि देवा शरीफ के संत वारिस अली शाह का जन्म तब हुआ था, जब उनके पिता कुर्बान अली शाह, 90 किलोमीटर दूर सफीपुर के एक मंदिर में थे। यहां उन्हें बताया गया था कि उनका बेटा उस क्षेत्र का सबसे बड़ा संत बनेगा। मुस्तफा ने दिल्ली और हजरत सलीम चिश्ती की भव्यता को समान रूप से एक्सप्लोर किया है।

वहीं, लीना केजरीवाल की कहानियों ने हममें ज्यादा उत्सुकता जगाई। परंपरा से एकदम विपरीत, बड़ा ही दिलचस्प था महिला कव्वालों को परफॉर्म करते देखना। बड़े पैमाने पर पुरुष प्रधान कला में महिलाओं को यह रूढ़िवाद तोड़ते देखना और इस संगीत के प्रदर्शन में भाग लेने का दस्तावेजीकरण करना महत्वपूर्ण है। कहानी जारी रहती है, जिसमें दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कव्वालों को अपने पीर के लिए प्रार्थना के रूप में गाते हुए कैप्चर किया गया।

कव्वाली में उतरती महिलाएं

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कव्वाली की परंपरा ऐसी रही है, जिसमें अक्सर ही बड़े पैमाने पर पुरुषों द्वारा परफॉर्म किया जाता है। संगीत और उसका ज्ञान भी परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ साझा किया जाता है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। हालांकि इसी के साथ हमने बीते कुछ समय में कुछ बदलाव भी देखे और देखा कुछ महिलाओं को अपने लिए इस क्षेत्र में एक अलग जगह बनाते हुए। कव्वाल शकीला बानो भोपाली, स्वतंत्रता से पहले जन्मी पहली महिला कव्वाल थीं। उन्होंने व्यावसायिक प्रदर्शन में बड़े पैमाने पर गाया। अकमल हैदराबादी ने उन पर सेमिनल बुक पर लिखी थी, 'कव्वाली अमीर खुसरो से शकीला बानो तक'।

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आज के समय में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं आगे आ रही हैं और खुद सूफी सिंगर की बजाय कव्वाल के रूप में आ रही हैं। यह कव्वाली की कला को कैसे प्रभावित करता है, संगीत में जेंडर कैसी भूमिका निभाएगा, इन सभी पर चर्चा और बहस की जरूरत है। फोटोग्राफर, इसे डॉक्यूमेंट करने के लिए एक गवाह के रूप में, बिहार में डॉक्यूमेंटेशन करने के लिए लोकप्रिय कव्वाल चंचल भारती के साथ यात्रा करते हैं। वह अपने ग्रुप की प्रमुख कव्वाली गायिका हैं, जिसमें उनके साथ संगीतकारों की एक टीम है।

निजामुद्दीन बस्ती की युवा लड़कियां सीखती हैं कव्वाली

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पिछले कुछ वर्षों में, 'द होप प्रोजेक्ट' के श्री समीपुर रहमान ने निजामुद्दीन बस्ती की युवा लड़कियों को संगीत सिखाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया है। उन्हें दिल्ली घराना के दिग्गज स्वर्गीय उस्ताद इकबाल अहमद खान के मार्गदर्शन में पढ़ाया जाता है। हजरत इनायत खान के 73वें उर्स समारोह के अवसर पर वरिष्ठ लड़कियों ने अमीर खुसरो की मनमोहक रचनाएं भी प्रस्तुत की थीं। इस प्रोजेक्ट की स्थापना 1975 में सूफी शिक्षक, पीर विलायत इनायत खान द्वारा लोगों को विशेष रूप से गरीब और कमजोर लोगों को उनकी छिपी क्षमता को प्रकट करने के अवसर और संसाधन प्रदान करने के लिए की गई थी। और ऐसा कहा जा सकता है कि लड़कियां और महिलाएं इस पुरुष प्रधान कला के क्षेत्र में अपनी जगह बना पा रही हैं। 

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पसंद की जा रही हैं एग्जीबिशन में लगी तस्वीरें

दिनेश खन्ना की पंजाब में एक दरगाह पर लगी मंदिर जैसी घंटियों की तस्वीर या फिर मुस्तफा कुरैशी की वो तस्वीर जिसमें एक कव्वाल कंधे पर हार्मोनियम लिए जा रहा है, काफी पसंद की जा रही है। हमारे साथ-साथ लोगों की नजरें लीना केजरीवाल की महिला कव्वाल की डॉक्यूमेंटेशन पर टिकी थीं।

इस एग्जीबिशन की क्यूरेटर मंजरी चतुर्वेदी कहती हैं, 'यह सह-अस्तित्व की हमारी संस्कृति है, जिसे शायद अब हम इसे महत्व नहीं देते हैं। यही वजह है कि डॉक्यूमेंटेशन को यह और भी अधिक प्रासंगिक बनाता है। इन फोटोग्राफरों ने शहरों और गांवों के नक्शे से दूर दिन बिताए हैं। एक बेहतरीन और ऐतिहासिक तस्वीर के लिए सही समय के इंतजार में घंटों बिताए हैं। कोई सेट अप नहीं है, कोई बाहरी प्रबंधन नहीं है, कोई रोशनी नहीं है, कोई नाटक नहीं है। कुछ है, तो वह बस भावनाएं और ऊर्जा है।'

वहीं अमिताभ कांत कहते हैं, 'यह प्रदर्शनी मेरे बचपन को फिर से जीने की तरह है। मैं कव्वाली को सुनकर और इस संस्कृति को देखकर बड़ा हुआ हूं। मैं इस प्रदर्शनी पर मंजरी को बधाई देता हूं।'

यह कार्यक्रम आईआईसी दिल्ली में 10 दिनों तक चलता है और हर शाम को कव्वाली प्रदर्शन भी होगा।

कव्वाली के इतिहास को करीब से जानना हो, तो इस एग्जीबिशन का रुख जरूर करें और गजब की फोटो डॉक्यूमेंटरी देखें। हमें उम्मीद है आपको यह लेख पसंद आया होगा। इसे लाइक और शेयर करें और इस तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।