
भगवान शिव जो पूरे पृथ्वी लोक के पालनहार हैं। उन्हें देवों के देव महादेव के नाम से जाना जाता है। आप सभी शिव मंदिर जाते हैं और आपने ये तो देखा होगा की शिवलिंग के ऊपर तांबे या मिट्टी के कलश से जल की बूंद टपकते रहती है। क्या आप जानते हैं इसके पीछे के कारण या रहस्य के बारे में यदि नहीं तो आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि स्टैंड के ऊपर रखे कलश से जल की बूंद टपकने के पीछे क्या महत्व है और शिवलिंग के जलाधारी नलिका को क्यों नहीं लांघ जाता है।

शिवपुराण और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कलश से टपकते हुए जल का संबंध समुद्र मंथन से किया गया है। कहा जाता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था तब अमृत निकलने से पहले हलाहल विष का पात्र निकला था। जब हलाहल विष का पात्र निकला था तब सभी देवता और असुर परेशान हो गए की अब इस विष का क्या करें। समुद्र मंथन के नियम के अनुसार जब कोई विष धारण करेगा तभी मंथन से अमृत निकलेगा। ऐसे में देवता और असुर के सलाह और बातचीत के बाद सभी ने भगवान शिव को याद किया और सभी ने उनसे विष पीने के लिए प्रार्थना की। जिसके बाद भगवान भोलेनाथ देवताओं और असुरों की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए विषपान किए। विष पीने के बाद भगवान शिव का कंठ (गला) नीला पड़ गया और उनके पूरे शरीर में जलन होने लगा। तब उनके सिर और शरीर को ठंडा एवं शांत करने के लिए उनके ऊपर जलाभिषेक किया गया। पानी डालने से उन्हें जलन से राहत मिली जिसके बाद से उन्हें जलाभिषेक अत्यंत प्रिय हो गया (रुद्राभिषेक के फायदे और महत्व)। विष धारण करने के बाद जब उनका कंठ नीला पड़ गया तब भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा।
मान्यता है कि तीन पाए वाले स्टैंड में त्रिदेव यानी ब्रम्हा, विष्णु और महेश का वास होता है और तांबे के कलश से चढ़ाया हुआ जल गंगाजल के समान माना गया है। इसलिए मंदिरों और शिवालय में तीन पाए वाले स्टैंड में तांबे का कलश रखा जाता है। इसके अलावा गर्मियों में कई जगह तांबे के पात्र के बजाए मिट्टी के घड़े (मिट्टी के घड़े के उपाय) में पानी भर कर रखा जाता है। इसके पीछे लोकमान्यता है कि गर्मियों में मिट्टी के बर्तन में रखा पानी अन्य पात्र के अलावा ज्यादा शीतल रहता है इसलिए मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल किया जाता है।
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सभी मंदिर और देवी-देवताओं की परिक्रमा पूरी की जाती है लेकिन शिवलिंग की परिक्रमा आधी की जाती है यानी अर्ध चंद्र परिक्रमा। आधी परिक्रमा को लेकर पुराणों में यह मान्यता है कि जलाधारी से निरंतर जल की धारा बहती रहती है इसलिए उसे लांघने से पाप लगता है।
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ये रही जलाभिषेक और टपकते हुए जल के पीछे का रहस्य। हमें कमेंट कर बताएं की आपको ये जानकारी कैसी लगी। इस लेख को लाइक करें और ऐसे ही आर्टिकल के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
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