नवरात्रि के पहले दिन लोग अपने घरों में घटस्थापना करते हैं। घटस्थापना के साथ ही लोग देवी दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा करते हैं। मां शैलपुत्री का स्वरूप चंद्रमा से संबंधित होता है। अगर आप नवरात्रि के पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा करते हैं तो आप पर यदि चंद्रमा से जुड़ा कोई दोष होता है तो वह दूर हो जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री बताते हैं, ‘ देवी शैलपुत्री की पूजा करने से चंद्र की अनुकूलता बनी रहती है। इससे मानसिक सुख और शांति की प्राप्ती होती है।’ इसलिए अगर आप चाहती हैं कि आप हमेशा सुखी रहें तो आपको नवरात्रि के प्रथम दिन देवी शैलपुत्री की पूजा अवश्य करनी चाहिए। 

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कैसे करें पूजा 

देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप देवी शैलपुत्री हमेशा सफेद रंग के कपड़े धारण करती हैं। आपको भी पूजा करते वक्त सफेद रंग के कपड़े धारण करने चाहिए। आपको घटस्थापना करने के बाद मां शैलपुत्री की तस्वीर को अलग से पाटे पर स्थापित करने के बाद मां की अराधना करनी चाहिए। आपको बता दें कि मां शैलपुत्री को आप सफेद रंग के फूल चढ़ाएं और सफेद रंग की ही मिठाई चढ़ाएं। आप खीर या फिर सफेद रंग की कोई भी मिठाई देवी जी को चढ़ा सकती हैं। इसके बाद आपको देवी शैलपुत्री की कथा पढ़नी चाहिए और उनकी आरती करनी चाहिए। इसके बाद आपको मां के समक्ष कपूर जालकर उनकी आरती करनी चाहिए। नवरात्रि में सेंधा नमक क्‍यों खाना चाहिए?

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Devi Shailputri Puja Vidhi

कौन सी राशि वालों को करनी चाहिए पूजा 

मेष और वृश्चिक राशि के जातक को भगवती तारा माता शैलपुत्री की साधना करने से लाभ मिलता हैं। आपको गाय के दूध से बने पकवान देवी जी पर अर्पित करने चाहिए और पिपरमिंट युक्त मीठे मसाला पान, अनार और गुड़ भी देवी जी को चढ़ाना चाहिए। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन मां को घी का भोग लगाने से भक्त निरोगी रहते हैं और उनके सारे दुःख ख़त्म होते हैं। इसके साथ ही आपको देवी जी के इस मंत्र का जाप भी करना चाहिए। नवरात्रों में नहीं जा पा रही हैं वैष्णो देवी तो दिल्ली के इन 4 मंदिरों में टेक लीजिए माथा

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कैसा होता है देवी जी का स्वरूप 

माँ दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरुप शैलपुत्री है,शैल का मतलब शिखर।शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत (शिखर) की बेटी के नाम से जाना जाता है।आमतौर पर यह समझा जाता है,कि देवी शैलपुत्री कैलाश पर्वत की पुत्री है। मगर यह गलत है। एक कथा के अनुसार दक्षप्रजापति ने एक यज्ञ का आयोजन किया मगर उसमें भगवान शिव को नहीं बुलाया। जब यह बात सती को पता चली तो उन्हें बहुत ही अपमानित महसूस हुआ और दुख हुआ तब उन्होंने यज्ञाग्नि में खुद को भस्म कर लिया। तब भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ को तहस नहस कर दिया। वही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। नवरात्रि से जुड़ी ये क्विज खेलें