मां पार्वती ने भगवान शिव से एक सवाल पूछा जिसके बाद भोले नाथ ने एक कहानी सुनाई और अमर हो गया कबूतर का जोड़ा। अमरनाथ धाम हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए बहुत महत्व रखता है। जम्मू-कश्मीर की वादियों में स्थित अमरनाथ धाम जाने के लिए भगवान शिव के भक्त साल भी इंतजार करते हैं। चार धाम की तरह भक्तगण इस पूजनीय यात्रा को जीवन में एक बार करने की इच्छा अवश्य रखते हैं। अमरनाथ यात्रा के बारे में कहा जाता है कि यहां भोले की मर्जी के बिना भक्त नहीं पहुंच पाते हैं। जिसे भगवान शिव बुलाना चाहते हैं वही उनका दर्शन कर पाते हैं। अमरनाथ यात्रा हर साल जून-जुलाई के महीने में शुरू होती है और इस साल भी यह यात्रा शुरू हो चुकी है।

amarnath yatra lord shiva

अमरनाथ की यात्रा बेहद रोमांचक है क्योंकि यह यात्रा धरती पर स्वर्ग के जैसी है। हिमालय की गोदी में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे ज्यादा आस्था वाला पवित्र तीर्थस्थल है। अमरनाथ की खासियत पवित्र गुफा में बर्फ से शिवलिंग का बनना है, प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे 'हिमानी शिवलिंग' या 'बर्फानी बाबा' भी कहा जाता है। 

भगवान शिव ने बताया अमर होने का रहस्य 

अमरनाथ हिन्दी के दो शब्द ‘अमर’ अर्थात ‘अनश्वर’ और ‘नाथ’ अर्थात ‘भगवान’ को जोडने से बनता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से अमरत्व के रहस्य को प्रकट करने के लिए कहा जो वे उनसे लंबे समय से छुपा रहे थे। तो यह रहस्य बताने के लिए भगवान शिव, पार्वती को हिमालय की इस गुफा में ले गए ताकि उनका यह रहस्य कोई भी ना सुन पाए और यहीं भगवान शिव ने देवी पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया।

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पुराणों में वर्णित है कि एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, आप अजर-अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर फिर से वर्षों की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यों? और आपके कंठ में पड़ी यह नरमुण्ड माला तथा आपके अमर होने का रहस्य क्या है?

भगवान शिव ने माता पार्वती से एकांत और गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा जिससे कि अमर कथा कोई अन्य जीव ना सुन पाए क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता है वह अमर हो जाता।

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पुराणों के मुताबिक शिव ने पार्वती को इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में अपनी साधना की अमर कथा सुनाई थी जिसे हम अमरत्व कहते हैं।

कहते हैं भगवान भोलेनाथ ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, जटाओं से चंद्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगाजी को पंचतरणी में तथा कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया।

इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। अगला पड़ाव गणेश पड़ता है इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है। पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया।

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इस प्रकार महादेव ने जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके बाद मां पार्वती साथ उन्होंने गुप्त गुफा में प्रवेश कर किया और अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया।

कबूतरों ने सूनी अमर होने की कथा 

कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं जिसका शिवजी को पता नहीं चला। भगवान शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। उस समय दो सफेद कबूतर शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। भगवान शिव को लगा कि माता पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली।

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कथा समाप्त होने पर भगवान शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया जो सो रही थीं। जब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी तो वे क्रोधित हो गए और उन्हें मारने के लिए आगे बढ़े। इस पर कबूतरों ने भगवान शिव से कहा कि, 'हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर भगवान शिव ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप में निवास करोगे।

अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर-अमर हो गया। ऐसा कहते हैं आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होते हैं और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई और इसका नाम अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।