स्मिता पाटिल बॉलीवुड की ऐसी ऐसी दमदार अभिनेत्री रहीं, जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है। स्मिता पाटिल ने पैरेलेल सिनेमा के साथ कमर्शियल सिनेमा में भी कामयाबी हासिल की।  स्मिता पाटिल का जन्म मुंबई में 17 अक्टूबर को हुआ था। स्मिता के पिता शिवाजी राय पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे, जबकि उनकी मां एक सोशल वर्कर थीं। स्मिता पाटिल ने फिल्मों में बहुत तेजी से लोकप्रियता हासिल की, लेकिन 31 साल की कम उम्र में ही वह इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। बेटे के जन्म के कुछ दिनों बाद ही स्मिता पाटिल बीमार हो गईं और आखिरकार उनकी मौत हो गई। स्मिता पाटिल की 14 फ़िल्में रिलीज हुईं। 'गलियों का बादशाह' वह आखिरी फ़िल्म थी, जिसमें वह नजर आई थीं। आइए जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ अनसुनी बातें-

दूरदर्शन में न्यूज रीडर के तौर पर किया काम

smita patil popular actress of her times

स्मिता पाटिल जब 16 साल की थीं, तभी वह न्यूज रीडर के तौर पर दूरदर्शन में काम करने लगी थीं। वह जींस पहन कर ऑफिस जाती थीं लेकिन, न्यूज़ रीडिंग के दौरान वह जींस के ऊपर ही साड़ी पहन लेती थीं। दूरदर्शन में ही काम करने के दौरान उनकी मुलाकात फेमस निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल से हुई। श्याम बेनेगल ने उनके टैलेंट को पहचान लिया और उन्हें अपनी फ़िल्म 'चरण दास चोर' में रोल ऑफर किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 80 के दशक में स्मिता ने व्यावसायिक सिनेमा में कदम रखा और अपने समय के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ 'नमक हलाल' और 'शक्ति' में यादगार भूमिका निभाई। यह फ़िल्में सुपरहिट रही थीं और इनके गाने आज भी पसंद किए जाते हैं।

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कई सम्मानों से नवाजी गईं स्मिता पाटिल

स्मिता पाटिल को फिल्म भूमिका में अपनी परफॉर्मेंस के लिए बेस्ट एक्ट्रेस के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। स्मिता पाटिल ने ज्यादातर फिल्मों में सशक्त भूमिकाएं निभाईं और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरोध में खड़ी नजर आईं। फिल्म 'चक्र' के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड के साथ फिल्मफेयर के बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। 1985 में उनकी फ़िल्म 'मिर्च मसाला' आई थी, जो अपने अलग विषय के चलते काफी ज्यादा चर्चित हुई थी। इंडियन सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए इसी साल उन्हें पदमश्री सम्मान से नवाजा गया।

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स्मिता का फ़िल्मी करियर एक दशक से भी कम समय का था, लेकिन इस दौरान उन्होंने 80 से ज्यादा हिंदी और मराठी फ़िल्मों में अपनी बेमिसाल अदाकारी के जरिए दर्शकों के दिल में जगह बना ली। उनकी सबसे यादगार फिल्में थीं - 'निशान्त', 'चक्र', 'मंथन', 'भूमिका', 'गमन', 'आक्रोश', 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है', 'अर्थ', 'बाज़ार', 'मंडी', 'मिर्च मसाला', 'अर्धसत्य', 'शक्ति', 'नमक हलाल', 'अनोखा रिश्ता' आदि।

मुश्किलों भरी रही पर्सनल लाइफ

smita patil with nasiruddin shah

स्मिता पाटिल की प्रोफेशनल लाइफ जितनी कामयाब रही, पर्सनल लाइफ में उन्हें उतनी ही ज्यादा तकलीफें झेलनी पड़ीं। इसकी वजह थी राज बब्बर के साथ उनकी रिलेशनशिप। दरअसल राज बब्बर ने अपनी पत्नी नादिरा बब्बर को छोड़कर स्मिता के साथ शादी कर ली थी। इस पर मीडिया और सार्वजनिक जीवन में उनसे तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे, उन्हें नादिरा का घर तोड़ने वाला करार दिया जाने लगा। स्मिता पाटिल ने जी-जान से जिन महिला संगठनों के लिए काम किया था, वे भी उन्हें निशाना बना रही थीं। बहुत सी महिलाओं ने सवाल उठाया था कि उनके आदर्शों और निजी जीवन के व्यवहार में इतना ज्यादा फर्क क्यों है। बहुत से लोगों को नादिरा से सहानुभूति थी और उन्होंने स्मिता की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की थी। स्मिता पाटिल बेहद संवेदनशील इंसान थीं, जाहिर है, इन आलोचनाओं से उन्हें काफी दुख हुआ। राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे हैं प्रतीक बब्बर, वहीं नादिरा से उनकी दो संतान हैं-आर्य बब्बर और जूही बब्बर।

अकेलेपन की हो गईं थी शिकार

smita patil successful actress

स्मिता पाटिल अपनी पर्सनल लाइफ की प्रॉब्लम्स की वजह से अपनों से ही दूर होती जा रही थीं। उनकी बायोग्राफी की लेखिका मैथिलि राव ने अपनी किताब में लिखा है, "स्मिता पाटिल की मां स्मिता और राज बब्बर के रिश्ते के ख़िलाफ़ थीं। वह कहती थीं कि महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली स्मिता किसी और का घर कैसे तोड़ सकती है, लेकिन, राज बब्बर के लिए स्मिता इतनी डेडिकेटेड थीं कि उन्होंने अपनी मां की बात नहीं मानी।" राज बब्बर से शादी करने के बाद उनकी लाइफ नॉर्मल नहीं रह पाई और इन प्रॉब्लम्स का असर राज बब्बर के साथ उनके रिश्ता पर भी पड़ा। अपने आखिरी दिनों में स्मिता खुद को बहुत अकेला महसूस करती थीं। हेल्थ इशुज की वजह से उनकी समस्याएं और भी ज्यादा बढ़ गईं। बच्चे के होने के 6 घंटों के भीतर ही दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से उनकी मौत हो गई। भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी खूबसूरत यादें और उनकी अविस्मरणीय फिल्में हमेशा उनकी मौजूदगी का अहसास कराती रहेंगी।