मध्यप्रदेश से होने के कारण मुझे मध्यप्रदेश से जुड़ी खबरों में शुरू से ही बहुत दिलचस्पी रही है और ऐसे में हाल ही में बक्सवाहा जंगलों पर होने वाले विवाद की खबर ने मुझे काफी परेशान किया है। इसके बारे में कुछ आगे बताने से पहले मैं आपको बक्वाहा जंगल के बारे में कुछ ठीक तरह से बता दूं। ये जंगल बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में स्थित है। बुंदेलखंड पहले से ही सूखा ग्रस्त इलाका है और कुछ रिपोर्ट्स ये भी कहती हैं कि ये इलाका धीरे-धीरे रेगिस्तान बनता चला जा रहा है। 

कोरोना काल में हमने ये देख लिया है कि ऑक्सीजन का महत्व कितना ज्यादा है और ऐसे समय में अगर आपसे कहा जाए कि बक्सवाहा जंगल के 2 लाख 15 हज़ार से ज्यादा पेड़ काटे जा रहे हैं और हीरों की माइनिंग के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने इसकी अनुमति भी दे दी है तो? ट्विटर पर, सोशल मीडिया पर, न्यूज पर आपने बक्वाहा जंगलों के बारे में जानकारी पढ़ी होगी और अगर नहीं भी पढ़ी तो धीरे-धीरे इस जंगल को लेकर बढ़ते आंदोलन का रुख शायद जल्दी ही आप तक भी पहुंच जाए। 

क्या है इस जंगल से जुड़ा विवाद?

बक्सवाहा जंगल से जुड़ा विवाद ये है कि आदित्य बिड़ला ग्रुप के एस्सल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 2019 में बक्सवाहा जंगल के एक हिस्से की बोली लगाई थी और जीती थी। ये बोली बक्सवाहा जंगल के नीचे मौजूद हीरों की खदानों के लिए लगाई गई थी। अब उसी इलाके के 2 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटा जा रहा है।

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क्यों काटे जा रहे हैं पेड़?

दरअसल, इस जंगल के नीचे 34 मिलियन कैरेट के हीरे हैं जिनकी कीमत कुछ 50 हज़ार करोड़ बताई जा रही है। लेकिन इन हीरों की खुदाई के लिए जो कीमत बुंदेलखंड को चुकानी पड़ रही है वो बहुत बड़ी है। इतनी बड़ी तादात में पेड़ों की कटाई से न सिर्फ वहां के पर्यावरण पर असर पड़ेगा बल्कि इससे बक्सवाहा इलाके के ग्रामीण निवासी, वन्यजीव आदि पर भी बड़ा असर पड़ेगा। भारतीय ब्यूरो ऑफ माइन्स (IBM) के मुताबिक ये एशिया के सबसे बड़े हीरे की खदानों में से एक हो सकता है। 

buxwaha forest diamon

कितना बड़ा है बक्सवाहा जंगल?

इस कटाई के प्रोजेक्ट का नाम है प्रोजेक्ट बंडर और इसमें करीब 348 हेक्टेयर संरक्षित जंगल काटा जा रहा है। ये छतरपुर जिले के सागोरिया गांव के पास है। 

क्या है सरकार और कोर्ट की राय?

दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार ने हीरों की खुदाई के इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है, लेकिन सही मायने में यहां वन्यजीवों के लिए एक कॉरीडोर बना हुआ है जहां खुदाई की अनुमति नहीं है। इस मामले में हाईकोर्ट में याचिका की सुनवाई भी हो रही है और हीरों की माइनिंग को लेकर कोर्ट ने नेशनल टाइगर कन्जर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) और नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ को नोटिस भी जारी किया गया है कि आखिर कटाई की इजाजत संरक्षित कारिडोर में कैसे दे दी गई है। इसपर अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी।  

buxwaha forest cutting

करीब 50 हज़ार से ज्यादा प्रजाति के पेड़ हैं मौजूद- 

इस जंगल में 50 हज़ार से ज्यादा प्रजाति के पेड़ मौजूद हैं जिसमें महुआ, तेंदू पत्ता, चिरौंजी, आंवला आदि बहुतायत में हैं और इस इलाके की आवजीविका का अहम कारण हैं। इसके अलावा सागौन का पेड़, अमलतास, बेल, सेज आदि बहुत अनोखे पेड़ भी मौजूद हैं। 

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कई वन्यजीव भी हैं इस जंगल में मौजूद- 

इस जंगल में बहुत सारे वन्यजीव भी मौजूद हैं जैसे भारतीय बारहसिंघा, चौसिंघा, स्लॉथ भालू, तेंदुआ, मॉनिटर लिजार्ड, भारतीय गिद्ध, मोर आदि इन्हें अपना घर मानते हैं। ये सभी वन्यजीव वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत शेड्यूल 1 में लिस्टेड हैं और जंगलों की कटाई से इनपर भी असर पड़ेगा।  

स्थानीय जनजातियों पर भी पड़ेगा असर-  

बक्सवाहा जंगल और उसके आस-पास के गांवों में करीब 7000 गांव वाले और 17 ट्राइब्स रहती हैं जिनकी पूरी आजीविका जंगल पर ही निर्भर करती है। महुआ, तेंदू, चिरौंजी आदि का कारोबार इसी जंगल से चलता है और ये कट जाने से बहुत सारे लोगों की आजीविका भी छिन जाएगी।  

कटाई के खिलाफ चल रहे हैं आंदोलन- 

जिस प्रकार मुंबई का अरे जंगल चर्चा में आया था अब उसी तरह से बक्सवाहा जंगल भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। #savebuxwahaforest जैसे कई ट्विटर ट्रेंड भी चलाए जा रहे हैं। 5 जून को पर्यावरण दिवस पर कई आंदोलनों की शुरुआत की गई है जिसमें से एक चिपको आंदोलन भी है। इसके लिए बाकायदा अपील दर्ज करवाई है जिसको लेकर कोर्ट में केस चल रहा है।  

बक्सवाहा जंगल के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ कई लोगों ने आवाज़ उठाई है और अब ये आंदोलन राष्ट्रीय बन चुका है। उम्मीद है कि सरकार कुछ ऐसा करेगी जिससे वन्यजीवन और जंगल से जुड़े लोगों दोनों को नुकसान न पहुंचे।  

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