आज गणतंत्र दिवस है और इस मौके पर हम देश की उन बहादुर और जांबाज महिलाओं को याद करना चाहते हैं, जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई के लिए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था। रानी लक्ष्मी बाई, सरोजनी नायडू, कनकलता बरुआ, मतंगिनी हजरा और कस्तूरबा गांधी जैसी इंस्पायरिंग महिलाओं के बारे में आपसे पहले भी सुना होगा, लेकिन इस लड़ाई में कई सौ महिलाओं ने भी अपना अहम योगदान दिया था। नेता जी सुभाष चंद्र बोस की प्रेरणा से 'झांसी की रानी' रेजिमेंट का निर्माण किया गया था, जिनका एकमात्र ध्येय था, देश को ब्रिटिश राज से मुक्ति देना। आइए जानें इस रेजिमेंट की वीरांगनाओं की शौर्यगाथा के बारे में-

जुलाई 1943 में देश की वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के नाम पर 'झांसी की रानी' रेजिमेंट की स्थापना की गई थी, जिसमें करीब 170 महिलाएं थीं, जो मलेशिया के रबड़ एस्टेट्स में काम करने वाली भारतीय मूल की महिलाएं थीं। इन महिलाओं की शुरुआती ट्रेनिंग सिंगापुर में कराई गई और इसके बाद उन्हें रंगून और बैंकॉक भेजा गया। एक साल के अंदर झांसी की रानी रेजिमेंट में सदस्यों की संख्या बढ़कर 300 हो गई थी, जिन्हें नॉन कमीशन्ड ऑफिसर और सिपही की पदवी मिली हुई थी। इन केडट्स को राइफल, हैंड ग्रेनेड चलाने सिखाए गए और कुछ को बर्मा में एक्सटेंसिव ट्रेनिंग दी गई। सिंगापुर में पासिंग आउट परेड के होने के समय रेजिमेंट तक इस बहादुर महिलाओं की टुकड़ी में सदस्यों की संख्या 500 तक पहुंच गई थी। इनमें से 200 केडट्स को नर्सिंग की ट्रेनिंग दी गई थी, जिन्होंने चांद बीबी नर्सिंग कॉर्प्स बनाई। 

कैप्टन लक्ष्मी सहगल और जानकी देवर- महिला सशक्तीकरण की मिसाल 

strong women jhansi ki rani regiment inspired from subhash chandra bose inside

लक्ष्मी सहगल, जिनका शुरुआती नाम लक्ष्मी स्वामिनाथन था, की महिला बटालियन बनाने में अहम भूमिका रही। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने नेता जी सुभाष चंद्र बोस से संपर्क कर इस बारे में इच्छा जताई थी और सुभाष चंद्र बोस भी उनकी बहादुरी से प्रभावित थे। दरअसल कैप्टन लक्ष्मी सहगल बर्मा के जंगलों में बहादुरी से लड़ी थीं। लक्ष्मी सहगल को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद लक्ष्मी सहगल ने साल 1971 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) जॉइन कर लिया था। प्रेसिडेंशियल इलेक्शन में डॉक्टर अब्दुल कलाम के खिलाफ वह मुख्य प्रतिद्वंदी बनी थीं। 

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इसके बाद 1944 में 'झांसी की रानी' रेजिमेंट की कमान जानकी देवर के हाथ में आई और इस 18 साल की जांबाज लड़की ने ऐसा जोश दिखाया, जो अब तक किसी और लड़की में नजर नहीं आया था। जानकी संपन्न परिवार से थीं। जानकी ने जब नेता जी सुभाष चंद्र बोस की इंस्पिरेशनल स्पीच सुनी थी, तो वह इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने सबसे पहले जानकी ने इंडियन नेशनल आर्मी के लिए अपनी ज्वैलरी डोनेट कर दी। उन्होंने जब इस बारे में घर वालों को बताया था, तो उनके घर में काफी विरोध हुआ था, लेकिन जानकी इससे नहीं डिगीं।

इन महिलाओं का साहस आज की महिलाओं के लिए मिसाल है, क्योंकि इन महिलाओं ने अपनी इच्छा से आजादी की लड़ाई में शामिल होने की इच्छा जताई, जबकि इन्हें अच्छी तरह मालूम था कि इनकी जिंदगी भी दांव पर लगा हुई थी। 

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झांसी की रानी रेजिमेंट का प्रदर्शन काबिले-तारीफ था। दुश्मन का सामना करते हुए इसकी दृढ़ता और साहस भी गजब के थे। ये भी कम दिलचस्प बात नहीं है कि कंगना रनौती की लक्ष्मी बाई पर बन रही मणिकर्णिका जब रिलीज होने को है, तो उसे भी कई तरह के विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन कंगना भी रीयल लाइफ में झांसी की रानी से कम नहीं हैं, उन्होंने कर्णी सेना की धमकियों पर करारा जवाब देते हुए कहा है, 'मैं राजपूत हूं और अगर इसी तरह वो मुझे हैरस करेंगे, तो मैं उन्हें बर्बाद कर दूंगी। 

'महिलाओं की बहादुरी की कहानियां कम सुनाई देती हैं'

पुरुषों की बहादुरी की एक से बढ़कर एक दास्तां सुनने को मिल जाती हैं, लेकिन ऐसी महिलाएं, जिन्होंने सामाजिक बुराइयों का सामना करते हुए बड़े मुकाम हासिल किए, वाकई में आज की प्रोग्रेसिव महिलाओं के लिए बड़ी इंस्पिरेशन हैं। जाने-माने भारतीय एकेडमीशियन, इतिहासकार और फूड क्रिटिक डॉ. पुष्पेश पंत का कहना है, 'आजादी की लड़ाई में देश की महिलाओं ने पुरुषों की तरह अहम भूमिका निभाई। उनका जज्बा और साहस गजब का था, लेकिन उन्हें महिलाओं को इतिहास में पुरुषों के बराबर जगह नहीं मिली है। आजादी की लड़ाई में जितनी प्रेरक कहानियां देश के वीरों की मिलती हैं, उतनी वीरांगनाओं की नहीं मिलतीं। दूसरी अहम बात ये कि उन महिलाओं को ज्यादा महत्व दिया गया, जिन्होंने अहिंसा के साथ आजादी की जंग लड़ी। जिन महिलाओं ने आजादी की जंग के लिए हथियार उठाए, उन्हें हाशिए पर कर दिया गया। डॉ. लक्ष्मी सहगल को भी उतना महत्व नहीं दिया गया, जितना वह डिजर्व करती थीं।' 

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