अपने जज्बे और जुनून से तमिलनाडु के मदुरई की रहने वाली रेवती वीरामनी ने वो कर दिखाया, जो उसके साथ की लड़कियां शायद सोचने में भी हिचकिचाएं। ऐसे गांव और समुदाय में पैदा होना जहां लड़कियों की जल्दी शादी करवा दी जाती है, के बावजूद उन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि अपनी नानी के सपने को भी साकार किया है। उन्होंने अपने गांव और राज्य के साथ-साथ पूरे भारत नाम रोशन किया है।

23 वर्षीय रेवती जल्द ही टोक्यो ओलंपिक 2020 में हिस्सा लेंगी और भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। आइए जानें अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने क्या-क्या किया और कैसे यहां तक पहुंची।

कैसा था बचपन?

revathi veeramani with grandmother

रेवती का जन्म मदुरई, तमिल नाडु के बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। वे दो बहनें हैं, जिनमें से रेवती बड़ी हैं। पांच साल की उम्र में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था और उसके बाद उनका पालन-पोषण, उनकी नानी ने किया। उनकी दादी दिहाड़ी-मजदूरी कर जो कमाती थी, उससे घर चल पाना मुश्किल था। कई बार ऐसा भी हुआ, जब एक समय का भोजन भी उनके लिए मुश्किल हो गया था। ऐसे में नानी ने अपनी दोनों नातिनों को सरकारी हॉस्टल में डाल दिया। वहीं से दोनों बहनों ने दूसरी से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। इस दौरान वे लोग महीने में एक बार ही अपनी नानी से मिला करते थे।

अपने मुश्किल हालातों को याद करते हुए रेवती ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में बताया था, 'मुझे बताया गया था कि मेरे पिता के पेट में कुछ तकलीफ थी जिसके कारण उनका निधन हो गया, इसके छह महीने बाद दिमागी बुखार से मेरी मां भी चल बसी। जब उनकी मौत हुई तो मैं छह बरस की भी नहीं थी। मुझे और मेरी बहन को नानी ने बड़ी मुश्किलों से पाला। वे कम पैसों में भी दूसरों के खेतो और ईंट भट्टों पर काम करती थीं।'

एथलेटिक्स कोच ने पहचानी प्रतिभा

रेवती स्कूल-लेवल ट्रैक इवेंट्स में हिस्सा लिया करती थीं। उन्होंने 12वीं के दौरान स्टेट-लेवल 100 मीटर डैश में हिस्सा लिया था। जूते न होने की वजह से वह नंगे पांव दौड़ी और इसके बावजूद उन्होंने शानदार प्रदर्शन कर फाइनल में जगह बनाई थी। उनके शानदार प्रदर्शन को एथलेटिक्स के कोच श्री के. कनन ने देखा और वह रेवती से प्रभावित हुए। उन्होंने रेवती को आर्थिक रूप से समर्थन दिया और अपने घर में रेवती के भोजन और रुकने की व्यवस्था करवाई। उनकी अपार प्रतिभा और क्षमता को महसूस करते हुए, उन्होंने युवा एथलीट से कड़ी मेहनत करने और खेलों में अपना करियर बनाने का आग्रह किया था। उनकी मदद पाकर, रेवती ने मदुरई के लेडी डॉक कॉलेज में दाखिला लिया और साथ ही अपनी ट्रेनिंग भी जारी रखीं। इसकी बाद 2016 में रेवती को अपनी पहली जीत मिली। उन्होंने 2016 में जूनियर नेशनल में 100 मीटर और 200 मीटर दोनों में स्वर्ण पदक, सीनियर नेशनल में रजत पदक जीता। इसके बाद उन्होंने अपनी पटियाला के नेशनल कैंप में बनाई, जो ओलंपिक के एथलीट्स को ट्रेनिंग प्रदान कर रहा था।

यहां उन्होंने नेशनल कैंप कोच और गैलिना बुखारिना के अंडर प्रशिक्षण लिया और अपनी तकनीक और स्किल्स को बेहतर बनाया, जिसके बाद उन्होंने दोहा में 2019 एशियाई चैम्पियनशिप में भाग लिया और 4x100 मीटर रिले में चौथा स्थान हासिल किया। अपने कोच की सलाह के बाद, उन्होंने 100 मीटर दौड़ से 400 मीटर डैश में स्विच किया। उस वर्ष के बाद, उन्होंने 4x400 मीटर रिले में विश्व चैम्पियनशिप में भी भाग लिया।

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साल 2019 में दक्षिण रेलवे में मिली नौकरी

sprinter revathi veeramani

साल 2019 में उन्हें दक्षिण रेलवे के मदुरई डिवीजन द्वारा एक वाणिज्यिक क्लर्क और टिकट परीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। इस दौरान उन्होंने अपनी ट्रेनिंग भी जारी रखी। रेवती को रेलवे से जो इनकम मिलती है, वो इससे अपनी दादी की मदद करती हैं। आपको बता दें कि रेवती की बहन भी चेन्नई में पुलिस में हैं।

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चोट लगी, लेकिन मेहनत से कर पहुंच गई ओलंपिक

साल 2020 में रेवती को घुटने में चोट लगी थी, जिसके दर्द के कारण वह कुछ समय तक ट्रेनिंग नहीं कर पाईं। यह उनका मुश्किल समय था, जब रेवती ट्रैक पर दौड़ नहीं पा रही थीं।  ठीक होने के बाद रेवती ने स्टेट-मीट में फिर हिस्सा लिया और सिर्फ 53.55 सेकेंड में 400 मीटर की रेस में अपना बेस्ट कर ओलंपिक क्वालिफायर इवेंट में पहला स्थान पाया है। ओलंपिक में स्थान पाने की खबर जब उनकी नानी को मिली, तो उनकी नानी पहले से काफी ज्यादा खुश हैं। 

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स्प्रिंटर रेवती वीरामनी ने एक मिसाल कायम की है कि अगर आपमें कुछ करने का जुनून हो, तो हर काम संभव है। रेवती वीरामनी के बारे में पढ़कर आपको कैसा लगा, हमारे फेसबुक पेज पर कमेंट कर बताएं। ऐसी ही इंस्पायरिंग स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।

 

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