आने वाली 15 अगस्त 2021, में देश अपनी 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। इस जश्न में भारत को आजादी दिलाने वाले कई शूरवीरों को याद किया जाएगा। सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, सुभाष चंद्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री  जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी को तो हम याद रखते हैं, मगर उनका क्या जिन्हें देश और देश के लोग भूल गए। इस स्वतंत्रता संग्राम को लड़ने वाली कई महिलाएं भी थीं, जिनके बारे में शायद किसी को याद नहीं।

ऐसी महिलाएं, जिन्होंने पूरी निष्ठा, साहस और दृढ़ संकल्प और मातृभूमि को लेकर अपने प्रेम के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया,  लेकिन इन महिला नेताओं को लंबे समय से याद भी नहीं किया गया है। तो चलिए आज हम आपको ऐसी ही वीरांगनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, इस बहाने उन्हें याद ही कर लिया जाए।

मातंगिनी हाजरा

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मातंगिनी हाजरा को गांधी बरी के नाम से जाना जाता था। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन और असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। एक जुलूस के दौरान, वह तीन बार गोली मारे जाने के बाद भी भारतीय ध्वज के साथ नेतृत्व करती रहीं और वंदे मातरम के नारे लगाती रही थीं। कोलकाता में साल 1977 में पहली महिला की मूर्ति जो लगाई गई थी, वह हाजरा की थी।

तारा रानी श्रीवास्तव

तारा रानी का जन्म बिहार के सारण में एक साधारण परिवार में हुआ था और उनकी शादी फूलेंदु बाबू से हुई थी। वे 1942 में गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए और प्रोटेस्ट के दौरान उन्होंने सीवान पुलिस स्टेशन की छत पर भारतीय ध्वज फहराने की योजना बनाई थी। मगर तभी ब्रिटिशर्स ने फायरिंग शुरू कर दी। इसमें तारा रानी के पति की मृत्यु हो गई थी, लेकिन  उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करना जारी रखा।

कनकलता बरुआ

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कनकलता बरुआ को बीरबाला के नाम से भी जाना जाता है। वह असम की एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्होंने 1942 में बरंगाबाड़ी में भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और हाथ में राष्ट्रीय ध्वज लिए महिला स्वयंसेवकों की पंक्ति के शीर्ष पर खड़ी रहीं। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें कई अन्य पिकेटर्स के साथ गोली मार दी थी और 18 साल की उम्र में, उन्होंने देश के लिए अपना बलिदान दिया।

मूलमति

उन्हें उनके नाम से कोई नहीं जानता, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में राम प्रसाद बिस्मिल की मां के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मूलमती एक सीधी-सादी महिला थीं, उन्होंने अपने बेटे को आजादी के संघर्ष में सहारा दिया। एक जनसभा में एक भाषण में राम प्रसाद की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपने दूसरे बेटे का हाथ उठाया और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन की पेशकश की थी।

लक्ष्मी सहगल

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लक्ष्मी सहगल एक पूर्व भारतीय सेना अधिकारी थीं जिन्हें कैप्टन लक्ष्मी कहा जाता था। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित इंडियन नेशनल आर्मी के लिए एक बंदूक उठाई और स्वतंत्रता संग्राम में वीरता से इसका नेतृत्व किया। वह झांसी रेजिमेंट की रानी की स्थापना और नेतृत्व करने की प्रभारी थीं, जिसमें महिला सैनिक शामिल थीं। आईएनए में शामिल होने से पहले, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में अपनी भूमिका के लिए बर्मा जेल में सजा काटी थी।

अरुणा आसफ अली

वह स्वतंत्रता आंदोलन की 'द ग्रैंड ओल्ड लेडी' के रूप में लोकप्रिय थीं। वह एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता और एक स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा फहराने के लिए जाना जाता है। उन्होंने नमक सत्याग्रह आंदोलन के साथ-साथ अन्य विरोध मार्च में भी भाग लिया था।

भिकाजी कामा

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भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की एक प्रख्यात व्यक्तित्व भिकाजी रुस्तम कामा को मैडम कामा के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता पर जोर दिया। उसने अपनी सारी संपत्ति युवा लड़कियों के लिए एक अनाथालय की मदद के लिए दे दी थी। एक भारतीय राजदूत के रूप में, उन्होंने 1907 में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए जर्मनी की यात्रा भी की।

कमलादेवी चट्टोपाध्याय

एक समाज सुधारक के साथ, वह एक प्रतिष्ठित थिएटर अभिनेत्री थीं और उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारत में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में भी सुधार किया, हस्तशिल्प और रंगमंच को पुनर्जीवित और बढ़ावा दिया। उन्होंने 1930 में गांधी जी के नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया था। इतना ही नहीं,  विधान सभा के लिए वह पहली महिला उम्मीदवार थीं और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।

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सुचेता कृपलानी

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सुचेता कृपलानी एक गांधीवादी, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुईं और एक भारतीय राज्य (यूपी) की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। मुख्यमंत्री बनने से पहले सुचेता कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली थीं। साल 1940 में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की भी स्थापना की थी। 14 अगस्त, 1947 को उन्होंने संविधान सभा में वंदे मातरम गाया था।

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कित्तूर रानी चेन्नम्मा

वह कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी थीं, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनके प्रयासों के लिए उन्हें अभी तक देश भर में मान्यता नहीं मिली थी। 'डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स' की ब्रिटिश नीति के खिलाफ, उन्होंने 1824 में 33 साल की उम्र में बहादुरी से सेना के विद्रोह का नेतृत्व किया था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के पहले ही रानी चेनम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। हालांकि उन्हें युद्ध में सफलता नहीं मिली और उन्हें कैद कर लिया गया था। इसी दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी।

तो, ये हैं भूली-बिसरी वे महिला स्वतंत्रता सेनानी, जो हमारे लिए प्रेरणा हैं। उम्मीद है आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा। ऐसी इंस्पिरेशनल स्टोरीज पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी के साथ।

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