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    Hz Exclusive: सभी चुनौतियों को पार कर इस तरह बनाई गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में प्रीति मस्के ने अपनी जगह

    HZ Exclusive: प्रीति मस्के ने अपनी सभी बाधाओं को पीछे छोड़कर यह साबित करके दिखाया है कि कोई भी परेशानी व्यक्ति के सपने को पूरा करने से नहीं रोक सकती है। 
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    Updated at - 2023-01-19,10:34 IST
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    who is cyclist preeti maske in hindi

    देश की तरक्की के लिए महिलाओं की भागीदारी बहुत मायने रखती है। एक समय ऐसा था जब महिलाओं को घर से बाहर तक निकलने की अनुमति नहीं थी लेकिन आज हम ऐसी तमाम बेड़ियों को तोड़कर काफी आगे आ गए हैं।

    प्रीति मस्के उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने अपने सपने को पूरा किया है और सभी बाधाओं को पार करके जीवन में आगे बढ़ रही हैं। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में प्रीति मस्के ने अपनी जगह कैसे बनाई इस विषय पर हरजिंदगी हिंदी ने बात की प्रीति मस्के से।

    आपको बता दें कि प्रीति मस्के महाराष्ट्र के पुणे जिले में रहती हैं। वह दो बच्चों की मां हैं और साल 2017 में प्रीति ने साइकिलिंग करना शुरू किया था। उसके बाद से प्रीति ने साइकिलिंग के जरिए कई रिकॉर्ड भी बनाए। उन्होंने साइकिलिंग करते हुए लेह से मनाली तक का सफर तय किया है।

    लेह से मनाली तक की दूरी साइकिलिंग करके प्रीती ने केवल 55 घंटे और 13 मिनट में कंप्लीट की। प्रीति ने सबसे तेज साइकिलिंग का सोलो रिकॉर्ड बनाकर गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज कराया है।

    इसके अलावा प्रीति ने 14 दिनों में गुजरात से अरुणाचल तक यानी 4000 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय करके रिकॉर्ड बनाया है। सिर्फ यही नहीं प्रीति ने लेह से मनाली तक रनिंग का भी रिकॉर्ड दर्ज किया है।  

    फिटनेस के लिए चुनी साइकिलिंग

    cyclist preeti maske

    मस्के ने बीमारी और अवसाद से निपटने के लिए पांच साल पहले साइकिल चलाना शुरू किया था। शुरुआत में प्रीति ने रनिंग और साइकिलिंग को साथ में शुरू किया था लेकिन धीरे-धीरे उन्हें साइकिल चलाने में बहुत अच्छा  महसूस होने लगा।

    उन्होंने बताया कि 'साइकिल चलाते वक्त ऐसा लगा कि 'साइकिलिंग करते समय आपको अपने साथ किसी अन्य की जरूरत नहीं होती है केवल अकेले आप और आपकी साइकिल पूरा सफर तय कर सकती है और नई चीजों को खोज भी सकती हैं।' 

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    कैसे हुई साइकिलिंग की शुरुआत?

     
     
     
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    साल 2017 के बाद से प्रीति को साइकिलिंग में बहुत इंटरेस्ट आने लगा और उन्होंने सोचा कि वह इस क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल कर सकती हैं। उन्होंने अपनी गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड को हासिल करने के लिए कई तरह से तैयारी करना शुरू कर दिया।(HZ Exclusive: Shilpa Shetty ने कम समर्थन और ज्यादा जिम्मेदारियों को बताया महिलाओं के लिए बाधा)

    साल 2019 में प्रीति ने कुछ अन्य साइकिलिंग के समूह के साथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक का सफर तय किया था। इसमें 3773 किलोमीटर के सफर को प्रीति ने 17 दिन 17 घंटों में पूरा किया था। वहीं महाराष्ट्र के नासिक से अमृतसर के बीच का 1600 किलोमीटर का सफर महज 5 दिन और 5 घंटे में पूरा किया था।

    इस रूट पर साइकिलिंग से सफर तय करने वाली वह इकलौती महिला साइकिलिस्ट हैं। उन्होंने हमें बताया कि 'इसके बाद वह इस समूह के आर्गनाइजर महेंद्र महाजन से मिली और उन्होंने प्रीती के अंदर के जज्बे को पहचाना। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में जाने के लिए भी उन्होंने प्रीति को प्रेरित किया।

    महेंद्र ने प्रीति को बताया कि 'वह कैसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में साइन अप कर सकती हैं और साइकिलिंग में अपनी खास पहचान बना सकती हैं।' इसके बाद प्रीति ने फोर डायरेक्शन को भी पूरा किया यानी उन्होंने अपनी साइकिल से मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली जो 6000 किलोमीटर का सफर था।  

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    कोविड के समय ऐसे की प्रीति ने तैयारी

     
     
     
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    तैयारी के लिए प्रीति हर सप्ताह में छुट्टी होने पर बैक-टू-बैक लॉग रेस की प्रैक्टिस करती थी। साल 2019 में कोविड का समय शुरू हुआ पर प्रीति ने अपनी प्रैक्टिस को नहीं रोका और वह घर पर ही कई सारे सोशल मीडिया पर फिटनेस चैलेंज को पूरा करती थी।

    आपको बता दें कि घर में ही प्रीति ने 42 किलोमीटर रनिंग की थी। इससे उनकी फिटनेस और कॉन्फिडेंस भी बना रहा। उत्तराखंड की तरफ से भी उन्हें इनवाइट आया था जिसमें उनकी बेहतर तरीके से प्रैक्टिस हुई थी।

    परिवार का सपोर्ट 

    family support to preeti maske

    प्रीति ने हमारे साथ इंटरव्यू में यह शेयर किया कि 'हमारे समाज में लड़की को तो फिर भी लोग बढ़ावा देते हैं मगर जब भी कोई महिला अपने सपने को पूरा करने की बात कहती है तो समाज के लोग उसे पीछे हटने की हिदायत देते हैं। ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ था। जब मैंने साइकिलिंग और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड की बात घरवालों को बताई तो मुझे बहुत कम सपोर्ट मिला लेकिन मेरे साइकिलिंग ग्रुप ने मुझे मोरल सपोर्ट के साथ-साथ फाइनेंशियल सपोर्ट भी किया। कुछ समय बाद मुझे मेरे बच्चों और पति से बहुत अच्छा सपोर्ट मिला जिससे मुझे बहुत ज्यादा ताकत मिली।

    लोगों ने यह तक बोला कि मैं साइकिलिंग लेह वाले रूट पर नहीं कर पाऊंगी क्योंकि वहां पर हाई एल्टीट्यूड है लेकिन आपने यह सुना होगा कि अगर अर्जुन का ध्यान पक्षी की आंख की तरफ है तो वह निशाना बिल्कुल सही लगाता है। यह बात मैंने साबित करके समाज के उन लोगों को दिखाई जिन्हें मेरी क्षमता कम लगती थी।' 

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    हर चैलेंज का सामना करके आगे रखा कदम

     
     
     
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    प्रीति ने बताया कि 'मैं पुणे में ही पली-बढ़ी थी लेकिन जब मैंने चेन्नई टू कोलकाता का सफर शुरू किया तो मुझे कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था क्योंकि वहां के मौसम में और पुणे के मौसम में बहुत अधिक फर्क है लेकिन फिर भी मैंने हार नहीं मानी।'

    उन्होंने यह भी कहा कि 'आपको जानकर हैरानी होगी कि बहुत अधिक प्रैक्टिस करने के बाद भी मैं कई बार सफर के समय बेहोश भी हो गई थी लेकिन मुझे अपने सपने को हासिल करना था इसलिए मैंने अपने कदम पीछे नहीं रखें। मौसम के अलावा रात में भी साइकिलिंग करते समय परेशानी होती थी क्योंकि विजिबिलिटी भी रात के समय कम होती है।

    ऐसे में दुर्घटनाएं होने की संभावना भी बहुत अधिक होती है। आपको ट्रेनिंग भी खुद से करनी होती है क्योंकि इस तरह का रिकॉर्ड पहले से नहीं दर्ज हुआ था। मेरे सौभाग्य की बात है कि भारत के बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेशन ने भी मुझे बहुत सपोर्ट किया जिससे मुझे अधिक साहस मिला।'

    सोशल रिस्पांसिबिलिटी को भी किया पूरा 

    आपको बता दें कि प्रीति सिर्फ अपने आपको साइकिलिंग तक सीमित नहीं करना चाहती हैं वह साइकिलिंग करके लोगों को आर्गन डोनेशन का मैसेज भी देना चाहती हैं। जल्द ही प्रीति एक अभियान से जुड़कर हर दिन 20 से 22 घंटे साइकिलिंग करके 50 करोड़ तक लोगों को आर्गन डोनेशन का मैसेज पहुंचाना चाहती हैं। उनका मानना है कि इससे बहुत सारे लोगों को लाभ होगा और लोगों को ऑर्गन डोनेशन के बारे में जानकारी भी मिलेगी। 

    समाज के लोगों के लिए संदेश 

     
     
     
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    प्रीति ने इंटरव्यू में हमें यह बताया कि 'अगर आपका बच्चा किसी स्पोर्ट में बेहतरीन प्रदर्शन करता है तो उसे माता-पिता को जरूर सपोर्ट करना चाहिए। इससे वह आगे बहुत अच्छा करता है और उसकी फिटनेस भी अच्छी रहती है।' 

    कैसे मैनेज किया साइकिलिंग और घर? 

     
     
     
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    'वैसे तो घर के सारे काम जैसे बच्चों को स्कूल भेजना उन्हें पढ़ाना, खाना बनाना आदि काम मैं पहले से करके ही प्रैक्टिस के लिए जाती थी। इसके बाद मेरे बच्चों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया और धीरे-धीरे परिवार के सभी लोगों ने मेरी हेल्प की ताकी मैं साइकिलिंग पर फोकस कर पाऊं। मेरा मानना है कि आपका डेडिकेशन देखकर ही परिवार की तरफ से महिलाओं को सपोर्ट मिलता है।'

    डेयर टू ड्रीम में रखें विश्वास

    प्रिती ने हमारे साथ यह भी साझा किया कि 'अक्सर हम औरतें अपने लिए कोई सपने नहीं देखती हैं केवल फैमिली के लिए ही सपने देखती हैं और उसे पूरा करने के लिए जिंदगी लगा देती हैं। मेरा मानना है कि महिलाओं को खुद के लिए भी टाइम निकालना चाहिए और अपने अधूरे सपने को पूरा करने का जोरदार प्रयास करना चाहिए। महिलाओं को 'डेयर टू ड्रीम' यानी जो सपने वह देखती है उसे पूरा करने का प्रयास भी करना चाहिए।'

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