नॉन इनवेसिव प्रीनेटल टेस्टिंग एक ऐसा टेस्ट है जो अजन्मे बच्चे में जेनेटिक दोष और असमानताओं की जांच करता है। प्रेग्नेंसी के कुछ ही हफ्तों के बाद बच्चे का डीएनए मां की ब्लडस्ट्रीम से मिल जाता है और इसलिए इसकी जांच आसान होती है। इस टेस्ट में मां के खून से डीएनए का सैम्पल लिया जाता है और इसमें मौजूद जरूरी जेनेटिक जानकारी का परीक्षण किया जाता है। इसी प्रोसेस में ये पता लगाया जाता है कि कहीं इसमें किसी तरह की कोई असामानता या फिर बच्चे को किसी तरह का कोई रिस्क तो नहीं। 

ये टेस्ट किस सिंड्रोम की जांच करता है?

एनआईपीटी टेस्ट एक भरोसेमंद तरीका है जिससे इन क्रोमोसोमल असमानताओं का पता लगाया जा सकता है-

डाउन सिंड्रोम

टर्नर सिंड्रोम

एडवर्ड्स सिंड्रोम

पटाऊ सिंड्रोम

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ये टेस्ट ऊपर दी गई सभी कंडीशन्स का पता आसानी से और सटीक तरीके से लगा लेता है। एक बात जिसपर ध्यान देना जरूरी है वो ये है कि ये सिर्फ स्क्रीनिंग है। इससे सिर्फ ये पता लगाया जा सकता है कि बच्चे में कहीं इस तरह का कोई विकार तो नहीं या ऐसा विकार होने की संभावना तो नहीं। इससे ज्यादा बेहतर और जेनेटिक डिसऑर्डर्स के लिए जटिल टेस्टिंग के लिए डॉक्टर्स एम्नियोसिंथेसिस (Amniocentesis) की सलाह भी दे सकते हैं। 

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एनआईपीटी टेस्ट डाउन सिंड्रोम की जांच करने के लिए काफी सेंसिटिव साबित हो सकता है। अगर टेस्ट के नतीजे ये बताते हैं कि बच्चे को डाउन सिंड्रोम होने की गुंजाइश है तो इसके आगे कोरिओनिक विलस सैम्पलिंग (Chorionic Villus Sampling) और एम्नियोसिंथेसिस (Amniocentesis) टेस्ट की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे के स्वास्थ्य के लिए ज्यादा सही जानकारी मिल सके। 

पीसीपीएनडीटी एक्टर कानून के खिलाफ है और एनआईपीटी सहित किसी भी टेस्ट से बच्चे के जेंडर का पता लगाना गैरकानूनी है। 

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एनआईपीटी का प्रोसेस क्या होता है? 

मां की उम्र बढ़ने के साथ-साथ अजन्मे बच्चे में डाउन सिंड्रोम के होने का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर डॉक्टर्स मां के ब्लड टेस्ट (डुअल मार्कर टेस्ट) के साथ पहले ट्राईमेस्टर का खास अल्ट्रासाउंड स्कैन (जिसे एनटी स्कैन कहते हैं) कर इस कम्बाइन टेस्ट के जरिए बच्चे के स्वास्थ्य का पता लगाने की कोशिश करते हैं।  एनटी स्कैन की मदद से बच्चे के सिर के पीछे मौजूद फ्लूइड की जांच होती है और ये कितना ज्यादा है इसका पता लगाया जाता है। डुअल मार्कर टेस्ट और एनटी स्कैन के साथ उम्र से साथ जुड़े हुए रिस्क का आंकलन किया जाता है और इससे बच्चे को डाउन सिंड्रोम है या होने की संभावना है इसका पता सटीक तरीके से लगाया जाता है। अगर टेस्ट रिजल्ट कहते हैं कि बच्चे को डाउन सिंड्रोम का रिस्क है तो एनआईपीटी करवाने की सलाह दी जाती है। इस प्रोसेस में साधारण ब्लड टेस्ट किया जाता है जिसे लैब में जांच के लिए भेज दिया जाता है।  

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कब करवाना चाहिए एनआईपीटी? 

एनआईपीटी करवाने की सलाह तब दी जाती है जब मां के लिए ये गुंजाइश ज्यादा बढ़ जाती है कि उसके कंसीव करने पर बच्चे को डाउन सिंड्रोम हो सकता है। ऐसा तब होता है जब- 

मां की उम्र 30 साल से अधिक हो

महिला ने पहले भी डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे को जन्म दिया हो

कम्बाइन टेस्ट रिजल्ट ये कहते हों कि बच्चे को डाउन सिंड्रोम हो सकता है

अगर पहले ट्राईमेस्टर में डाउन सिंड्रोम का टेस्ट नहीं करवाया गया हो 

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एनआईपीटी के नतीजे- 

एनआईपीटी के नतीजे आमतौर पर 2-3 हफ्तों के अंदर आ जाते हैं। अगर रिजल्ट निगेटिव आते हैं तो इसका मतलब ये कि बच्चे को ऊपर दिए गए सिंड्रोम्स में से कोई भी होने की गुंजाइश काफी कम है। अगर रिजल्ट पॉजिटिव आते हैं मतलब बच्चे को ऊपर दिए गए किसी भी सिंड्रोम का खतरा हो सकता है। नॉन इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट करवाने से माता-पिता राहत की सांस ले सकते हैं। अगर टेस्ट निगेटिव आता है तो बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ी कई चिंताएं दूर हो सकती हैं। अगर टेस्ट पॉजिटिव आया तो माता-पिता अपने बच्चे के बारे में डॉक्टर से सलाह-मश्वरा कर सकते हैं और आगे जरूरी कदम उठा सकते हैं। ये टेस्ट स्पष्टता प्राप्त करने में मदद करता है और माँ और बच्चे को एक व्यवस्थित और सुरक्षित प्रेग्नेंसी प्लान करने में सहायक है।  

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