पहले के जमाने में मिट्टी और लोहे के बर्तन में ही खाने बनते थे। जो थोड़े अमीर थे उनके यहां पीतल और चांदी के बर्तन थे। इन शॉर्ट... स्टील और एल्युमीनियम के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं होता था। क्योंकि लोहे और मिट्टी के बर्तनो में बने खाने में टेफ्लॉन नहीं होता है। लेकिन धीरे-धीरे आधुनिकीकरण के तेज दौड़ में ये सारे बर्तन पीछे छूट गए और आज हर किसी के घर में एल्युमीनियम और स्टील के बर्तन है। जिसके कारण लोग रोज थोड़ी-थोड़ी मात्रा में टेफ्लॉन नामक जहर का सेवन कर रहे हैं।

मिट्टी और लोहे के बर्तन 

इन बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट होता है और इससे हमारे शरीर में टेफ्लॉन जैसे जहर की चिंता नहीं होती थी। इसी बात ने कोच्चि की राधिका मेनन और प्रिया दीपक को आश्चर्य में डाल दिया। जिसके बाद उन्होंने पुरानी परंपराओं और पुराने तरीके से भोजन पकाने के तरीके को को वापस लाने की ठानी। जिसके बाद इन्होंने  'द विलेज फेयर नेचुरल कुकवेयर' की स्थापना की।  

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इन बर्तनों से आसानी से मिलता है आयरन

'द विलेज फेयर नेचुरल कुकवेयर' कैम्पेन फेसबुक के फिश प्रोजेक्ट से इंस्पायर है। अगर आप लोहे के बर्तन में खाना पका रहे हैं तो आयरन की कुछ मात्रा आपके भोजन में आ जाती है और इसे खाने से आपके शरीर में भी जाता है। कई रिसर्च में भी बताया गया है कि कच्चा खाना जब आयरन पैन और नॉन आयरन पैन में बनता है तो दोनों में अंतर मिलता है। विलेज फेयर की इस पोस्ट ने काफी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कई लोग पूछते और सोचते रहे कि कैसे पीढ़ियों से हमारे पूर्वजों ने कच्चे लोहे के बर्तनों में खाना पकाया था।

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इसलिए ये दोनों महिलाएं कोच्चि के गांव-गांव में जाकर लोगों को मिट्टी और लोहे के बर्तन में खाना बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। क्योंकि गांव के गरीब किसानों में आयरन और जरूरी पोषक-तत्वों की कमी होती है। इन पोषक-तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए उनके पास जरूरी फल-सब्जियां और गोलियां खरीदने तक के पैसे नहीं होते हैं। ऐसे में ये दो महिलाएं उन्हें कच्चे लोहे की कढ़ाई में भोजन पका कर खाने की सलाह दे रही हैं।

क्या है फिश प्रोजक्ट

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कनाडा के एक युवा डॉक्टर क्रिस्टोफर चार्ल्स ने इसी आधार पर एक लकी आयरन फिश प्रोजेक्ट शुरू किया है। कंबोडिया की अपनी यात्रा में उन्होंने देखा कि वहां के गरीब लोग आयरन की कमी से ग्रस्त हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी डाइट में पोषक सब्जियां और फल नहीं थे। आयरन की गोलियां खरीद पाना इन लोगों की क्षमता के बाहर था, इसके अलावा इन गोलियों के साइड इफेक्ट बर्दाश्त कर पाना सबके बस की बात नहीं। इसलिए चार्ल्स ने ढ़लवां लोहे की छोटी-छोटी मछलियां लोगों में बांट कर उन्हें सलाह दी कि खाना बनाते समय बर्तन में ये मछली डाल दें। इससे वही असर होता है जो लोहे के बर्तन में खाना बनाने पर होता है।

इन बातों का रखें ध्यान

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लेकिन लोहे की कढ़ाई में खाना बनाने के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखने की भी जरूरत होती है। 

  • खट्टा खाना- लोहे के बर्तन में कभी भी खट्टी चीजें नहीं बनानी चाहिए। अगर कोई खट्टी सब्जी बना रही हैं तो उसे मिट्टी के बर्तन में बनायें। 
  • ज्यादा देर तक भोजन ना रखें- आंच से उतरान के बाद लोहे की कढ़ाई से सब्जी निकालकर दूसरे बर्तन में रख देना चाहिए। लोहे की कढ़ाई में ज्यादा देर तक भोजन ना रखेँ। 

मिट्टी के बर्तन

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चावल बनाने के लिए और खाना खाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें। इसमें कोई दो राय नहीं है कि धातु की तुलना में मिट्टी के बर्तन में बना भोजन ज्यादा हेल्दी होता है। लेकिन मिट्टी के बर्तनोंकी फिर से बढ़ती मांग के कारण आजकल मार्केट में आजकल ग्लेज किए हुए चमकदार मिट्टी के बर्तन फैशन में आ गए हैं। इनसे बचने की जरूरत है क्योंकि ग्लेज या चमक लाने के लिए इन पर लेड जैसे केमिकलों का इस्तेमाल किया जाता है जो सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। खाना बनाने के लिए कुम्हार से मिट्टी के पके हुए बर्तन खरीदें और उनका इस्तेमाल करें।

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