दक्षिण भारत प्राचीन और अद्भुत मंदिरों को गढ़ माना जाता है। इन मंदिरों की कलाकृतियां ही नहीं बल्कि इससे जुड़ी परंपराएं भी अनोखी हैं। साउथ में कांचीपुरम, कोवलम, त्रिशूर, और तिरुवनंतपुरम जैसी कई जगहों पर बहुत सारे छोटे-बड़े मंदिर है। ख़ास बात यह है कि इन मंदिरों मे सिर्फ़ पूजा ही नहीं होती बल्कि यहां कई बड़े उत्सव भी मनाए जाते हैं। इस उत्सव को स्थानीय लोग बहुत धूम-धाम से मनाते हैं। केरल राज्य के त्रिशूर जिले में स्थित कोडुंगल्लूर मंदिर अपने अनोखी परंपराओं और भव्य उत्सव के लिए प्रसिद्ध है। 

यह मंदिर भद्रकाली को समर्पित है, यहां काली की प्रचंड रूप में मूर्ती स्थापित हैं। प्रचंड मूर्ती में काली के आठों हाथों को दिखाया गया है, जिसमें एक हाथ में तलवार, अगले में अंगूठी और एक में राक्षस राजा दारुका आदि शामिल है। इस मंदिर में नियमित पूजा के अलावा साल में एक बार भव्य उत्सव भी मनाया जाता है। जिसमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। भद्रकाली को स्थानीय लोग कोडूंगल्लूर अम्मा नाम से संबोधित करते हैं। केरल का यह मंदिर मालाबार में 64 क्षीकुरुम्बा कवों का प्रमुख है।

कोडूंगल्लूर मंदिर का इतिहास

thrissur kerala

केरल का यह मंदिर सालों पहले बनाया गया था। इस मंदिर में पूजा करने के रीति-रिवाज और परंपराएं सबकुछ अन्य मंदिरों से अलग हैं। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण चेरमान पेरुमल द्वारा किया गया था। मंदिर में भद्रकाली की उपस्थिति होने की वजह से यहां के लोग इस मंदिर को मलयाला भगवती बुलाते हैं। आज भी मंदिर में पूजा प्राचीन निर्देशानुसार की जाती है। बताया जाता है कि इस स्थान पर पहले भगवान शिव की अराधना की जाती थी और परशुराम ने मंदिर के निकट मां काली की प्रतिमा रख दी, जिसके बाद से इनकी पूजा की जाने लगी। वहीं इस मंदिर में सिर्फ़ यहां के पुजारी नंबूदिरीस और आदिकस को पुष्प अर्जित करने का अधिकार है।

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कोडूंगल्लूर मंदिर में आयोजित भरानी त्योहार

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कोडूंगल्लूर मंदिर में आयोजित भरानी त्योहार को केरल के प्रमुख त्योहारों में गिना जाता है। यह हर साल मार्च और अप्रैल के महीने में मानाया जाता है। इस त्योहार की शुरुआत 'कोझिकलकु मूडल' नामक अनुष्ठान से हुई थी। इस अनुष्ठान में मुर्गों की बलि और उनके रक्त का बहाव शामिल है। दरअसल ऐसा माना जाता है कि मां काली और राक्षसों को प्रसन्न करने के लिए ऐसा किया जाता है। हालांकि कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर में जानवरों की बलि चढ़ाई जाने के परंपरा थी। जिसमें बकरी, पक्षी आदि शामिल होते थे। हालांकि इस तरह की परंपराओं पर केरल राज्य सरकार ने विरोध जताया, जिसके बाद से पशु-पक्षियों की बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों में इसकी समाप्ति अब तक नहीं हुई है। अब श्रद्धालु भगवान को लाल धोती चढ़ाते हैं, इसके अलावा यहां सोना-चांदी और महंगे उपहार चढ़ाने का भी रिवाज है।

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कैसे पहुंच सकते हैं कोडूंगल्लूर मंदिर

वैसे तो यह मंदिर हर समय श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है, लेकिन त्योहार के समय में यहां हजारों लोगों की भीड़ देखने को मिलती है। केरल के त्रिशूर जिले में स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कई साधन मिल जाएंगे। कोडूंगल्लूर रेलवे स्टेशन पहुंचने के बाद आप गाड़ी, बस, और कैब आदि चुन सकते हैं। यहां तक पहुंचने के लिए बेस्ट है बस जो आपको आसानी से उपलब्ध हो जायेगी।

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