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    Chhath Puja Importance 2022 : क्यों मनाया जाता है छठ का त्योहार, क्या है छठ पूजा का महत्त्व ?

     छठ का त्योहार पूरे देश में बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है। आइए जानें छठ के पर्व में किस तरह से पूजन किया जाता है और इसका क्या महत्त्व है।
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    Updated at - 2022-10-28,12:31 IST
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    सूर्य देव को समर्पित चार दिवसीय हिंदू त्योहार शुरू हो चुका है। देश के कई हिस्सों से भक्त इस पर्व को बहुत धूमधाम से मनाते हैं, व्रत उपवास करते हैं और नदी या जलाशय में डुबकी लगाकर सूर्य देव की प्रार्थना करते हैं। छठ पूजा की इस अवधि के दौरान भक्त, सूर्य देवता को अर्ध्य देते हैं और श्रद्धा भाव से सूर्य देव की पूजा करते हैं। पूरे देश में छठ पूजा के चार दिवसीय उत्सव की अवधि के दौरान अनुष्ठान किए जाते हैं।

    छठ पूजा को प्रतिहार, डाला छठ, छठि और सूर्य षष्ठी के रूप में भी जाना जाता है। मुख्य रूप से यह पर्व सूर्य देव की उपासना के लिए मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से सूर्य देव की कृपा पूरे परिवारजनों को प्राप्त होती है। यह व्रत संतान के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए भी किया जाता है। आइए जानें इस पर्व को कैसे मनाया जाता है और छठ पूजा का क्या महत्त्व है। 

    प्रथम दिन नहाय खाय 

    छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय के रूप में जाना जाता है। इस दिन पूरा परिवार एक पारंपरिक भोजन तैयार करता है और दोपहर में इसे भोग के रूप में परोसता है, इस तैयार भोजन को परिवार के सभी लोग मिल-जुलकर ग्रहण करते हैं। इस दिन घर की साफ सफाई करके छठ के व्रती स्नान करके पवित्र तरीके से शाकाहारी भोजन (व्रत के दौरान क्यों नहीं करते लहसुन प्याज का सेवन) तैयार करते और उसे खाते हैं। 

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    द्वितीय दिन खरना 

    छठ पूजा के दूसरे दिन, खरना में महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। ये व्रत सूर्योदय से शुरू हो जाता है और सूर्यास्त तक चलता है। छठ व्रती सूर्य की पूजा करने के बाद ही शाम को अपना उपवास तोड़ते हैं। वे मुख्य रूप से प्रसाद के रूप में खीर, मिठाई तैयार करते हैं और परिवारजनों को खिलाते हैं। 

    तीसरा दिन संध्या संध्या अर्घ्य

    sandhya ardhya 

    इस त्योहार के सबसे महत्वपूर्ण दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं एक दिन का उपवास रखती हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही इसे तोड़ती हैं। इस पूरे दिन घर में रौनक होती है। व्रत रखने वाले दिन-भर डलिया और सूप में कई प्रकार के फल, ठेकुआ, चावल का लड्डू आदि लेकर संध्या काल में बहते हुए पानी जैसे तालाब, नदी में खड़े होकर सूर्य की पूजा करते हैं और परिवार के सभी सदस्य मिलकर सूर्य को अर्ध्य देते हैं। 

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    चौथे दिन सुबह का अर्घ्य

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    उत्सव चौथे और अंतिम दिन समाप्त होता है जब भक्त उषा अर्घ्य यानी उगते हुए उगते सूरज की प्रार्थना करते हैं। माना जाता है कि उषा सूर्य देव की पत्नी हैं। लोग सूर्योदय के समय पूजा करते हैं और फिर अपना उपवास तोड़ते हैं। छठ व्रती को सूर्य उगने के पहले ही फिर से उसी तालाब, नहर, नदी पर जाना होता है जहां वे तीसरे दिन गए थे। इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान सूर्य से प्रार्थना की जाती है। परिवार के अन्य सदस्य भी व्रती के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। 

    क्या है छठ पूजा का इतिहास (Chhath Puja History in Hindi)

    प्राचीन कथा के अनुसार प्रियंवद नाम का एक राजा था और उनकी पत्नी मालिनी थीं। शादी के कई सालों बाद भी जब प्रियंवद को संतान की प्राप्ति नहीं हुई तब वह बहुत दुखी रहने लगे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप से विचार-विमर्श कर यज्ञ करवाने का निश्चय किया। तब यज्ञ की आहुति की खीर महर्षि कश्यप ने राजा प्रियंवाद की पत्नी को दी और उसी के प्रभाव से उन्हें संतान के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन वह पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ।

    पुत्र वियोग में जब राजा ने अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया तो ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना वहां पर प्रकट हुई और उन्हें पुत्र को जीवित करने के लिए छठ व्रत करने को कहा। इस व्रत के प्रभाव से राजा प्रियंवद का पुत्र जीवित हो गया। तब से छठ पूजा बड़ी ही धूमधाम से पूरे देश में मनाई जाती है। बताया जाता है कि यही छठी माता है और सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने की वजह से इन्हें छठी मैया कहकर पुकारा जाता है। 

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    छठ पूजा का महत्व (Chhath Puja Importance in Hindi)

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    हिंंदू धर्म में छठ पूजा का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। छठ व्रत सूर्य देव, ऊषा, प्रकृति, जल और वायु को समर्पित है। मान्यतानुसार इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास से करने से निःसंतान स्त्रियों को भी संतान सुख की प्राप्ति होती है। बताया जाता है कि छठ व्रत संतान की रक्षा और उनके उज्जवल भविष्य और जीवन में खुशहाली लाने के लिए किया जाता है। विद्वानों का मानना है कि सच्चे मन से इस व्रत को करने से सैकड़ों व्रतों के बराबर का फल प्राप्त होता है।

    यह व्रत करने से इस व्रत का सैकड़ों यज्ञ करने से भी ज्यादा फल प्राप्त होता है। कई लोग केवल संतान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख समृद्धि लाने के लिए भी यह व्रत रखते हैं। कुंवारी लड़कियां और लड़के भी अपने उज्जवल भविष्य की कामना हेतु इस व्रत का पालन करते हैं और श्रद्धापूर्वक सूर्य देव की पूजा करते हैं।  

    इस प्रकार छठ का त्योहार मुख्य रूप से बिहार और पूर्वांचल सहित पूरे देश में पूरे धूम-धाम से मनाया जाता है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

    Image Credit: shutter stock and freepik 

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