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'पिज्जा डिलीवरी गर्ल' से बनीं टॉप क्लास बिजनेस वुमन मनीषा गिरोत्रा

कभी गोल्फर ,कभी मेंटॉर, कभी वुमन राइट एक्टिविस्ट तो कभी यूबीएस बैंक का चेहरा रहीं मनीषा गिरोत्रा। टॉप बिजनेस वुमन बनकर महिलाओं के लिए बनीं इंस्पिरेशन।  
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Published -20 Jun 2018, 09:27 ISTUpdated -25 Jun 2018, 13:27 IST
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मनीषा गिरोत्रा ने सामान्य शुरुआत से जिस तरह अपने करियर में बुलंदियों का सफर तय किया, वह हर महिला के लिए इंस्पिरेशन है। 46 साल की मनीषा के पिता ने उन्हें हमेशा ही आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वह एक ऐसे घर से ताल्लुक रखती थीं, जहां सभी महिलाएं काम पर जाती थीं।  Delhi School of Economics (DSE ) से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद बतौर फ्रेशर उन्हें मौका दिया ग्रिंडलेज बैंक ने। यहां मनीषा ने इन्वेस्टमेंट बैंकिंग डिवीजन में काम किया। DSE में गोल्ड मेडल जीतने के बाद मनीषा को लगता था कि वह दुनिया की आर्थिक तस्वीर ही बदल देंगी, लेकिन उनकी पहली जॉब स्टॉक स्टेटमेंट बनाने की थी। वह बताती हैं, 'मैं यह रजिस्टर करती थी कि कंपनी के पास 2000 पेंसिल, 200 टेबल और 30 पंखे हैं। ग्रिंड्लेज में दूसरी जॉब भी उनके लिए अलग ही तजुर्बा था। वह स्टॉक स्टेटमेंट बनाने के साथ कभी-कभी पिज्जा की डिलीवरी भी करती थीं। लेकिन आज जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं तो वह पाती हैं कि इन्हीं छोटी जॉब्स ने उन्हें एक बड़े रोल के लिए तैयार किया। छोटे जॉब में लोग आप तब तक लगे रहते हैं, जब तक लोग आपके अंदर इतना आत्मविश्वास ना भर दें कि आप उससे आगे बढ़ने की सोचने लगें। 

ठहरो नहीं आगे बढ़ो

जब मनीषा DSE में पढ़ रही थीं तब वहां लगभग 40 फीसदी महिलाएं थीं। कॉलेज से निकलने के बाद कई महिलाओं ने टीचिंग और नर्सिंग जैसे सेवा से जुड़े जॉब अपना लिए। मनीषा बताती हैं, 'जिन महिलाओं को मैं जानती थी, उनमें से कइयों ने शादी के बाद जॉब छोड़ी दी। लोग मुझे अजीब तरह से देखते थे और अंदाज लगाते थे कि मैं सेक्रेटरी हूं। मुझे लोग सीरियसली नहीं लेते थे। कंपनी के एक्विजिशन, फंडरेजिंग आदि पर महिलाओं के सामने बात करना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल हो जाता था।' अपनी जॉब के सिलसिले में उन्हें दिल्ली से लंदन का सफर तय करना पड़ता था। उन्होंने अच्छे और बुरे दोनों तरह के दिन देखे। वह बताती हैं कि लोग उनसे हैंडशेक करने के बजाय नमस्ते कहते थे, अजीब सवाल करते थे कि वह शादी कब कर रही हैं और वह कहती थीं, 'मैं यहां ये सब बातें करने के लिए नहीं आई हूं।'

manisha girotra inside

मनीषा की 24 साल में शादी हो गई। उनके पति उस समय डोएचे बैंक में कॉरपोरेट फाइनेंस बिजनेस हेड कर रहे थे। कुछ समय के लिए उनकी पोस्टिंग मुंबई हो गई थी जबकि उनके पति दिल्ली रहते थे। इस दौरान उन्होंने और उनके पति दोनों ने अपनी-अपनी जॉब पर फोकस किया। मुंबई में ग्रिड्लेज में काम करने के कुछ सालों बाद उन्होंनने यूबीएस बैंक में काम किया, यह भी  इन्वेस्टमेंट बैंकिंग थी। यहां मनीषा ने सबसे ज्यादा वक्त तक यानी 20 साल तक नौकरी की। 33 की उम्र तक पहुंचने तक मनीषा यूबीएस की सीईओ बन गई थीं। इतनी कम उम्र में इतना बड़ा मुकाम हासिल करने के पीछे मनीषा बताती हैं, 'इसमें एक बड़ी वजह मेरी परवरिश है, अगर मैं क्लास में सेकेंड भी आती थी तो उस पर गहराई से विचार किया जाता था। मुझे लगता था कि इस स्तर तक मैं इसीलिए पहुंची क्योंकि मैं कंसिस्टेंट थी। मैं रिलेशनशिप बिल्ड करने में यकीन रखती थी, जबकि ब्रेक ना के बराबर लेती थी।'

जब मॉम बनीं मनीषा

मनीषा की जिंदगी में एक चुनौती भरा लम्हा तब आया, जब उन्होंने अपनी बेटी तारा को जन्म दिया। उस समय मैटरनिटी लीव सिर्फ तीन महीने की हुआ करती थी। मनीषा ने चौथे महीने से ऑफिस जॉइन कर लिया। वह अपने साथ-साथ बेटी के लिए भी पैकिंग करती थीं। ऑफिस के बगल के होटल में उन्होंने अपनी बच्ची की देखभाल का इंतजाम किया था। पूरे दिन वह काम के साथ-साथ अपनी बच्ची को भी संभालती थीं। मनीषा के समय में क्रेच प्रचलित नहीं थे, लेकिन बाद में उन्होंने जिस भी कंपनी में काम किया, वहां क्रेच बनाने के लिए उन्होंने मुहिम चलाई। धीरे-धीरे उन्होंने ऑफिस और घर में अपने लिए एक सपोर्ट सिस्टम विकसित किया, ताकि लोग उनकी मदद कर सकें। इसी के बलबूते वह अपनी जॉब की बड़ी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाने में कायमाब हुईं। 

manisha girotra inside

मनीषा को कई बार गिल्ट भी होता था कि वह अपनी बेटी को पूरा समय नहीं दे पातीं, अपने मुश्किल वक्त से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। वह बताती हैं, 'जब बेटी बुखार से तप रही हो और आपको न्यूयॉर्क के लिए हवाईजहाज पकड़ना हो, ऐसी स्थिति वाकई बहुत मुश्किल होती है, लेकिन इससे उबरना सीखना चाहिए। सबकुछ हमारे दिमाग में ही चलता है। अगर हम दिमाग से स्थिर हैं तो  सबकुछ संभाल सकते हैं। हकीकत यह है कि आपका काम आपको एक बेहतर मॉम बनाता है, जिस तरह से पुरुष घर का जिम्मा संभालते हुए बेहतर बन जाते हैं।'

Moelis के साथ एक नए सफर की शुरुआत

20 साल यूबीएस में काम करने के बाद मनीषा ने अपने एक्स-बॉस के साथ मोलिस को खड़ा करने में मदद की। इस बार उन्होंने एक बार फिर से नई शुरुआत की। जिस समय में उन्होंने कंपनी की स्थापना की, उस समय में अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ गई थी, लेकिन इसमें भी उन्होंने अपने लिए राहें तलाश लीं। 

महिलाओं के लिए बदल रहा है वक्त

मनीषा महसूस करती हैं कि देश की अर्थव्यवस्था सर्विस इकोनॉमी की तरफ बढ़ रही है और इसमें महिलाओं की अच्छी-खासी भागेदारी है, क्योंकि महिलाएं दूसरों की मन:स्थिति बेहतर समझ सकती हैं। इसीलिए महिलाओं के साथ किए गए तजुर्बे हमेशा ज्यादा बेहतर होते हैं। मेरा मानना है कि महिलाओं को पुरुषों के जैसा बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें उनकी तरह से काम करने देना चाहिए।'

मनीषा का मानना है कि महिलाएं अगर टॉप पोजिशन में पहुंचती हैं तो वे कई मुद्दों पर आराम से बात कर सकती हैं। पुरुषों को अक्सर ये कहते हुए नहीं पाया जाता कि वे पेरेंट-टीचर मीटिंग के लिए जाना चाहते हैं, लेकिन महिलाएं ये काम आसानी से कर लेती हैं। वह बताती हैं, 'अगर मेरी बेटी को 102 बुखार है तो मैं उसके पास अपने पति से पहले पहुंच जाऊंगी। उस समय में मुझे अपने बॉस से उम्मीद होगी कि वे मेरी मेंटल कंडिशन को समझ सकें। ऐसे में कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महिलाएं काम करने के लिए बेहतर माहौल बनाती हैं।'

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