घर-परिवार में महिलाएं छोटी-बड़ी चुनौतियों का सामना करती ही हैं और अपनी हिम्मत और हौसले के बलबूते उनके सॉल्यूशन भी निकाल लेती हैं। लेकिन मुश्किल तब होती है, जब वे घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। घरेलू हिंसा एक बेहद गंभीर मामला है और लॉकडाउन में खासतौर पर इस तरह के मामले काफी ज्यादा बढ़े हैं। घरेलू हिंसा के कारण महिलाओं को स्वतंत्र तरीके से जीने, अपना भरण-पोषण करने और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने में बड़ी बाधा खड़ी होती है। Domestic Violence Act यानी घरेलू हिंसा कानून इसलिए बनाया गया, ताकि महिलाएं बेहतर तरीके से जीवन का निर्वाह कर सकें। घरेलू हिंसा कानून में कहा गया है कि यह Protection Of Women Act है, यानी इसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं अपने अधिकारों के समुचित इस्तेमाल के लिए इस कानून का सहारा नहीं ले पातीं। इस बारे में हमने बात की जानी-मानी लीगल एक्सपर्ट और India Law Offices की पार्टनर अपराजिता चंद्रा से। अपराजिता ने हमें इस कानून के तहत महिलाओं को मिलने वाले संरक्षण से जुड़ी अहम जानकारियां दीं-

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)के ताजा आंकड़ों के अनुसार लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के मामलों में 2.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इससे इनकार किया है, लेकिन आंकड़ें बताते हैं कि महिलाएं ज्यादती की शिकार हो रही हैं। मार्च 25 से लेकर 31 मई के बीच राष्ट्रीय महिला आयोग को घरेलू हिंसा की 1477 शिकायतें व्हाट्सएप हेल्पलाइन नंबर ( (917217735372 ) पर मिलीं। यह हेल्पलाइन ऐसी ही महिलाओं को मदद मुहैया कराने के लिए स्थापित की गई थी, जो ईमेल या पोस्ट के जरिए शिकायत नहीं कर सकतीं। 

लॉकडाउन में बढ़े घरेलू हिंसा के मामले

domestic violence act for women empowerment

लॉकडाउन के समय में जितनी शिकायतें दर्ज की गईं, वे पिछले साल के मार्च से मई तक के महीने की तुलना में 1.5 फीसदी ज्यादा हैं, इसी अवधि में पिछले साल 607 शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में पिछले कुछ समय में घरेलू हिंसा के मामलों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। घरेलू हिंसा में सिर्फ महिलाएं ही नहीं, बल्कि बच्चे और बुजुर्ग भी ज्यादती के शिकार होते हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

अपराजिता चंद्रा बताती हैं, 

'लॉकडाउन की शुरुआत से ही हम महिलाओं से अपील कर रहे थे कि वे इस तरह के मामले दर्ज कराएं। कुछ राज्यों से घरेलू हिंसा की रिपोर्ट कम दर्ज हुईं। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि अब्यूजर 24 घंटे पीड़ित के साथ थे। नॉर्मल डेज में अब्यूजर दिन में काम पर चले जाते थे, लेकिन लॉकडाउन में पूरा वक्त उन्हीं के साथ रहने के कारण पीड़ित महिलाओं को मदद पाने का कोई जरिया नहीं मिला। इस समय बेरोजगारी भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है, जिसके कारण पुरुषों के अंदर आक्रोश है। इसी कारण भी महिलाएं सेक्शुअल और फिजिकल अब्यूज दोनों की शिकार हो रही हैं। अक्सर देखा गया है कि किसी तरह का गुस्सा या आक्रोश होने पर सबसे पहले महिलाएं उसकी शिकार होती हैं।'

 

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सेलेब्रिटीज ने छेड़ा था जागरूकता अभियान

लॉकडाउन के दौरान सेलेब्रिटीज ने एक नई पहल की थी और घरेलू हिंसा के खिलाफ अभियान छेड़ा था। इस अभियान में माधुरी दीक्षित, करण जौहर, विद्या बालन, अनुष्का शर्मा और विराट कोहली जैसे सेलेब्रिटीज भी शामिल थे। इस सेलेब्स ने घरेलू हिंसा पर लॉकडाउन को लेकर एक वीडियो जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि अगर महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं तो वे आवाज उठाएं।

घरेलू हिंसा में आती है ये चीजें

1. शारीरिक हिंसा-इसके तहत महिला के साथ मारपीट, जोर-जबरदस्ती या चोट पहुंचाने जैसी चीजें आती हैं। 

2. यौन हिंसा-इसके तहत रेप और मैरिटल रेप दोनों ही आते हैं। मैरिटल रेप को समाज और कानून दोनों ही स्वीकार नहीं करते हैं, जबकि हर साल इस तरह के ढेरों मामले सामने आते हैं। 

3. Verbal Abuse-इसे मेंटल हैरसमेंट या मानसिक शोषण भी कहा जाता है। इसमें गलत तरीके से बोलना, भावनात्मक रूप से चोट पहुंचाने जैसी चीजें शामिल हैं। इस तरह का शोषण सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि घर-परिवार के बड़े सदस्य भी करते हैं, इनमें बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल हो सकती हैं। अक्सर इस तरह के मामलों में परिवार के कई सदस्य जैसे कि ननद, देवर, भाभी, सास, ससुर आदि अब्यूसर के साथ नामित होते हैं। परिवार के जो लोग इसका परोक्ष रूप से समर्थन करते हैं, वे भी इसके दोषी होते हैं। 

4. Economic Abuse- अगर पति पत्नी को फाइनेंशियली सपोर्ट नहीं करता या उसके जरूरी खर्च के लिए उसे पैसे नहीं देता तो इस तरह के मामले Economic Abuse के तहत आते हैं। अगर घर के सामान को बिना पत्नी की सहमति के हटाया जा रहा है या उसे दैनिक जरूरतों के लिए राशन मुहैया नहीं हो रहा तो ये चीजें भी Economic Abuse के तहत आती हैं। साथ में रहते हुए अगर पति घर के खर्चों के लिए पैसे नहीं देता है तो यह चीज भी आर्थिक शोषण के तहत आती है। ज्यादातर मामलों में  Economic Abuse को बड़ा मामला नहीं बनाया जाता, लेकिन यह एक गंभीर मसला है। इसे कानून भी गंभीरता से लेता है। 

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घरेलू हिंसा अधिनियम बच्चों और बुजुर्गों को भी देता है सुरक्षा

अपराजिता चंद्रा बताती हैं, 'घरेलू हिंसा कानून महिलाओं के साथ-साथ 18 साल की उम्र तक के बच्चों को भी संरक्षण देता है। इस कानून के तहत सहायता पाने के लिए लोकल पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत होती है। वहां घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया जा सकता है। पुलिस अफसर पहले मामले की पड़ताल करता है। अगर उसे लगता है कि इसका कानूनी मामला बनता है तो वह इसकी एफआईआर दर्ज करता है। पुलिस वाले पहले एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं। पहले वे शिकायत दर्ज करते हैं। ज्यादातर मामलों में महिलाएं सिर्फ शिकायत दर्ज करा देती हैं, जिससे गंभीर मामलों में उचित कार्रवाई नहीं हो पाती। एफआईआर के बाद मामला अदालत में जाता है। इसके बाद अदालत इसका संज्ञान लेती है। बहुत से मामले में महिलाएं सीधे अदालत में जाकर संरक्षण की फरियाद करते हैं। अदालत ऐसे मामलों में संरक्षण दिए जाने के लिए कह सकती है या फिर पीड़ित को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे सकती है।'

पिता के घर रहते हुए भी महिलाएं दर्ज करा सकती हैं मामला 

महिलाएं घरेलू हिंसा का मामला कहीं से भी दर्ज करा सकती हैं। अगर वे पति की ज्यादती की शिकार होने के बाद पिता के पास आकर रहने लगीं हैं तो वहां से भी मामला दर्ज करा सकती हैं। अगर महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर आश्रित हैं तो वे अदालत में मेंटेनेंस दिए जाने के लिए भी निवेदन कर सकती हैं। इसके लिए अदालत अंतरिम आदेश में मेंटेनेंस दिए जाने का आदेश दे सकती है। आजकल ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की तरफ से काउंसलर की नियुक्ति की जाती है। काउंसलर दोनों पक्षों की बात सुनता है और अगर मामला बातचीत से सुलझ सकता हो तो वह दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का प्रयास करता है। कई बार मेंटेनेंस या दूसरे मामलों पर काउंसलर के स्तर पर ही मामले में सहमति बन जाती है और आगे की अदालती प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अगर काउंसलर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है तो कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। 

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घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत होने वाली कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानें

ज्यादातर मामलों में महिलाएं पुलिस ऑफिसर या मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होती हैं। एक्ट के तहत सर्विस प्रोवाइडर और प्रोटेक्शन ऑफिसर से भी मदद मांगी जा सकती है, लेकिन ज्यादातर इनकी उपलब्धता नहीं होती और ना ही इसके बारे में लोगों को जानकारी होती है। जिन मामलों में महिलाएं स्वयं जाकर शिकायत दर्ज नहीं करा सकतीं, वहां महिलाएं सर्विस प्रोवाइडर या प्रोटेक्शन ऑफिसर से मदद मांग सकती हैं। बहुत सी संस्थाएं मांग कर रही हैं कि इस तरह के लोगों को नियुक्त किया जाए, जो महिलाओं को मदद कर सकें। एक्ट के तहत घरेलू हिंसा के मामले में कार्रवाई 50 दिन में पूरी हो जानी चाहिए। लेकिन वास्तविक हालात में दोषी व्यक्ति को अदालत में लाते-लाते ही दो महीने लग जाते हैं। जब अदालत पीड़ित महिला का पक्ष सुन लेती है तो वह अब्यूजर को नोटिस इशु करती है और उसे कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए कहती है। कोर्ट दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद अपना फैसला सुनाती है।  

अदालत पीड़िता के संरक्षण के लिए दे सकती है अलग-अलग आदेश 

अदालत ऐसे मामलों में पीड़िता को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे सकती है, अगर महिला ने मेंटेंनेंस के लिए निवेदन किया है तो उस बारे में फैसला लेती है। घरेलू हिंसा में दोष साबित होने पर अब्यूजर पर जुर्माना लगाया जा सकता है।बच्चों की कस्टडी किसके पास रहेगी, इस बारे में भी अदालत फैसला दे सकती है। इस कानून के तहत अब्यूजर को सीधे तौर पर जेल नहीं होती है, बल्कि अदालत अलग-अलग तरह के ऑर्डर पास कर पीड़िता को संरक्षण देता है। अगर अब्यूजर अदालत के आदेश का पालन नहीं करता तो उस स्थिति में उसे 1 साल की सजा हो सकती है।

वुमन सेफ्टी के लिए पहल जरूरी 

घरेलू हिंसा को तभी रोका जा सकता है, जब वुमन सेफ्टी को लेकर जागरूकता बढ़े और महिलाएं अपने साथ किसी तरह की हिंसा या मारपीट होने पर मदद पाने के लिए अपील करें। इसीलिए महिलाओं को मुश्किल से मुश्किल स्थितियों में भी सोच सकारात्मक बनाए रखनी चाहिए और बेहतर जीवन पाने के लिए अपने प्रयास जारी रखने चाहिए। अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी तो इसे जरूर शेयर करें। महिलाओं से जुड़े अन्य मुद्दों पर जानकारी पाने के लिए विजिट करती रहें हरजिंदगी।

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