Entry-6 

"भाभी की इतनी तबियत खराब थी और तुमने किसी को बताने की ज़रुरत नहीं समझी?" मैं भाभी की पीठ सहला रही थी, दर्द से उनका बुरा हाल था।

"किसको बताता? किसी को पड़ी है इसकी?" ऋषभ भईया गरम पानी की बोतल तैयार कर रहे थे।

"छोड़ो ना ऋषभ, इन बातों का कोई फ़ायदा नहीं, आरती घर पर पता है कि तू यहां आई हुई है?" भाभी ने हिम्मत जुटा कर पूछा।

"भाभी आप यह सब मत सोचो, आप अपना ख्याल रखो, आराम करो... अब मैं आपको क्या बताऊ, आप खुद अपने मरीजों को ये सब हिदायतें देती हो" मैंने मुस्कुराकर बात टालने की कोशिश की।

इस समय भाभी को टेंशन देना ठीक नहीं है, उन्हें दादी के गुस्सा, मम्मी के दुःख, और पापा के अंतर्द्वंद से जितना दूर रखे उतना ही अच्छा...

"चलो में चलती हूं... ऑफिस में एक ज़रूरी मीटिंग है। टेक केयर भाभी" ऋषभ भईया मुझे छोड़ने बाहर आये और अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया।

"आरती, सुरभि की हालत ठीक नहीं है...उसका एमनीओटिक फ्लूइड बहुत कम है...ओ..मतलब...बच्चे को खतरा है...उसे पूरा बेड रेस्ट करना पड़ेगा...नहीं तो उसकी जान को भी खतरा हो सकता है..." बोलते-बोलते ऋषभ भईया की आंखें भर आई थी।

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"भईया! प्लीज...आप रो रहे..." भईया ने इशारे से मुझे रोक दिया।

"श..श... धीरे...सुरभि को नहीं पता चलना चाहिए...वो बेचारी वैसे ही परेशान है" मैंने भईया को इतना दुखी पहले कभी नहीं देखा था। मेरा भी गला भर आया, मैंने भईया का हाथ कसकर पकड़ लिया। अगर आपसे आरती की कहानी की शुरुआत मिस हो गई हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। शादी के लिए रिजेक्शन का हक क्या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

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"खुद को अकेला मत समझना...मैं आती रहूंगी और..."

"मां से बात कर आरती..." भईया मेरी ओर ऐसे देख रहा था जैसे कोई बच्चा चॉकलेट के लिए मिन्नत करता है।

"..अगर मां कुछ दिन यहां सुरभि की देखभाल करने आ जाये..."

"भईया मैं पक्का नहीं बोल सकती...मुझे पता नहीं...तुमको तो पता है.." भईया बहुत ही बेबस होंगे जो मां को यहां अपने घर में लाने की बात कर रहे है। "क्या सुरभि भाभी चाहती है ...?" मैंने धीरे से पूछा।

भईया ने सर हिला दिया, नज़रे झुकाकर बोले "नहीं, मैंने उससे ये डिस्‍कस नहीं किया, तू आज आई तो लगा बोल दूं, शायद तू मां को समझा पाए। मेरे से अकेले नहीं हो पा रहा है आरती, अब काम का भी प्रेशर ज़्यादा है। कल को शहर के बाहर एक दिन भी जाना पड़ गया तो यहां सुरभि अकेली पड़ जायेगी...तीन चार महीने की बात है..."

"और फिर क्या?" मैंने पूछा

"फिर डिलीवरी के बाद मां चली आएगी घर तुम लोगों के पास"

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मैं ऐसा सोचना तो नहीं चाह रही थी, पर भईया की बातों से ऐसा लग रहा था कि उनको भाभी की देखभाल करने के लिए एक काम वाली चाहिए। मुझे मां के लिए बहुत दुःख हुआ। अगर आपसे आरती की कहानी की दूसरा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। रिश्ते के लिए देखने आया था या डेटिंग के लिए? अब आप बताइये में क्या करूं? : Hello Diary

"आप एक बार भाभी से बात कर लो, और कोई और रास्ता भी ढूंढ सकते है...उनके हॉस्पिटल से कोई नर्स क्यों नहीं बुला लेते?" भईया के चेहरे का रंग बदलता दिख रहा था...एक व्यंगात्मक मुस्कराहट लिए बोले,  " अच्छा तो तू भी अब उनकी ही भाषा बोलने लगी है..ठीक है भाई...तो हम देख लेंगे खुद ही। तू जा, और बेकार में यहां आने की ज़रुरत नहीं है।" मैंने भईया के खतरनाक गुस्से को बचपन से देखा था, और इस वक्‍त उनसे बहस करना फ़िज़ूल था।

"आप गलत समझ रहे हो भईया, पर मैं बहस नहीं करूंगी आपसे, भाभी की टेंशन नहीं बढ़ानी मुझे।"

"हां सही है, कम नहीं कर सकती है तो बढ़ाने कर भी हक़ नहीं है तेरा...तू जा आरती।" भईया ने मेरे मुंह पर दरवाज़ा बंद कर दिया।

गुस्सा तो मुझे भी बहुत आ रहा था, घड़ी पर नज़र गई तो देखा मीटिंग शुरू होने में बस 20 मिनट बाकी थे। मैंने जल्दी से कैब बुक की, लिफ्ट का इंतज़ार करने का भी समय नहीं था..मैं गुस्‍से में सातवें माले से नीचे उतरने लगी।

टिंग-टिंग

फ़ोन की घंटी बजी

ड्राइवर पहुंच चुका था - गाड़ी का नंबर देखकर फ़ोन पर्स में डाल ही रही थी कि अचानक!

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"आह! ओह मां!" दर्द से मेरी चीख निकल गई। मेरा पैर एक सीढ़ी पर ना जाने कैसे फिसल गया और मैं धम से नीचे गिर गई। दर्द और शर्म एक साथ कैसे महसूस होती है, जानते है क्या आप? वो तो अच्छा हुआ कि आजकल सीढ़ी से ज़्यादातर लोग जाते नहीं, मुझे गिरते हुए किसी ने नहीं देखा। लेकिन... उफ़ ये क्या हो गया! मेरी सैंडल भी टूट गई! अगर आपसे आरती की कहानी की तीसरा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। स्वाभिमान या पैसा- क्या चुनना चाहिए एक लड़की को शादी के लिए: Hello Diary

"ये आज ही होना था!" मीटिंग में सिर्फ पन्द्रह मिनट ही बचे थे। घर जाकर सैंडल बदलने व नई खरीदने का टाइम नहीं था। "टूटी चप्पल...क्‍लाइंट पर क्या इम्प्रेशन पड़ेगा!" हिम्मत करके मैं सीढ़ी से नीचे उतरी और गाड़ी मैं बैठ गई। ऑफिस दस मिनट ही दूर था, और जब तक मैं ऊपर अपने वर्कस्टेशन तक पहुंची, मीटिंग का समय हो चुका था।

ओह! आज मैं आपको पहली बार अपने ऑफिस लाई हूं ना? ये है चोपड़ा एंड चोपड़ा प्राइवेट लिमिटेड। आनंद चोपड़ा और मिलिंद चोपड़ा, कंपनी को खोलने वाले भाई नहीं थे, महज़ एक इतफाक था कि दोनों का सरनेम एक ही था। ये इंटीरियर डिज़ाइन की कंपनी है जहां मैं डिज़ाइनर के तौर पर काम करती हूं। और अपने मुंह मिया मिट्टू कहलाने का जोखिम लेते हुए मैं आपको बताने चाहती हूं कि मैं अपने काम में बहुत अच्छी हूं। मेरे डिज़ाइन और कॉन्सेप्ट्स के चलते चोपड़ा एंड चोपड़ा को बहुत सी बड़ी डील्स मिली है। आज की मीटिंग भी एक बहुत बड़ी डील के लिए है। क्लाइंट एक बिज़नेस परिवार है जो अपनी एक पुरानी हवेली को होटल बनाना चाहते है। मैंने दिन-रात एक करके एक कांसेप्ट और डिज़ाइन तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट को मिलिंद चोपड़ा सर हैंडल कर रहे है। आज की मीटिंग अगर अच्छी गई और क्लाइंट को हमारा डिज़ाइन पसंद आ गया तो कंपनी को बहुत फ़ायदा होगा - पब्लिसिटी मिलेगी वो अलग।

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मैं सारे ड्राफ्ट्स और फाइलें उठा कर मीटिंग के लिए निकल ही रही थी कि इतने में मिलिंद सर मेरी तरफ ही आ गए। "आरती, सब तैयार?" सर थोड़ी टेंशन में लग रहे थे..."हां सर, बिलकुल" मैंने आश्वासन देते हुए कहा। अगर आपसे आरती की कहानी की चौथा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। क्या शादी में पुरानी, रूढ़िवादी सोच बदलने का टाइम आ गया है? - Hello Diary

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"तो चलो फिर..."

टूटी सैंडल में लड़खड़ाती हुई जैसे मैं चलने लगी, मिलिंद सर रुक गए..." आरती! व्हाट इस थिस? तुम्हारी चप्पल टूटी हुई है?"

"सर टूट गई अचानक" मैं खुद भी झेप गई। 

"और तुम सोच रही हो कि तुम ऐसे मीटिंग में जाओगी? दिमाग ठिकाने है? जानती भी हो ये कितने बड़े लोग हैं? ऐसे देखेंगे तुम्हें तो सोचेंगे पूरी कंपनी फटिचरों की है। नो! ये नहीं हो सकता।"

"बट सर...मैंने सारी तैयारी की हुई है, ये डिज़ाइन आपको भी बहुत पसंद है, क्लाइंट डिज़ाइन देखेगा या मेरी टूटी चप्पल? हमारा काम बोलेगा सर" मैं अपने काम को लेकर काफी कॉंफिडेंट थी। चप्पल - वप्पल गई भाड़ में!

"नहीं, तुम नहीं जा सकती। वैभव, आरती से डिज़ाइन ले लो। अपनी टाई सीधी करो और चलो।" ये बोलकर मिलिंद सर मीटिंग रूम की तरफ बढ़ गए।

इतनी देर में कि मैं कुछ समझ पाती, वैभव ने मेरे हाथ से फाइलें छीन लीं और मिलिंद सर के पीछे भागा।

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मेरे हाथ से मेरी दिन रात की मेहनत, मेरे आइडियाज, मेरी इतनी बड़ी डील सब निकल रही थी...वो भी सब एक टूटी हुई चप्पल के पीछे। वैभव को मेरे डिज़ाइन समझाने या प्रेज़ेंट करने भी नहीं आएंगे। डील निकल गई तो सब यही कहेंगे की डिज़ाइन ही खराब थे। अगर आपसे आरती की कहानी का पाचवां एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। अपनी ज़िन्दगी जीने का हक क्‍या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

उफ़! मैं क्या करूं? यहां बैठकर अपनी फूटी किस्मत और टूटी चप्पल पर रोऊं? या फिर मिलिंद सर की बात को नज़रअंदाज़ करके मीटिंग में घुस जाऊं? शायद पहले सबको मेरी टूटी चप्पल खटकेगी, पर अगर क्लाइंट में ज़रा भी दिमाग होगा तो वो मेरे काम का महत्व समझ जाएगा। पर अगर मिलिंद सर की बात ना मानने की वजह से उन्होंने ही मुझे निकाल दिया तो? मुझे तो समझ नहीं आ रहा। आप ही बताइये में क्या करूं? मुझे इंतज़ार रहेगा

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