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"तुम खड़ी क्यों हो गईं?" गिरीश मुझे पर्स से पैसे निकलते देख भौचक्का सा गया था।

"गिरीश मुझे निकलना होगा" एक कॉफ़ी का पैसा टेबल पर रखकर मैं आगे बढ़ने लगी। पिछली कड़ी में आप सब से राय लेने के बाद मैंने यही फैसला किया है किगिरीश के साथ शादी करना ठीक नहीं होगा। हां वो पैसे वाला ज़रूर है, दिखने में भी अच्छा है, मम्मी पापा और दादी को भी पसंद है और मुझसे शादी करने के लिए तैयार है, लेकिन उसकी नज़र में पत्नी का कोई रुतबा या इज़्ज़त नहीं है।

"अरे, तुम ऐसे कैसे जा सकती हो? हमारी बात अभी ख़त्‍म नहीं हुई" गिरीश गुस्से में आगे बढ़ा।

"नहीं गिरीश, असल में हमारी बात ख़त्म हो गई है,"

"क्या बक रही हो?" इस वक्‍त गिरीश के तेवर ही बदले हुए थे।

"एक्सक्यूज़ मी? तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते!" कॉफ़ी शॉप में लोग अब हमें ही देख रहे थे, पर इस बात का गिरीश पर खास असर नहीं दिखा।

"अच्छा चलो चलो, बैठ जाओ...कॉफ़ी तो पी लो। हमें आगे की चीज़ें भी फिक्स करनी है।" गिरीश वापस काउच पर बैठ गया, "तुम लड़कियां भी न बड़ी ड्रामेबाज होती हो, अब आओ न.."

आप यकीन नहीं करेंगे, गिरीश काउच को थपथपाते हुए मुझे पास बुला रहा था। जैसे किसी कुत्ते को बुलाते हैं।

"शायद तुम्हें बात समझ नहीं आई गिरीश, मैं तुम्हें...तुम्हें रिजेक्ट कर रही हूं। मुझे ये शादी मंज़ूर नहीं।"

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गिरीश के चेहरे का रंग गायब हो रहा था...अरे ये क्या? अब रंग सुर्ख हो रहा था। आंखे चौड़ी करके गिरीश चिढ़कर बोला "तो आई क्यों थी यहां?"

"बात बढ़ाने का कोई फ़ायदा नहीं गिरीश, पर मुझे लग रहा है कि तुम्हारा और मेरा जमेगा नहीं, कम्पेटिबिलिटी इशू होगा।" मैं जल्द से जल्द यहां से निकलना चाहती थी

"ये तो कोई बात नहीं हुई, ये तो अपने मन से कोई भी बहाना बनाने की बात है। क्या कम्पेटिबिलिटी चाहिए इन्हें? सब शादी ऐसे ही करते है, अच्छा... घर पर देखने आया था तब तो कोई इशू नहीं दिखा आपको मैडम, अब नई परेशानियां दिख रही है?" गिरीश रिजेक्शन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

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"कम्पेटिबिलिटी! ट्यूनिंग! शादी के लिए मैं इसे बहुत ज़रूरी समझती हूं गिरीश। सिर्फ शक्ल सूरत या काम और पैसा देखकर शादी करना सही नहीं है। मैं कैसे किसी ऐसे इंसान के साथ पूरी ज़िन्दगी गुज़ार सकती हूं जिसे मेरे नाम, मेरे व्यक्तित्व, मेरी पसंद-नापसंद से कोई सरोकार नहीं। जो इतनी भी जेहमत नहीं उठा सकता है कि कॉफ़ी आर्डर करने से पहले पूछ ही ले कि मैं कॉफ़ी पीती भी हूं या नहीं। जो मुझसे मेरे नाम बदलने की बात ऐसे तो ना करें जैसे मेरे नाम का कोई मतलब, कोई इम्पोर्टेंस ही नहीं। नाम तो छोड़ो मैं तो शादी के बाद शायद अपना सरनेम भी ना बदलूं। क्यों क्या हुआ? गिरीश, अगर तुम्हारी पहचान है तो क्या मेरी पहचान सिर्फ इसलिए नहीं होनी चाहिए कि मैं एक लड़की हूं और मेरी शादी हो रही है? क्यों लड़की की शादी से पहले की उसकी ज़िन्दगी का अंत हो? शादी है, मर थोड़ी ना रही है लड़की। तुम तो मेरे वजूद को ही ख़त्म करना चाहते हो! मैं आरती अवस्थी हूं, और मेरी पहचान मेरे लिए ज़रूरी है।" अगर आपसे आरती की कहानी की शुरुआत मिस हो गई हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें।  शादी के लिए रिजेक्शन का हक क्या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

मेरी आंखें भर आई थी।

"लेकिन सब ऐसा ही तो करते हैं, मैंने कोई निराली बात तो नहीं कर दी। भई इंडिया में तो यही होता है" गिरीश को मेरी बात समझ नहीं आएगी। उसे मैं ही गलत लगूंगी। इस मानसिकता को बदलना अभी, इस वख्त, मुमकिन नहीं है।

"मैं चलती हूं, आल दा बेस्ट फॉर योर लाइफ गिरीश।" ये कह कर मैं दरवाज़े की ओर बढ़ी। 

"आरती अवस्थी..." गिरीश ने मुझे पीछे से आवाज़ लगाई। अब शायद वो ड्रामेटिक स्टाइल में उसे रिजेक्ट करके जाने के लिए मुझे डराए - धमकाएगा। मुझे शायद ये एहसास कराएगा कि मैं कितनी बड़ी गलती कर रही हूं या फिर ये कि वो मेरा नाम ख़राब करेगा। पर अब जो भी हो, फैसला कर लिया तो कर लिया। 

"लुक, आई एम सॉरी!" क्या? गिरीश मुझसे माफ़ी मांग रहा था? ये क्या कोई नया पैतरा है इसका?

 

"मैं सच में शर्मिंदा हूं, असल में, इससे पहले किसी ने मुझसे इस नज़रिये की बात ही नहीं की। मतलब, मैं शादी को अपने पॉइंट ऑफ़ व्यू से ही देख रहा था। जितनी भी लड़कियों से मैं तुमसे पहले मिला, किसी ने भी मुझे अपना नजरिया बताया नहीं। वो छोडो, मेरी मां ने भी मुझे लड़कियों का पक्ष नहीं बताया। मतलब वो खुद एक औरत हैं, उन्होंने मुझे दूसरी औरत के प्रति दया या अंडरस्टैंडिंग की कोई बात क्यों नहीं की? मैं ये समझ नहीं पा रहा हूं। तुम्हारी बात सुनकर लगा की हां, सही ही तो बोल रही हो तुम। शादी करने से तुम्हारे अस्तित्व की मौत क्यों हो? पर ये भी सच है कि मुझे जिस सीख से बड़ा किया गया है और मैं जैसा पति बन सकूंगा, वो तुम्हारे लायक नहीं होगा, आरती।" गिरीश की आंखों में मुझे सच्चाई दिख रही थी। वो बुरा लड़का नहीं था, उसे बस अच्छा इंसान बनाने कुछ वक़्त लगेगा। 

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मैं मुस्कुराई और कॉफ़ी शॉप से बाहर निकल आई।

तेज़ धूप में खड़ी मेरी गाडी तप चुकी थी, AC को फुल स्पीड में ऑन करके मैं ऑफिस की तरफ निकल गई। दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी, क्यों लड़कों को बड़ा करते हुए हम उन्हें अच्छा इंसान बनाना भूल जाते हैं? घर का काम, खाना बनाना, सफाई, कपडे धोना, ये लड़को से कभी क्यों नहीं कराये जाते? मर्दानगी की क्या परिभाषा सीखा रहे हैं मां - बाप? क्यों शादी करके सिर्फ लड़की घर छोड़ती है? और घर छोड़ती है तो उसके मां बाप से उसके रिश्तें क्यों छुटवाये जाते हैं? कभी लड़का घर छोड़ने की बात कर दें तो इस बार भी बहू को ही दोषी करार कर दिया जाता है। 

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"घर को तोड़ दिया इस डायन ने", दादी की आवाज़ जैसे मेरे कानों में आज भी गूंज रही थी। उस दिन की याद दिल में एक टीस सी उठा जाती है। इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने वाली आरती अपने घर में हो रहे रूढ़िवादी ड्रामे में चू भी ना कर सकी थी। सुरभि भाभी की अलग रहने की ज़िद्द ने उन्हें घर का विलेन बना दिया था। कुलटा, कलमुही...ऐसे ना जाने कितने नामों से सुरभि भाभी को बुलाया गया था। आज भी घर पर कोई उनका नाम नहीं लेता। ऋषभ तो महीने में एक आध बार आ जाता है पर भाभी के घर आने पर तो बैन सा ही है।

बात सिर्फ इतनी थी कि भाभी ऋषभ के साथ एक अलग घर में रहना चाहती थीं। हमारे घर में किसी के गले से ये बात नहीं उतरी। बुरा तो तब मुझे भी लगा था। सब भाभी को इतना प्यार देते थे, दादी भी उनपर लट्टू थीं। इस पर भी भाभी ने घर अलग लेने की बात की तो सब का दिल टूट गया। अगर आपसे आरती की कहानी की दूसरा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें।  रिश्ते के लिए देखने आया था या डेटिंग के लिए? अब आप बताइये में क्या करूं? : Hello Diary

"आरती, घर अलग लेने से क्या रिश्ते टूट जाएंगे? मैं तो तब भी तुझे इतना ही प्यार करुंगी- तू करें या ना करें।" भाभी ने मुझे माथे पर चूमते हुए कहा था।

"तो क्यों जा रही हो अलग?"

"आरती तू नहीं समझेगी अभी। जब अपना घर छोड़कर किसी और के घर में जाना होगा ना, तब तुझे मेरी याद आएगी। दूसरा घर, जहां की एक-एक चीज़ किसी और के हिसाब से बनी हो। जहां तुमको लाकर छोड़ दिया, कि लो अब यहां रहना है तुमको। तुम लोगों से मुझे अपनापन मिला है आस्था, लेकिन मैं अपना घर, अपने पति के साथ बनाना चाहती हूं। जहां मैं अपने हिसाब से छोटी-छोटी चीज़े लाऊंगी, वहां की चम्मच- कटोरी, पर्दें- चादरें, हर चीज़ जुटाने में जो यादें बनेगी वो यादें मेरी और ऋषभ की होंगी। मेरा घर होगा वो, ना मायका ना ससुराल- ये दोनों जगह मुझे प्यारी होंगी, पर मेरा घर होगा वो जिसमें मैं अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से, अपने पति के साथ बिताउंगी। क्या मैं गलत हूं आरती?"

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उस वक़्त तो मैं भाभी की बात का जवाब नहीं दे पाई। मां की गीली आंखें और दादी का गुस्सा मुझे कुछ सोचने ही नहीं दे पा रहा था। पर आज भाभी की याद आ गई। सच में, क्या वो इतनी गलत थीं? वो भी तो शादी के बाद अपने मां-बाप का घर छोड़ कर आई थीं, तो अगर ऋषभ ने भी अपने मां-बाप का घर छोड़ एक नया घर बसाया तो इसमें इतनी बुरी बात क्या हुई? अगर ख़ुशी से जाने देते तो आज ऋषभ और भाभी से कहीं बेहतर रिश्ता होता हम सब का। मेरी आज की गिरीश से मुलाकात के बाद मुझे भाभी की बात झिंझोड़ रही थी। आप ही बताइये, कि क्या भाभी गलत थीं? क्योंकि अगर वो गलत नहीं थीं, तो मैं उनका साथ देना चाहूंगी। मैं मम्मी-पापा और दादी को भाभी को माफ़ करने के लिए मनाऊंगी। आप ही बताइये कि क्या मुझे ऐसा करना चाहिए?

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