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विंड चाइम की टिंग-टिंग की आवाज़ से उठना मुझे अच्छा लगता है। लेकिन इस कंक्रीट जंगल की सील बंद खिड़कियों पर मेरा विंड चाइम बस धूल ही खा रहा है। और मुझे उठाने की ज़िम्मेदारी मेरे फ़ोन के अलार्म को मिल रखी है। बेचारा बार-बार स्नूज़ होता है, और फिर आखिरकार जब मम्मी बाहर से आवाज़ लगाती है कि "उठ भी जा अब कुम्भकरण!" तब कहीं जाकर मैं बिस्तर से निकलती हूं।

लेकिन आज बात कुछ अलग थी, आज तो अलार्म से पहले ही उठकर मैं कमरे के चक्कर काट रही थी। गिरीश के फ़ोन ने मुझे काफी बेचैन कर दिया था। कल जो रिश्ता वो ठुकरा चुका है, आज उसी लड़की से मिलने के लिए फ़ोन पर मिन्नतें कर रहा है।

"प्लीज मुझसे, एक बार मिल लो।" गिरीश ने कल, देर रात फ़ोन करके कहा।

मेरे मना करने के बाद भी वो नहीं माना तो मैंने कहा, "अच्छा तो आ जाओ घर"

"नहीं, घर पर नहीं। घर पर सब फॉर्मल हो जाता है। कहीं बाहर नहीं मिल सकते?"

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गिरीश मुझे अच्छा लड़का लगा था, तो जब कल शेखर अंकल ने पापा को फ़ोन करके कहा कि गिरीश शादी से मना कर रहा है, तो थोड़ा बुरा लगा था। लेकिन अरेंज मैरिज में ऐसी छोटी-मोटी बातों का होना बनता है। मना कर दिया, तो कर दिया, ठीक है, आगे बढ़ो।

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"पर अब गिरीश मिलना क्यों चाहता है?"

"मिल के बताएगा क्या, कि मुझमें क्या खामियां दिखी उसे?"

"पर क्या मुझे उससे अकेले मिलने बाहर जाना चाहिए?"

"ऐसी क्या बात है जो वो घर पर नहीं करना चाहता?"

"क्या वो शादी करने को तैयार हो गया है?"

इसी तरह के कई हज़ार सवाल रात भर से मेरे दिमाग में घूम रहे थे, पर अभी तक मैं तय नहीं कर पाई थी कि मुझे क्या करना है।

एकदम से दरवाज़ा खोल मां अंदर झांक के बोलीं, "जाना है?"

हैं? इन्हें कैसे पता चल गया? कहीं गिरीश ने मां - पापा को भी फ़ोन तो नहीं कर दिया? मैं मुंह खोल के मां को घूर रही थी...

"अरे, देख क्या रही है? ऑफिस जाना है या नहीं?"

"ओह, हां ऑफिस! ओफ़्कौर्से मां, जाना है। ऑफिस नहीं जाउंगी तो कहां जाउंगी?"

मम्मी कंफ्यूज होकर मुझे देख रही थी, कुछ बोलने ही वाली थी कि दादी ने आवाज़ लगा दी

" अरे सुषमा, चाय बनी?"

"आई!"

थैंक गॉड दादी! मम्मी अगर कुछ और सवाल पूछती तो मैं सब उगल देती। वैसे तो मैं मम्मी से कुछ नहीं छुपाती, मतलब...ज्‍यादातर कुछ नहीं छुपाती! लेकिन अगर ये बताऊगी तो वो डिस्टर्ब हो जाएगी। दादी तक बात पहुंच गई तो बवाल ही मच जायेगा- गिरीश तो गिरीश, उसके पापा, चाचा, यहां तक कि दादा जी तक को फ़ोन चले जायेगे। अभी चुप रहना ही बेहतर होगा।

टिंग टिंग

फ़ोन पर मैसेज का अलर्ट आया था। गिरीश का नंबर कल ही सेव किया था, और स्क्रीन पर उसका नाम फ़्लैश कर रहा था।

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"तुम आओगी ना?"

मुझे तो दया सी ही आ रही थी अब गिरीश पर। क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने अपने पर्स से डायरी निकाली और झट से उसमें दो टेबल बनायीं। एक तरफ हां लिखा और एक तरफ ना। पेज के सबसे ऊपर लिख दिया "गिरीश से मिलने जाना चाहिए?"

हां - के नीचे मैंने लिखा

-वो मिन्नतें कर रहा है।

-तमीज़दार लगता है।

-दिखने में बुरा नहीं है।

-शायद कल के बाद उसका मन बदल गया हो और वो मुझसे शादी करना चाहता है। 

-शायद उस दिन सब के सामने मिलने में घबरा गया हो, इसलिए अलग मिलना चाहता है। 

ये सब पॉइंट्स लिखे तो इन बातों में दम लगने लगा। हां, ठीक है, मिलने में क्या हर्ज़ है? इसी सवाल का जवाब देने के लिए मुझे 'नहीं' की लिस्ट भरनी थी। अगर आपसे आरती की कहानी की शुरुआत मिस हो गई हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें।  शादी के लिए रिजेक्शन का हक क्या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

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गिरीश से मिलने जाना चाहिए?

नहीं- के नीचे मैंने लिखना शुरू किया। 

-वो मुझे रिजेक्ट कर चुका है।

-अकेले बाहर मिलने बुलाने में उसकी नीयत का मुझे कोई अंदाजा नहीं।

-मैं उससे ढंग से जानती तक नहीं हूं।

-किसी ने हमें साथ देख लिया तो पता नहीं क्या सोच सकता हैं।

ये बातें भी सब सच ही थीं। हां और नहीं, दोनों बातों में मैं उलझ गयी हूं। अब आप ही मेरी उलझन सुलझाइये। आपको क्या लगता है? क्या गिरीश से मिलकर एक बार ही इस उलझन को सुलझा लू या फिर ना मिलूं और शायद ज़िन्दगी भर सोचती रहूं कि यूं होता तो क्या होता? मैं आपकी राय का इंतज़ार कर रही हूं। इस लिंक पर क्लिक करके अपनी राय मेरे साथ शेयर करें। 

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