Entry-5

सुरभि भाभी अपनी अलमारी काा दरवाज़ा खोले एक टक देखी जा रही थी। मैं कमरे में आ गई थी, इस बात का उनको एहसास ही नहीं हुआ था। मैंने पास जाकर देखा तो भाभी, अलमारी में रखे एक साटन के सुर्ख कपड़े को सहला रही थीं। नज़रें, जैसे कहीं दूर टिकीं हों, और आंखों के कोनों से आंसू बस डबडबाने को तैयार।

वो दिन आज भी मुझे ऐसे याद है जैसे कल की बात हो।

"क्या हुआ भाभी?" मैंने धीरे से पूछा था।

"अरे आरती, कुछ नहीं...आ गई ऑफिस से?" भाभी ने जल्दी से दराज़ बंद कर दी थी।

"क्या छुपा रही हो भाभी?"

"खज़ाना!" भाभी ने हंस कर कहां था, "आजा गर्म-गर्म डिनर कर लें, मैं रोटी बना रही हूं।"

इसे जरूर पढ़ें: शादी के लिए रिजेक्शन का हक क्या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

भाभी जब कमरे से निकली तो मैंने दराज़ खोलकर देखा, अंदर एक लाल रंग की साटन की नाइटी थी। बड़ी ही खूबसूरत, मखमली कपड़े से बनी, सामने से जालीदार काम। मुझे याद आया कि जब भाभी के शादी का सामान खुला था, तो ये नाइटी उनकी अटैची में से निकली थी। पर टैग अभी तक लगा हुआ था। भाभी ने अभी तक पहनी ही नहीं...घर पर दादी सास, सास - ससुर के चलते, बेचारी कहां पहन पाती, इतनी मोहक नाइटी? उन्होंने शादी से पहले कितने अरमानों से ली होगी। सोचो तो कितनी छोटी से बात लगती है ना? पर ये छोटे-छोटे कम्प्रोमाइज़ेस कब नासूर बन जाते है, पता नहीं चलता। अगर आपसे आरती की कहानी की शुरुआत मिस हो गई हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें।  शादी के लिए रिजेक्शन का हक क्या सिर्फ लड़के को है? : Hello Diary

मैं तीस साल तक इस घर में बड़ी हुई, हमारा खाना-पीना, हमारा रहन-सहन, ये सब अब मेरे अस्तित्व का भी हिस्सा है। शादी के बाद क्या ये मेरे साथ नहीं जायेगा? क्या मैं किसी और के घर जाकर उनके रहन-सहन, उनके खान-पान को अपना पाउंगी? कभी-कभी तो सोचती हूं कि क्यों लड़कियों को ही ये बदलाव करने पड़ते है? यही सब सोच रही थी कि पापा ने आकर सर पर प्यार से हाथ फेरा।

hello diary episode  INSIDE

"आरती बच्चा, यहां बैठी क्या सोच रही है?"

"पापा...जब शीतल की शादी हो रही थी ना.."

"कौन, तेरी बचपन की साथी, शीतल शर्मा?"

"शर्मा नहीं, अब वो शीतल अहलूवालिया है"

"मिसेज शीतल अहलूवालिया..." पापा मुस्कुरा कर बोले।

"हां पापा, हम जब उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे ना, तो शीतल अपने बचपन का सारा सामान, गुड़िया, किताबें, पुरानी तस्‍वीरें, ऐसे बंद करके रख रही थी मानो उसकी शादी नहीं हो वो मरने जा रही हो।"

"हैं? आरती तू भी ना, क्या-क्या सोचती है" पापा हंस पड़े।

"अरे पापा, समझो ना...ये क्या मतलब है, कि लड़की की शादी हो तो वो अपना सारा बचपन, सारी यादें, सारी परवरिश, मां-बाप - सब छोड़कर चल पड़े और लड़का मज़े से अपने घर में बैठा रहे। लड़की जाकर अपने लिए वहां जगह बनाये। लड़का तो अपने मम्मी-पापा के साथ कम्फर्टेबली रहे, लेकिन लड़की एकदम से कैसे उनके साथ कम्फर्टेबल होगी, ये कोई नहीं सोचता। अब देखो पापा, यहां मैं आपके साथ कितने आराम से बैठी हूं, जैसे चाहे बोल-बैठ और पहन रही हूं। मैं ऐसे ही बड़ी हुई हूं। लेकिन शादी के बाद अगर मैं ऐसे ना रह पाई तो क्या मैं खुश रहूंगी?"

इसे जरूर पढ़ें: रिश्ते के लिए देखने आया था या डेटिंग के लिए? अब आप बताइये में क्या करूं? : Hello Diary

"ये सब ज़हर उस सुरभि का भरा हुआ है" दादी ने चीख कर कहा। कब दादी कमरे में आ गई थी और कब उन्होंने सारी बातें सुन ली, मुझे नहीं पता, पर ये पता था कि अब तांडव शुरू होने वाला था।

"अब बहु कहां से आ गई इसमें?" पापा ने दादी को शांत करते हुए कहां।

"मेरी कोई बहु-वहु नहीं है वो डायन! घर तोड़ने वाली नहीं होती बहु, जोड़ने वाली होती है। इतने सालों से मैंने तो अपना सारा परिवार जोड़ कर रखा था, किसे पता था मेरे घर में ही ऐसी कुलक्षणी आएगी" दादी का पारा तो बढ़ता ही जा रहा था। अगर आपसे आरती की कहानी की दूसरा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें।  रिश्ते के लिए देखने आया था या डेटिंग के लिए? अब आप बताइये में क्या करूं? : Hello Diary

"ए लड़की सुन, ये बेकार की बातें ना करियो। ऐसे ही तेरी भाभी के लक्षण देखकर तुझे भी लोग घर तोड़ने वाली समझेंगे, उसपर तो ये बेकार की बातें ना करना। विदाई होती है, ये लड़की का भाग्य है, उसे दूसरे घर जाना ही होता है...इसे तो नहीं बदल सकती।" दादी ने मुंह फेर लिया था। 

"दूसरे घर या दूसरों के घर? "मैंने हिम्मत करके कहा।

"आरती! मुझसे ज़ुबान ना लड़ा"

"दादी, घर पर साथ रहें और रोज़ एक दूसरे से लड़ते रहें, इसे तो अच्छा है कि दूर रहकर प्यार का रिश्ता रहे, भाभी आप सब से बहुत प्यार करती है, पर वो अपने ढंग से अपनी ज़िन्दगी जीना चाहती है, अपनी पसंद का खाना-पहनना चाहती है- उसमें क्या बुराई है?" क्या मुझे अब भी उम्मीद थी कि मैं दादी को अपनी बात समझा पाउंगी?

"हमने रोका था उसे खाने पहने से? बात ये थी कि उसे हम खटक रहे थे। दादी सास के सामने पैर पसार के नहीं बैठ सकते ना...तो दिक्कत तो होगी ही। घर पर दोस्तों की पार्टी नहीं हो पा रही थी ना, इसलिए दिक्कत थी। छुट्टी के दिन 12 बजे तक बिस्तर से नहीं उठती थी वो नालायक!..."

"तो संडे को तो मैं भी देर तक सोती हूं, ऋषभ भैय्या भी तो देर से उठता था...पर आपको भाभी का देर से उठना ही खटकता था। दोस्तों की पार्टी में दोस्त तो सब भैय्या के ही होते ना? और अगर पूरा दिन ऑफिस में काम करके भाभी ने ज़रा पैर पसार भी लिए तो क्या हुआ? अगर ये उनका घर भी था तो ये उनका हक़ था ना दादी?"

इसे जरूर पढ़ें: स्वाभिमान या पैसा- क्या चुनना चाहिए एक लड़की को शादी के लिए: Hello Diary

दादी को सुरभि भाभी की एक भी बात ऐसी याद नहीं होगी, जो उन्हें पसंद हो पर मुझे तो याद है ना..."दादी, आप को ये नहीं दिखा कि जब पापा को पैसे की तंगी थी तो भाभी ने अपना फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़ा? जब मम्मी को जॉन्डिस हो गया था तो भाभी ने उनका कितना ख्‍याल रखा। दादी, भाभी कैसे हर त्योहार में भाभी घर में रौनक ले आती है, उनकी रंगोली, उनके पकवान, उनका प्यार...आप कैसे भूल सकते हो दादी?" अगर आपसे आरती की कहानी की तीसरा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। स्वाभिमान या पैसा- क्या चुनना चाहिए एक लड़की को शादी के लिए: Hello Diary

hello diary episode  INSIDE

दादी बिना कुछ कहे कमरे से जाने लगीं, लगता है मेरी बात में दम था, "दादी तुम ..." पर पापा ने मुझे रोक दिया।

"बस आरती.. बस"

"पापा आपको ये बात गलत नहीं लगती?"

"मुझे तो बस इतना पता है कि आरती तुझ अकेली से ये सिस्टम नहीं बदलेगा। मैं तो यही चाहूंगा कि तू अपने मन की करें, सुरभि के लिए भी मेरा यही कहना था। मुझे आज भी उसपर नाज़ है, ऋषभ से भी ज़्यादा। अरे डॉक्टर है वो, सर्जन, अगर दिन की तीन सर्जरी के बाद भी उससे घर आके रोटी बेलनी पड़े तो क्या फायदा? उसने कुछ गलत नहीं किया, मैं जानता हूं। अपनी ज़िन्दगी जीना का सब को हक़ है। वो और ऋषभ खुश है, मुझे और क्या चाहिए।"

"पापा, भाभी प्रेग्नेंट है.." मैंने धीरे से कहा

"क्या...? अरे ये अब बता रही है...ओह माय गॉड!" पापा ने मुझे गले लगा लिया।

"श... पापा आराम से...दादी गुस्सा हो जाएगी"

"तुझे कब पता चला?" पापा की मुस्कराहट तो काम ही नहीं हो रही थी।

इसे जरूर पढ़ें: क्या शादी में पुरानी, रूढ़िवादी सोच बदलने का टाइम आ गया है? - Hello Diary

"कल बात हुई थी भाभी से, ऋषभ कल आएगा घर...पर वो समझ नहीं पा रहा है कि दादी और मम्मी खबर सुनकर खुश होंगे या गुस्सा"

"पागल है क्या ऋषभ! बोल उसको तुरंत आये"

"वैसे पापा, हमें नहीं जाना चाहिए उधर? भाभी को देखने?" मैंने मनाने के ढंग से पापा का हाथ पकड़कर बोला।

 "इस वक्‍त क्यों कलेश करवा रही है आरती?" मेरे पापा आज भी अपनी मां से डरते हैं! अगर आपसे आरती की कहानी की चौथा एपिसोड मिस हो गया हैं तो इस लिंक को क्लिक करके पढ़ें। क्या शादी में पुरानी, रूढ़िवादी सोच बदलने का टाइम आ गया है? - Hello Diary

"मैं तो जाना चाहती हूं पापा"

"अपने बारे में मत सोच अभी आरती, तेरे जाने से बड़ा कलेश हो सकता है, उसका असर सुरभि पर भी पड़ेगा। मेरी मान, मत जा।"

अब पापा की मानूं या अपने मन की? आप ही बताइये। भाभी से मिलने जाना चाहिए या नहीं? मेरी नज़र में उन्‍होंने कुछ गलत नहीं किया, लेकिन अगर मैं अभी नही गई तो दादी और मम्मी के साथ मैं भी भाभी के साथ गलत करुंगी। और चली गई तो दादी और मम्मी की दुश्मन बन जाउंगी। आप बताइये ना मैं क्या करूं? इस लिंक पर क्लिक करके अपनी राय मेरे साथ शेयर करें। 

https://business.facebook.com/HerZindagi/posts/3087105931361394?__tn__=-R