हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। हर महीने में दो एकादशी तिथियां होती हैं एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस तरह पूरे साल में 24 एकादशी तिथियां होती हैं और उन सब का अलग ही महत्त्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी तिथि मुख्य रूप से विष्णु जी के पूजन के लिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। 

कहा जाता है कि एकादशी व्रत करने और इस दिन विष्णु पूजन करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलने के साथ सभी कष्टों का भी निवारण होता है। ऐसी ही एकादशी तिथियों में से एक है ज्येष्ठ के महीने में पड़ने वाली अपरा एकादशी तिथि। इस एकादशी का अपना अलग महत्त्व है। आइए नई दिल्ली के जाने माने पंडित, एस्ट्रोलॉजी, कर्मकांड,पितृदोष और वास्तु विशेषज्ञ प्रशांत मिश्रा जी से जानें जून के महीने में कब पड़ रही है अपरा एकादशी और इसका क्या महत्त्व है। 

कब है अपरा एकादशी

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जून के महीने में अपरा एकादशी 6 जून 2021 को पड़ रही है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल, हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अपरा एकादशी या अचला एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी व्रत से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 

अपरा एकादशी का शुभ मुहूर्त 

  • अपरा एकादशी तिथि प्रारंभ- 05 जून 2021 को 04 बजकर 07 मिनट
  • अपरा एकादशी तिथि समाप्त 06 जून 2021 की सुबह 06 बजकर 19 मिनट पर
  • अपरा एकादशी व्रत पारण मुहूर्त 07 जून 2021 की सुबह 05 बजकर 12 से सुबह 07 बजकर 59 मिनट तक
  • उदया तिथि में 6 जून को एकादशी तिथि प्राप्त हो रही है इसलिए इसी दिन एकादशी का व्रत रखना लाभकारी होगा। 

व्रत कथा

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अपरा एकादशी की कथा के अनुसार महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती थी। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना। ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और पूरे श्रद्धा भाव से भगवान् विष्णु का माता लक्ष्मी समेत पूजन किया और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया। तब से ये एकादशी विशेष महत्त्व रखती है। 

कैसे करें पूजन 

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  • अपरा एकादशी के दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्‍नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 
  • विष्णु जी की तस्वीर चौकी पर स्थापित करें और उस पर तिलक लगाएं। 
  • भगवान विष्‍णु को पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। 
  • विष्णु जी की किसी भी पूजा में तुलसी दल जरूर अर्पित करना चाहिए क्योंकि तुलसी को विष्णु प्रिया कहा जाता है। 
  • धूप-दीप से विष्‍णु जी की आरती करें और नैवद्य अर्पित करें। 
  • शाम के समय विष्णु जी की आरती उतारने के बाद फलाहार ग्रहण करें। 

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अपरा एकादशी का महत्व

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धार्मिक मान्यता के अनुसार, अपरा एकादशी अपार पुण्य फल प्रदान करने वाली पावन तिथि है। इस तिथि के दिन व्रत करने से व्यक्ति को उन सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है, जिसके लिए उसे प्रेत योनि में जाना पड़ सकता है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी के व्रत से व्यक्ति को वर्तमान जीवन में चली आ रही आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है। अगले जन्म में व्यक्ति धनवान कुल में जन्म लेता है और अपार धन का उपभोग करता है। शास्त्रों में बताया गया है कि परनिंदा, झूठ, ठगी, छल ऐसे पाप हैं, जिनके कारण व्यक्ति को नर्क में जाना पड़ता है। इस एकादशी के व्रत से इन पापों के प्रभाव में कमी आती है और व्यक्ति नर्क की यातना भोगने से बच जाता है।

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