हिन्दू धर्म के अनुसार प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि में होता है। यह व्रत पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित होता है। मान्यता है, कि जो भी व्यक्ति पूरे श्रद्धा भाव से प्रदोष व्रत करता है और कथा पढ़ता या सुनता है उसे सफलता अवश्य ही मिलती है। यह पावन व्रत प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ता है। इस बार प्रदोष व्रत अक्टूबर माह की 28 तारीख को पड़ने जा रहा है। 28 अक्टूबर , यानी कि बुधवार को शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाएगा। बुधवार के दिन पड़ने के कारण यह बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। आइए जानें प्रदोष व्रत की महिमा, सम्पूर्ण कथा और व्रत से मिलने वाले लाभों के बारे में। 

कब हुई इसकी शुरुआत 

हिन्दू धर्म की मान्यतानुसार प्रदोष व्रत को सबसे पहले चंद्रदेव ने किया था, जिसके शुभ प्रभाव से चंद्रमा का क्षय रोग खत्म हो गया था। त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाने वाला प्रदोष व्रत सौ गायों के दान के बराबर पुण्य प्रदान करता है। प्रदोष-व्रत को किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ किया जा सकता है लेकिन यदि कोई विशेष कामना रखती हैं तो इसे किसी विशेष दिन ही प्रारम्भ किया जाता है। 

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प्रदोष व्रत की कथा 

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प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी था । उस पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पुत्र को साथ लेकर भीख मांगने लगी। वो भीख मांगती थी और शाम को वापस आती थी। एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था। उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नहीं गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र की तरह पालने लगी। एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई। वहां उसने ऋषि से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी। एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे। उनमें से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परंतु राजकुमार वन में ही रह गया। उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करने लगा। उस कन्या का नाम अंशुमती था। उस दिन वह राजकुमार घर देरी से लौटा। राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी। तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा कि आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो ना, आपका नाम धर्मगुप्त है।अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिवजी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते हैं राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे दी तो उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ। पुजारी की पत्नी तथा पुत्र के सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे। तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात बताई और साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त फल से भी अवगत कराया। उसी दिन से प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे। 

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पूर्ण होती हैं सभी मनोकामनाएं  

पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रदोष व्रत करने वाले व्यक्ति पर सदैव भगवान शिव की कृपा बनी रहती है और उसके सभी कष्टों का निवारण होता है। प्रदोष व्रत में शिव संग शक्ति यानी माता पार्वती की पूजा की जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सुख सौभाग्य की कामना रखने वाले व्यक्तियों के लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी होता है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाली स्त्रियों को यह व्रत अवश्य रखना चाहिए। इस व्रत को करने से पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है। 

कैसे करें पूजन 

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प्रदोष व्रत वाले दिन प्रदोष काल में स्नान-ध्यान करके भगवान शिव की बेल पत्र, पुष्पों, धतूरे के फल, आदि से पूजा करनी चाहिए। शिव जी संग माता पार्वती की पूजा करने से पूजा का दोगुना फल मिलता है। इसलिए शिव चालीसा का पाठ करें, माता पार्वती को सिन्दूर लगाएं व शिव जी को चन्दन से सुसज्जित करें। दीप प्रज्ज्वलित करके शिव जी की आरती करें व पूजन करें। शिव पार्वती की श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना करके प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें और कथा सुनाएं। जहां तक संभव हो सफ़ेद वस्त्र धारण करके शिव जी की आराधना करें एवं भोग लगाएं। उसी भोग को प्रसाद स्वरुप ग्रहण करें और सभी को खिलाएं। 

क्या है पंडित जी की राय 

प्रदोष व्रत के बारे में हमने अयोध्या के जाने माने पंडित श्री राधे श्याम शास्त्री जी से बात की। उन्होंने हमें बताया कि प्रदोष व्रत मुख्य रूप से मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। पुत्र प्राप्ति की कामना ,धन प्राप्ति की इच्छा ,किसी रुके हुए कार्य को पूरा करने की चाह और नौकरी में सफलता प्राप्त करने की इच्छा रखने वालों के लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी होता है। इस व्रत में शिव जी का पूजन, प्रदोष काल में यानी कि संध्या काल और रात्रि से पूर्व के समय में करने से हर इच्छा पूर्ण होती है। 

इस प्रकार प्रदोष व्रत में शिव जी का पूजन अर्चन श्रद्धा भाव से करने से निश्चित ही सफलता मिलती है। 

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