'मेडिकल डॉक्‍टर, सिंगर, पैशेनेट कुक, साड़ी की शौकीन और अब सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर ' आप सोच रहे होंगे कि इतनी सारी खूबियां एक साथ किसी व्‍यक्ति में कैसे हो सकती हैं। मगर, जब आप डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ का इंस्‍टाग्राम अकाउंट देखेंगे तो आपको उनकी बायो में यह सारी बातें लिखी नजर आएंगी। देखा जाए तो जो बातें डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ ने अपने इंस्‍टाग्राम अकाउंट के बायो में लिखी हैं, वास्‍तविक जीवन में वैसी ही हैं। 

हम बात कर रहे हैं, डॉक्‍टर पद्मावति दुआ जिन्‍हें प्‍यार से लोग चिन्‍ना दुआ पुकारते हैं। डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ में कई खूबियां हैं।  उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक अच्‍छी होम मेकर, वाइफ और मां बनने के चक्‍कर में उन्‍होंने अपने शौक और इच्‍छाओं का गला नहीं घोटा । डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ जहां एक तरफ रेडियोलॉजिस्‍ट हैं वही दूसरी तरफ वह फैशनीस्‍ता, सिंगर और एक बेहतरीन कुक भी हैं। यह सभी काम वह शौक से करती हैं। अगर आप एक नजर उनके इंस्‍टाग्राम अकाउंट पर डालेंगे तो आपको उनके क्रिएटिव होने की झलक नजर आएगी। डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ को जितना शौक डिफ्रेंट लुक और स्‍टाइल की साड़ी पहनने का है उतना ही शौक रोज बिंदियों को कस्‍टमाइज करके माथे पर सजाने का भी है। डॉक्‍टर चिन्‍ना दुओ दिखने में जितनी जिंदादिल नजर आती हैं उनकी बातें उतनी ही थॉटफुल और प्रेरणादायक लगती हैं। अंतराष्‍ट्रीय महिला दिवस 2020 के मौके पर हमने डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ से खास बातचीत की। हमने उनसे जेंडर एक्‍वालिटी, भारत में महिलाओं की बदलती दशा और कई बातों पर चार्चा की। 

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020 की थीम पर बात करें तो इस वर्ष 'Each For Equal' को इस खास दिवस की थीम चुना गया है। इस थीम के बारे में डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ का क्‍या ख्‍याल ? इस पर उन्‍होंने कहा, 'भारत में जेंडर इक्वलिटी पर लंबे समय से बात चल रही है। दुर्भाग्‍य की बात यह है कि यहां पर पढ़े लिखे लोग भी समझदार नहीं हैं। जब हम बात इक्‍वालिटी की बात करते हैं तो महिला और पुरुष दोनों को ही पढ़ा लिखा होना चाहिए। पढ़ाई लिखाई से मेरा तात्‍पर्य केवल किताबी ज्ञान से नहीं हैं बल्कि व्‍यवहारिक ज्ञान से भी है। पुरुषों को सीखा चाहिए कि उन्‍हें महिलाओं के साथ कैसे पेश आना है और उनकी कैसे रिस्‍पेक्‍ट करनी वहीं महिलाओं को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि उन्‍हें अपने हक और अधिकार के लिए कैसे आगे बढ़कर बात करनी है। देखा जाए तो बदलाव की शुरुआत हो चुकी है मगर, अभी भी बहुत गुंजाईश बाकी है। हमें इस बदलाव के लिए और कोशिशें करनी होंगी। हमारी नई जनरेशन इस बदलाव को अपना लिया है। अब पति-पत्‍नी मिल बांट कर घर के काम करते हैं। बच्‍चे को पालने की जिम्‍मेदारी भी दोनों बराबर से उठाते हैं। वही पुराने समय की बात करने तो ऐसा पहले नही होता था। महिलाओं को केवल एक मेड समझा जाता था।' Women Inspiration: मंजरी चतुर्वेदी ने अपने सूफी कथक से निर्गुण भक्ति को दिया नया आयाम

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डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ की मानें तो अभी भी सुधार बाकी है। लोगों को काउंसलिंग की जरूरत है। खासतौर पर उन परिवार के लोगों को जहां आज भी पति अपनी पत्‍नी को अच्‍छे ट्रीट नहीं करते। ऐसे परिवारों के बच्‍चों पर भी अच्‍छा प्रभाव नहीं पड़ा। डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ कहती हैं, 'बेटा पिता को मां के साथ गलत व्‍यवहार करते देखेगा और मां को उसे सेहते देखेगा तो वह भी बड़ा होकर अपनी वाइफ के साथ ऐसा ही करेगा। इसलिए आपकी अगली जनरेशन की सोच बदलने के लिए पहले खुद को बदलना होगा। ' डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ ने आगे कहा, ' आजकल लोगों को प्रभावित करने के लिए कई माध्‍यम है। सोशल मीडिया इसमें सबसे ज्‍यादा मददगार है। गांव देहात में भी आजकल लोगों के पास मोबाइल होता है। इसमें वह वीडियो देख सकते हैं और मैसेजेस पढ़ सकते हैं। यदि यह इंस्‍पीरेशनल हों तो इससे उनकी सोच बदली जा सकती है। ' मिलिए उन महिला अफसरों से, जिन्होंने देश में नया कीर्तिमान स्थापित किया

 

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 भारत  हर दिन विकास की राह में एक पग आगे बढ़ रहा है। मगर, आज भी बहुत सारी महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में नहीं  पता है। इस बात से सहमत डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ कहती हैं, 'महिलाओं को अपने अधिकारों को जानना होगा। सुधा तभी होगा। जिस इक्वलिटी  की हम बात करते हैं वह तब ही आएगी। जब महिलाएं सशक्‍त हो जाएंगी तो वह खुद ही पुरुषों के जुल्‍म को नहीं सहेंगी।' वह आगे कहती हैं, 'बदलाव धीरे से ही होगा। महिलाओं की स्थिति काफी हद तक देश में सुधरी है और इसी तरह कोशिशें करने पर यह स्थिति और सुधर जाएगी। ' टीवी एक्ट्रेस इशिता गांगुली कहती हैं- 'कभी हिम्मत मत हारिए और मंजिल की तरफ कदम बढ़ाइए'

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भारत में आज भी बहुत सारी महिलाएं है जो अपनी पहचान बनाने के लिए हर दिन समाज से जंग लड़ रही हैं। इस पर डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ कहती हैं, 'मेरी मां जब 13 वर्ष की थीं तब उनकी शादी हो गई थी। वह एक गांव में पली बढ़ी थीं। वह पढ़ना चाहती थीं। मगर उस समय लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था बल्कि उनकी जल्‍दी शादी हो जाती थी। मगर उन्‍होंने अपनी बेटियों की शादी तब तक नहीं होने दी जब तक उनकी पढ़ाई नहीं पूरी हो गई। हम 5 बहने और 2 भाई थे और सबके साथ एक जैसा ही बरताव किया जात था। महिलाओं के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह अपने पैरों पर खड़ी हों और खुद की पहचान बनाएं। '

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को है। इस अवसर पर किसी भी महिला के लिए डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ का यह इंटरव्‍यू बेहद इंस्‍पायरिंग साबित हो सकता है। आखिरी में डॉक्‍टर चिन्‍ना दुआ कहती हैं, 'कई बार आपने सुना होगा कि एक महिला ही महिला को नीचे झुकाती है। हमें इस बात को अब गलत साबित करना है। बदलाव तब ही आएगा। ' महिला अधिकारियों के लिए खुशखबरी, सेना में अब मिलेगा स्थायी कमीशन