गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए सभी अक्सर पहाड़ों का रुख करते हैं। हरे-भरे पहाड़ और प्रकृति से घिरी वादियां मन को शांति प्रदान करती है। भारत के हिल स्टेशन पहुंचने के लिए आपको ट्रेन की जर्नी करनी पड़ती हैं। कहा जाता है कि ब्रिटिशर्स भी छुट्टियां बिताने के लिए ऐसे ही हिल स्टेशन जाया करते थे। तब उन्होंने वहां पहुंचने के लिए रेलवे रूट्स बनाएं। वे आज भी मौजूद हैं और आपको एक बेहद खूबसूरत अनुभव प्रदान करते हैं। अगर आप भी कालका या दार्जिलिंग जैसी जगहों की खूबसूरती से रूबरू होना चाहें, तो उनके बेहतरीन रेलवे रूट्स को चुनें। हम आपको ऐसे ही पांच अद्भुत पर्वतीय रेल मार्ग के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका आप आनंद ले सकते हैं।

कांगड़ा वैली रेलवे

kangra valley railway

कांगड़ा घाटी रेलवे हिमाचल प्रदेश में पाई जाती है। इसे 1 अप्रैल, 1929 को यातायात के लिए खोल दिया गया था। यह लाइन पठानकोट से शुरू होती है और जोगिंदर नगर पर समाप्त होती है, जो 9 घंटे 20 मिनट के लिए 164 किमी की दूरी तय करती है। इस खंड पर केवल दो सुरंगें हैं, जो पर्यटकों को बिना किसी व्याकुलता के पहाड़ों और घाटियों का आनंद लेने का अवसर देती हैं। अपने 993 पुलों के लिए मशहूर यह रेलवे लाइन राज्य को अपने हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर हाउस से जोड़ती है।

कालका-शिमला रेलवे

kalka shimla railway

कालका-शिमला रेलवे मैदानी इलाकों के निवासियों को ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी से जोड़ता है। इस रेलवे लाइन को 9 नवंबर, 1903 को यातायात के लिए खोल दिया गया था। इस मार्ग पर 101 सुरंगें रेलवे लाइन हैं। छह घंटे लंबी, 96 किमी की यात्रा करते हुए जब आप नैरो गॉज से चलते हैं तो कई धनुषाकार पुल और कई सुरम्य स्टेशनों को देख सकते हैं। इस मार्ग पर यात्रा करना शिमला जाने का सबसे किफायती तरीका है। 7 जुलाई 2008 को कालका-शिमला रेलवे को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया था।

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे

darjeeling himalayan railway

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का उद्घाटन 1881 में हुआ था। यह 'टॉय ट्रेन' पश्चिम बंगाल में न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक साढ़े सात घंटे में 88 किमी की दूरी तय करती है। रेलवे स्टेशन वास्तव में छोटे हैं। टॉय ट्रेन की निर्मिति हिल कार्ट रोड के निर्माण से जुड़ी हुई है, जिसे वर्ष 1839 में रॉयल इंजीनियर्स के लेफ्टिनेंट नेपियर के तहत शुरू किया गया था, जिन्हें दार्जिलिंग शहर के निर्माण के लिए प्रतिनियुक्त किया गया था। इस रेलवे का मुख्यालय कुर्सियांग शहर में है। इस रेलवे को यूनेस्को से विश्व का दर्जा मिला है।

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नीलगिरी माउंटेन रेलवे

nilgiri mountain railway

मेट्टुपालयम से कुन्नूर तक नीलगिरि पर्वतीय रेलवे का पहला खंड जून 1899 में यातायात के लिए खोला गया था और 1908 में ऊटी तक बढ़ा दिया गया था। इस मीटर गेज लाइन की मुख्य विशेषताएं अद्वितीय रैक रेल प्रणाली (कल्लर से कुन्नूर के बीच) हैं। यह मेट्टुपालयम से ऊटी तक 46 किमी की दूरी साढ़े चार घंटे में तय करती है। 15 जुलाई 2005 को, यूनेस्को ने नीलगिरि माउंटेन रेलवे को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी थी। ट्रेन की सवारी एक रोमांच है क्योंकि यह कई सुरंगों, पुलों को पार करते हुए, जंगलों और चाय के बागानों के बीच से गुजरती है।

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माथेरान लाइट रेलवे

matheran light railway

माथेरान लाइट रेलवे, जो नेरल को माथेरान से जोड़ता है, मार्च 1907 में यातायात के लिए खोला गया था। माथेरान का अर्थ है 'जंगल का सिर' या 'जंगल का शीर्ष'। 1850 में खोजे गए इस शांतिपूर्ण हिल स्टेशन तक पहुंचने का एकमात्र साधन एक छोटी ट्रेन है। किसी भी भारतीय पहाड़ी रेलवे लाइन की तुलना में यह नैरो गेज लाइन सबसे तेज मोड़ लेती है। यात्रा के साथ का दृश्य वास्तव में लुभावनी है, और 21 किमी की सवारी दो घंटे में पूरी होती है।

भारत के सभी पांच पर्वतीय रेलमार्ग लगभग सौ वर्ष पुराने हैं। वे अभी भी बहुत अच्छी तरह से मेंटेन किए गए हैं। अगली बार प्रकृति के बीच शहर के शोर-शराबे से दूर खूबसूरत वादियां देखने के लिए इन माउंटेन रेलवे का सफर जरूर करें। उम्मीद है आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा। ट्रैवल से जुड़े ऐसे आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।

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