4 नवम्बर को गुरुपुरब है, कार्तिक पूर्णिमा को सिख घर्म के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव का प्रकाश उत्सव मनाया जाता है। सिख धर्म के प्रवर्तक श्री गुरु नानक देव का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को तलवंडी नामक जगह पर हुआ था। वर्तमान में यह जगह पाकिस्तान में है। उनके जन्म के बाद ही तलवंडी का नाम ननकाना पड़ा।

क्या आप जानते हैं उन गुरुद्वारों के बारे में जिनसे श्री गुरु नानक देव का इतिहास जुड़ा हुआ है। चलिए हम आपको बताते हैं उन गुरुद्वारों के बारे में जिनसे जुड़ा है श्री गुरु नानक देव का इतिहास। इंडिया से लेकर पाकिस्तान में भी कई ऐसे गुरुद्वारे हैं जहां श्री गुरु नानक देव ने अपने कदम रखे थे। गुरुद्वारा ननकाना साहिब सिख धर्म का एक प्रमुख गुरुद्वारा है। इसका निर्माण महाराजा रणजीत सिंह द्वारा गुरु नानक देव के जन्म स्थान को चिह्नित करने के लिए बनावाया था।

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गुरुद्वारा ननकाना साहिब (ननकाना, पाकिस्तान)

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गुरुपुरब वाले दिन बड़ी सख्या में लोग इस गुरुद्वारे में आते हैं। इस दिन भारत ही नहीं यूरोप से लेकर दुबई तक लोग ननकाना साहिब गुरुद्वारे पहुंचते हैं। गुरुद्वारा ननकाना साहिब सिख धर्म का एक प्रमुख गुरुद्वारा है। इसका निर्माण महाराजा रणजीत सिंह द्वारा गुरु नानक देव के जन्म स्थान को चिह्नित करने के लिए बनावाया था।

 

गुरुद्वारा बेर साहिब (पंजाब, इंडिया)

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गुरुद्वारा बेर साहिब कपूरथला के सुल्तानपुर शहर में स्थित है। इस जगह से ही सिख गुरु के तौर पर श्री गुरु नानक देव की यात्रा की शुरुआत हुई थी। सिख घर्म के इतिहास के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि श्री गुरु नानक देव जब काली बेन नदी में स्नान के लिए गए तो उन्हें नदी में एक प्रकाश दिखा। वे उस प्रकाश के साथ गायब हो गए और 3 दिन बाद सिख गुरु बनकर लौटे।

श्री गुरु नानक देव यहां लगभग 15 साल रहे थे। उन्होंने यहां एक बेर का पेड़ लगाया था जो टूरिस्टों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब (मनाली, इंडिया)

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गुरुद्वारा मणिकरण मनाली में पार्वती पर्वत पर स्थित है। जमीन से इसकी ऊंचाई लगभग 1760 मीटर है। श्री गुरु नानक देव सन 1574 में अपने पांच अनुयायिओं सहित यहां आए थे। यह गुरुद्वारा ना सिर्फ धार्मिक कारणों से फेमस है बल्कि यहां की खूबसूरती भी देखते ही बनती है। इस गुरुद्वारे में एक साथ 4000 भक्त रुक सकते हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्री गुरु नानक देव को यहां गर्म पानी का एक झरना मिला था जिसमें उन्होंने बिना पके खाने को गायब कर दिया था और वह खाना पक कर दोबारा प्रकट हुआ था। यह वाक्या भाई मदार्न की आत्मकथा में भी दर्ज है।

गुरुद्वारा पंजा साहिब (हसन अब्दाल, पाकिस्तान)

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गुरुद्वारा पंजा साहिब सिखों का तीसरा सबसे पवित्र धार्मिक स्थल माना जाता है। यहां तीन दिन चलने वाले बैसाखी मेले के लिए पाकिस्तान के अलावा इंडिया और यूरोप से भी सिख पहुंचते हैं।  श्री गुरु नानक देव जब भाई मरदाना के साथ हसन अब्दाल शहर पहुंचे थे तो वहां अच्छा मौसम और वातावरण देख दोनों कीर्तन करने लगे। पास ही एक पहाड़ी पर मीठे पानी के झरने के किनारे वली कंधारी नामक फकीर का डेरा था। भाई मरदाना को प्यास लगी तो श्री गुरु नानक देव ने उसे कंधारी के पास भेजा, लेकिन कंधारी ने उसे पानी पिलाने से इनकार कर दिया। भाई मरदाना की प्यास बुझाने के लिए गुरु नानक देव जी ने पास ही पड़े एक बड़े पत्थर को हटाया तो उसके नीचे से मीठे पानी का झरना फूट पड़ा। श्री गुरु नानक देव ने पत्थर को हाथों से रोक दिया। पत्थर वहीं के वहीं थम गया और श्री गुरुनानक देव के पंजे के निशान उस पत्थर पर गड़ गए। इसी जगह पर बाद में पंजा साहिब गुरुद्वारे का निर्माण किया गया।

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गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब (असम, इंडिया)

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ब्रह्मपुत्र नदी के पास असम के ढुबरी शहर में यह गुरुद्वारा स्थित है। श्री गुरु नानक देव 1505 ईसवी में ढाका से असम की तरफ आते हुए ढुबरी आए थे। श्री गुरु नानक देव के बाद 9वीं शताब्दी में श्री गुरु तेग बहादुर सिंह भी यहां आए थे। इस गुरुद्वारे में आयताकार बरामदे में गुरु ग्रंथ साहिब की तीन प्रतियां रखी गई हैं।

गुरुद्वारा मजनू का टीला (दिल्ली, इंडिया)

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गुरुद्वारा मजनू का टीला साहिब दिल्ली में बाहरी रिंग रोड पर स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि सुल्तान सिकंदर शाह लोदी के शासनकाल (1489-1517) के दौरान यहां एक मुस्लिम सूफी यहां रहा करते थे जिसका नाम अब्दुल्ला था। वह अपने नाव से लोगों को बिना किसी पैसे के यमुना नदी पार कराते थे। वह भगवान की झलक पाना चाहते थे, इसी विचारों में वो इतना खो गए थे कि लोगों ने उन्हें ‘मजनू’ कहना शुरू कर दिया था। जब श्री गुरु नानक देव ने इस जगह का दौरा किया तो उनको गुरु नानक देव से आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई और एक महान गुरु के शिष्य बन गए थे। सिख सैन्य नेता बद्येल सिंह 1783 में यहां रुके और मजनू का टीला को एक गुरुद्वारा बनाया गया। 

बाद में सिख घर्म के छठे गुरु श्री गुरु हर गोबिंद भी यहां रुके थे जब उन्हे सम्राट जहांगीर ने बुलाया था। फिर महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी जागीर से होने वाली आय को इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे के रखरखाव मे खर्च किया था। 1950 में दिल्ली संगत ने इस गुरुद्वारा को एक बड़ा गुरुद्वारा बनवाया था।

गुरुद्वारा पत्थर साहिब (जम्मू-कश्मीर, इंडिया)

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जम्मू-कश्मीर में स्थित इस गुरुद्वारे में हर साल हजारों श्रद्धालु आते हैं।  श्री गुरु नानक देव 1517 में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद नेपाल, सिक्किम, तिब्बत होते हुए जम्मू-कश्मीर पहुंचे थे। ऐसा कहा जाता है कि जब श्री गुरु नानक देव ईश्वर की भक्ति में लीन थे तब एक राक्षस ने पहाड़ से उन पर एक बड़ा पत्थर गिराया था, लेकिन श्री गुरु नानक देव से स्पर्श होते ही पत्थर मोम में तब्दील हो गया और उनके शरीर का पिछला हिस्सा पत्थर में धंस गया। पत्थर में धंसा श्री गुरु नानक देव के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद है।

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