दिवाली की छुट्टी पहले से तय नहीं थी और मुझे बॉस ने कुछ दिन पहले सर्प्राइज दिया। मेरी छुट्टी की अर्जी मान ली गई थी। अब बारी थी घर जाने की। अपने घर से दूर मेट्रो शहरों में रखकर काम करने वाले मेरे जैसे न जाने कितने लोगों की ये समस्या है कि अगर कभी अचानक छुट्टी मिल गई है तो भी उन्हें तुरंत छुट्टी का इस्तेमाल करने में परेशानी होती है। कारण? वही पुरानी घर जाने के लिए टिकट न मिलने की समस्या। ट्रेन की टिकट के बारे में तो सोचा ही नहीं जा सकता था। तत्काल पर भरोसा करना और भारतीय रेलवे की वेबसाइट के भरोसे रहना तो बिलकुल न। इसके अलावा, प्लेन की टिकट देखें तो बस यही समझिए कि महीने की आधी तनख्वाह सिर्फ आने-जाने की टिकट में ही निकल जाएगा। जो टिकट 2500 रुपए की मिलती थी वो दिवाली के समय 18000 रुपए की मिल रही थी। बस फिर होना क्या था, मैं दिवाली पर घर नहीं जा पाई और त्योहार पर छुट्टी होने के बाद भी मेरा त्योहार सूना ही रह गया। ये हालत सिर्फ प्लेन की नहीं रही। अब तो ट्रेन का किराया भी इसी तरह सर्ज प्राइसिंग पर आधारित हो गया है। 

इसे जरूर पढ़ेंBudget 2019: महिलाओं की सबसे बड़ी चिंता क्या दूर कर पाएंगी निर्मला सीतारमन?

ये तो थी एक समस्या जहां घर जाना था और टिकट के अलावा कोई और खर्च नहीं था। पर यहीं अगर घूमने जाना होता तो होटल का खर्च जो त्योहारों, किसी छुट्टी यहां तक की वीकएंड के समय ही बढ़ जाता है। गर्मियों में दिल्ली से शिमला जाइए जरा। दो दिन के ट्रिप पर होटल वाले 1000 रुपए के कमरे का कम से कम 3000 रुपए लेते हैं। इतने बढ़े हुए किराए के बाद भी वो लोग कुछ फेसिलिटी नहीं देते। यहीं सर्दियों में भी जाना हुआ तो उनसे किसी तरह की कोई उम्मीद न रखें कि कमरे में हीटर देंगे। उसका चार्ज भी अलग ही रखेंगे। इतने से छूटे तो टूरिस्ट प्लेस में खाने-पीने की चीज़ों के दाम ऐसे बढ़ते हैं कि बस। एक मैगी भी 100 रुपए की मिले तो अचंभा नहीं होगा। 

यहां बात हो रही है ट्रैवल और बजट की। बजट 2019 में जहां निर्मला सीतारमन से घरेलू सामान, शिक्षा, मनोरंजन के क्षेत्र में कमी की उम्मीद की जा रही है। वहीं ये भी सच है कि भारत की जीडीपी का 9% हिस्सा होने के बाद भी सस्ते ट्रैवल को लेकर सरकार ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है। कई बार घरेलू महिलाएं और कई मध्यमवर्गीय परिवार तो इसी खर्च के कारण महीनों तक कहीं घूमने जा ही नहीं पाते। ये समस्या बहुत बड़ी है और इसे हल करना बहुत जरूरी है। 

Budget Travel Family

ट्रैवल और टूरिज्म को लेकर सरकार कई उपाय अपना सकती है जो लोगों के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं-

1. मिडिल क्लास के लिए राहत-

इस बार मिडिल क्लास के लोगों के लिए टैक्स में छूट के साथ-साथ ट्रैवल के खर्च में भी छूट मिल सकती है। इसके लिए होटल मालिकों, टूरिज्म कंपनियों के लिए कुछ नियम बनाए जा सकते हैं कि सीजन में भी एक तय लिमिट से ज्यादा खर्च न बढ़े। होटल के कमरे की कीमत भी एक तय लिमिट से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकें और अगर बढ़ाई जा रही हैं तो उसके लिए कुछ और भी सुविधाएं मिलें या कोई एक्स्ट्रा चार्ज न हो। 

2. सर्ज प्राइसिंग को लेकर कड़े नियम-

एयरलाइन कंपनियों और ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच की सर्ज प्राइसिंग यकीनन काफी महंगी साबित होती हैं. कई लोग ऐसा कर सकते हैं कि अंतिम समय में प्लान बनाएं और उन्हें महंगी टिकट के कारण समस्या हो। ये खर्च जेब को बहुत भारी पड़ते हैं। इन्हें लेकर सरकार कोई तय स्कीम ला सकती है। एयरलाइन कंपनियां वैसे भी घाटे में जा रही हैं और अगर एक बार सर्ज प्राइसिंग का सिस्टम खत्म हो जाता है तो हो सकता है उन्हें ज्यादा यात्री मिलें। 

3. महिलाओं के लिए रियायत-

महिलाओं के लिए इस मामले में कुछ छूट दी जा सकती है। इसे लेकर कहा जा सकता है कि महिलाओं को ट्रैवल टिकट में छूट मिले या फिर कोई ऐसा प्रावधान बनाया जाए कि महिलाओं को एक लिमिट तक छूट मिले या उनकी सैलरी के आधार पर छूट मिले तो उनके लिए घूमना आसान हो सकता है। 

इसे जरूर पढ़ें- Budget 2019: मनोरंजन है महंगा, क्या अब होगा सस्ता?

4. टैक्स में छूट-

वैसे तो इस बार मिडिल क्लास के लिए अंतरीम बजट में छूट दी गई है, लेकिन अगर वो छूट नहीं मिलती तो कंपनियों द्वारा मिलने वाले ट्रैवल अलाउंस पर फर्क पड़ सकता है। पिछली बार बजट 2018 में सैलरी में 40,000 रुपये के स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाया गया था जो वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए था। इसमें ट्रांसपोर्ट अलाउंस, मेडिकल रीइंबर्समेंट और अन्य अलाउंस को वापस लेने की भी बात की गई थी। इसके पहले वेतन पाने वाले कर्मचारियों को ट्रैवल अलाउंस पर भी छूट मिलती थी। अब अगर ये कटौती रखी भी गई है तो उसे कम से कम 50000 तो होना चाहिए ताकि लोगों को अच्छी खासी छूट मिल सके।