शादी के बाद महिलाओं की जिंदगी में कई तरह के उतार-चढ़ाव आते हैं। शादी-शुदा जिंदगी में पति-पत्नी के बीच संबंध कैसे रहते हैं, इस पर उनकी आगे की जिंदगी निर्भर रहती है। शादी के बाद एक-दो साल तो आराम से बीत जाते हैं, लेकिन इसके बाद मैरिटल लाइफ में कपल्स को कई तरह के चैलेंजेस का सामना करना पड़ता है। घर-परिवार की चीजों, फाइनेंशियल कंडिशन, पर्सनल प्रॉब्लम्स जैसी किसी भी स्थिति के होने पर संबंधों में तनाव आने की आशंका बनी रहती है। ऐसी अनचाही स्थितियों में अगर पुरुष जिंदगी के प्रति उदासीन हो जाते हैं और अपनी शादीशुदा जिंदगी पर ध्यान नहीं दे पाते तो महिलाओं को अपनी जिंदगी की कमान खुद अपने हाथों में लेने की जरूरत होती है।

आईएएनएस की एक नई स्टडी में यह बात कही गई है कि जब महिलाओं को अपने पति का साथ नहीं मिल पाता तो अपने ज्यादा सहज व्यक्तित्व की वजह से वे अपनी प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन बेहतर तरीके से खोज लेती हैं। इस स्टडी में कहा गया कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में किसी से भी ज्यादा अच्छी तरह से बातचीत कर सकती हैं और किसी से भी ज्यादा से ज्यादा से बातें शेयर कर सकती हैं। जब पत्नी को पति का साथ नहीं मिल पाता तो उन्हें शेयरिंग की जरूरत महसूस होती है। ऐसे में वे ज्यादा कंफर्टेबल तरीके से अपने प्रियजनों से अपने इशुज पर चर्चा करती हैं। इससे न सिर्फ उनके जीवन में नेचुरल नीड्स पूरी होती है, बल्कि उनकी लाइफ में पॉजिटिविटी और एक्साइटमेंट भी बना रहता है, जो उनकी रोजमर्रा की मैरिटल लाइफ से नदारद होता है।

समस्याओं से निपटने में माइंडसेट और एटीड्यूड हैं अहम

happy woman inside

रिलेशनशिप इशुज की एक्सपर्ट और लाइफ कोच डॉ. सलोनी सिंह ने इस बारे में कहा, 'महिलाएं अपने इशुज को साझा करना पसंद करती हैं। महिलाएं अपने घर-परिवार और दोस्तों हर जगह सहज तरीके से बात करती हैं। इससे उनका तनाव कम हो जाता है। आमतौर पर अगर अच्छे दोस्त हों तो इमोशनल जरूरतें पूरी होने से मन खुश रहता है। अगर शादीशुदा जिंदगी में किसी तरह की प्रॉब्लम आए तो पुरुष और महिलाएं, दोनों ही उससे निपटने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन यह उनके माइंडसेट और एटीड्यूड पर निर्भर करता है। पुरुष हो या महिला, अगर वे पॉजिटिव तरीके से सोचते हैं, तो वे स्ट्रेस को बेहतर तरीके से हैंडल कर लेते हैं।'

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कम्यूनिटी सपोर्ट भी जरूरी

डॉ. सलोनी सिंह कहती हैं, 'स्ट्रेस हैंडल करने के मामले में कम्यूनिटी सपोर्ट भी बहुत मायने रखता है। आज के समय में काम और व्यस्तता के चलते पुराने दोस्तों के साथ मिलना मुश्किल हो जाता है। हालांकि इस मामले में महिलाएं काफी हद तक सोशल रहती हैं और रिलेशनशिप को मेंटन करती हैं। इस उनका सपोर्ट सिस्टम बनता है, जो उन्हें किसी भी तरह के तनाव से जूझने में मदद करता है। लेकिन मेट्रो शहरों में इस चीज में कमी देखने को मिल रही है। छोटे शहर और गांवों में स्थितियां कहीं बेहतर हैं।' 

परवरिश का भी पड़ता है असर

पुरुष हों या फिर महिलाएं, अपने स्तर पर वे तनाव को कैसे हैंडल करेंगे, यह काफी हद तक उनकी परवरिश पर निर्भर करता है। अगर बचपन में वे अपने पेरेंट्स को मुश्किलों से फाइट करते हुए देखते हैं और पेरेंट्स से इंस्पायर्ड फील करते हैं, तो वे अपनी लाइफ में आने वाली मुश्किलों को भी आसानी से झेल लेते हैं। हालांकि मुश्किल की घड़ी में पुरुषों की तुलना में महिलाएं मदद मांगने में ज्यादा कंफर्टेबल होती है। पुरुषों को अपनी परेशानियां शेयर करने में ज्यादा मुश्किल होती है, इसीलिए महिलाओं को अपनी प्रॉब्लम्स के लिए सॉल्यूशन जल्दी मिलने की संभावना बढ़ जाती है।