आजकल के कम्पटीशन वाले समय में माता पिता के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात ये होती है कि उनका बच्चा शार्प माइंडेड है या नहीं। ऐसा माना जाता है कि बच्चों की ग्रोइंग स्टेज में वो जो भी सीखते हैं उसे ही पूरे जीवन में अमल करते हैं क्योंकि इस उम्र में बच्चों की सीखने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है। आजकल जब हर एक बच्चा एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी है। ऐसे में जब हम बच्चों को सिर्फ स्कूल में होने वाली पढ़ाई करवाते हैं तो बच्चे आगे बढ़ने की जगह पीछे होने लगते हैं क्योंकि स्कूल की पढ़ाई से अलग भी बहुत सारे स्मार्ट लर्निंग कोर्सेस हैं जो बच्चों का ब्रेन शार्प करते हैं।आइए आपको बताते हैं कुछ ऐसे कोर्सेज के बारे में जो बच्चे को इंटेलीजेंट बनाने के साथ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी भी बनाते हैं। 

कोडिंग क्लासेज 

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आज के डिजिटल जमाने में आप सभी के पास स्मार्ट फ़ोन जरूर होगा। हमें जब भी कोई भी इन्फॉर्मेशन देखनी होती है हम इसमें ही सर्च करते हैं। यही नहीं बहुत सी वेबसाइट्स भी स्मार्ट फ़ोन में ही चलती हैं और कई सारे ऐप इसी फोन में चलते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर ये सॉफ्टवेयर, ये सारे ऐप और ऑनलाइन गेम्स कैसे बनते हैं? ये सारे सॉफ्टवेयर बनते हैं कोडिंग से और इसका लॉजिक एक कोडिंग सीखकर सॉफ्टवेयर बनाने वाला या सॉफ्टवेयर डेवलपर ही समझता है। आजकल के चलन में काफी शुरूआती आयु में ही कोडिंग सीखने का चलन हो गया है। इससे बच्चे का दिमाग भी कंप्यूटर की तरह तेज हो जाता है। 

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कोडिंग को प्रोग्रामिंग के रूप में भी जाना जाता है। कंप्यूटर का सारा काम कोडिंग लैंग्वेज के जरिये ही होता है। कोडिंग के जरिए ही कंप्यूटर को बताया जाता है कि उसे क्या करना है। यानी कंप्यूटर जिस भाषा को समझता है उसे कोडिंग कहा जाता है। अगर आपको कोडिंग लैंग्वेज आती है तो आप बड़ी आसानी से वेबसाइट्स या ऐप बना सकते हैं। इसके अलावा भी कई सारी चीजें कोडिंग लैंग्वेज से की जा सकती हैं। वैसे तो कई स्कूलों में भी कोडिंग और रोबोटिक्स प्रोग्राम चलाए जाते हैं जिससे बच्चों की ग्रूमिंग (बच्चों को पढ़ाने में मदद करेंगे ये एप्स) अच्छी हो लेकिन हर स्कूल में अगर यह प्रोग्राम नहीं है तो आप इन बच्चों को बाहर से कोडिंग की क्लासेस करवा सकते हैं।

 

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बच्चों का ब्रेन तो शार्प होता ही है साथ ही वह किसी प्रॉब्लम को कैसे सॉल्व करना है यह भी सीख जाते हैं किसी भी प्रॉब्लम को छोटे-छोटे पार्ट्स में बांट कर सॉल्व करना और इसे प्रोसेस करना कोडिंग के जरिए बच्चे आसानी से सीखते हैं। ऐसे बहुत से ऐप और इंस्टीटूट्स हैं जहां कोडिंग प्रोग्राम चलाए जाते हैं। ख़ासतौर पर जूनियर क्लास के बच्चों के लिए इसका बहुत चलन है। इसमें 5 साल की आयु से लेकर 14 साल तक के बच्चे पार्टिसिपेट कर सकते हैं। 

अबेकस क्लासेज 

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आजकल के पेरेंट्स की सबसे बड़ी टेंशन होती है अपने बच्चे को मैथ्स पढ़ाना। मैथ्स एक ऐसा सब्जेक्ट है जो हर बच्चा बहुत मुश्किल से समझ पाता है और ये बात पैरेंट्स की चिंता को और ज्यादा बढ़ा देती है क्योंकि बच्चे की जब मैथ्स स्ट्रांग होती है तो वो और भी सब्जेक्टर आसानी से पिकअप करता है। मैथ्स से बच्चों का एनालिटिकल माइंड भी विकसित और ब्रेन भी शार्प होता है। अबेकस क्लासेज में बच्चों को मैथ्स की कैलकुलेशन के शॉर्टकट सिखाए जाते हैं जिसमें एडिशन, सब्सट्रैक्शन, मल्टीप्लिकेशन, डिविजन यह सब कैसे बहुत आसानी से किया जाए शामिल होता है।

मैथ्स को सिंपल बनाने का फार्मूला है अबेकस। यह कोई नया आविष्कार नहीं है, बल्कि बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। अबेकस को पहली कैलक्युलेटिंग डिवाइस भी कहा जाता है। अबेकस में एक बीडस से बनी किट होती है, जिसे सीखकर आपका बच्चा फिंगर टिप्स से किसी भी तरह की बड़ी से बड़ी कैलकुलेशन चुटकियों में कर सकता है। 

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इन क्लासेज में यू केजी से लेकर सातवीं कक्षा तक के बच्चे कैलकुलेशन सीख सकते हैं। सीखने के लिए 3 लेवल होते हैं- सुपर जूनियर, जूनियर और सीनियर। ऐसा माना जाता है कि अबेकस सीखने के बाद बच्चा एक लाइट कैलकुलेटर की तरह प्रतिस्पर्धा में भाग लेता है और कठिन से कठिन कैलकुलेशन को भी चुटकियों में सॉल्व कर देता है। अगर आपका बच्चा भी मैथ्स से डर रहा है तो उसे आज ही ये क्लास ज्वाइन करवा सकते हैं इससे उसका ब्रेन बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाएगा और मेमोरी शार्प हो जाएगी। यह सब चीजें बच्चे के कॉन्फिडेंस लेवल को बढ़ा देंगे।  

आप भी अपने बच्चे के भविष्य के लिए परेशान हैं तो परेशान होने की जगह उसे कुछ स्मार्ट लर्निंग कोर्सेस कराएं जिससे वो एक्टिव और शार्प माइंडेड बन सके ।

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