एक नन्हीं सी जान जब दुनिया में आती है तो वह अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए अपनी मां पर ही निर्भर होती है। यहां तक जन्म के बाद एक-दो साल तक वह बोलकर अपनी किसी भी परेशानी को बयां नहीं कर सकते। हालांकि ऐसा नहीं है कि वह खुद को अभिव्यक्त नहीं करते, बस उनकी अभिव्यक्ति का तरीका दूसरा होता है। कभी हंसकर तो कभी रोकर छोटे बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। ऐसे में मां के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह नन्हें से शिशु के इशारों को समझे। अगर मां बच्चे के इशारों को सही तरह से नहीं समझ पाती तो उससे परेशानी बच्चे को उठानी पड़ती है। मसलन, कभी बच्चा रोता है तो यही समझा जाता है कि उसे भूख लगी है। लेकिन कई बार बच्चे के पेट में या अन्य जगह दर्द होने या तबियत खराब होने पर भी वह रोता है या फिर उसे गर्मी लगे तो भी वह रोकर व्यक्त करता है। ऐसे में उसके रोने को सिर्फ उसकी भूख से जोड़ना सही नहीं है। अगर आप भी बच्चे के इशारों को गहराई से समझना चाहती हैं तो इस लेख को अवश्य पढ़ें। इसके बाद बच्चे को समझना आपके लिए काफी आसान हो जाएगा-

रोना

जन्म के बाद शुरूआती चार महीनों में शिशु अपनी अधिकतर अभिव्यक्ति रोने के जरिए ही करता है। ऐसे में आप उसके रोने से यह सुनिश्चित करना कठिन होता है कि वह भूखा रो रहा है या उसे दर्द हो रहा है या फिर अन्य कोई परेशानी है। ऐसे में आप उसके रोने के तरीके पर गौर करें। मसलन, अगर बच्चा काफी देर से अकेला है और वह चाहता है कि कोई उसे आकर उठाए तो ऐसे में बच्चा करीबन 5-6 सेंकड के लिए लगातार रोता है और फिर करीबन बीस सेंकड के लिए रूक जाता है, जैसे वह इंतजार कर रहा हो कि उसका रोना सुनकर कोई उसके पास आएगा। अगर तब भी माता-पिता नहीं सुनते तो बच्चा यही प्रक्रिया दोबारा दोहराता है। 

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इसी तरह अगर बच्चा भूखा तो वह शुरूआत में पहले की तरह रूक-रूककर रोता है, लेकिन धीरे-धीरे भूख बढ़ने के साथ उसका रोना और अधिक तेज हो जाता है। हो सकता है कि इस दौरान बच्चा अपने सिर को घुमाएं या मुंह से तरह-तरह की आवाज निकाले।

अगर किसी तरह के दर्द के कारण बच्चा रोता है तो यह बहुत तेज और लगातार होता है। दर्द बढ़ने पर उनका रोना भी काफी तीव्र हो जाता है। वहीं, अगर बच्चा बीमार है तो दर्द होने पर उनका रोना काफी मोनोटोनस होता है या हो सकता है कि वह रोए ही नहीं, क्योंकि बीमारी के चलते उनके पास रोने के लिए शक्ति नहीं बचती।

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वहीं, जब बच्चा सोना चाहता है लेकिन किसी कारणवश सो नहीं सकता है, तो उनके रोने की आवाज काफी अलग होती है। कई बार बच्चा रोते हुए जम्हाई भी लेता है या फिर अपने आंख और कान को रगड़ता है। 

अगर बच्चा किसी असहजता के कारण रोता है तो उसकी आवाज में एक चिड़चिड़ापन महसूस होता है। ऐसे में बच्चा रूक-रूककर रोता है। ऐसे में जरूरत है कि आप उनका डायपर चेक करें। कई बार बच्चे कपड़ों में अधिक गर्मी या सर्दी लगने पर भी रोते हैं। 

कई बार बच्चे इसलिए भी रोते हैं क्योंकि वह एक ही जगह लेट उब जाते हैं और वह थोड़ा बाहर घूमना चाहते हैं।

सिर घुमाना

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वैसे रोने के अतिरिक्त भी उनकी बॉडी लैंग्वेज काफी कुछ बयां करती है। आप उनके हावभावों को भी समझकर उनके मन की बात जान सकती हैं। जैसे अगर बच्चा सिर को घुमाता है तो इसका अर्थ है कि वह सोना चाहता है या फिर वह किसी अनजान आदमी के आसपास होने पर भी ऐसा करता है। 

पैर उठाना

अगर बच्चा पैर उठाता है तो यह संकेत हो सकता है कि उसके पेट में दर्द हो रहा हो। अक्सर बच्चे अपने पेट को आराम देने के लिए ऐसा करते हैं।

बांहों को मरोड़ना

अक्सर छोटे बच्चे डरने पर अपनी बांहों को मरोड़ते हैं। अचानक तेज रोशनी या तेज आवाज उन्हें डरा देती है और फिर वह ऐसा करते हैं। इस स्थिति में उन्हें रिलैक्स करना बेहद आवश्यक है। 

मुट्ठी बंद करना

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यह भूख का संकेत है। अगर आप बच्चे को ऐसा करते हुए देखती हैं तो आप उन्हें भूखे होने के कारण रोने से रोक सकती हैं।

कमर मोड़ना  

2 महीने से कम उम्र के बच्चे अक्सर दर्द होने पर ऐसा करते हैं। लेकिन अगर बच्चा खाना खाने के बाद यह मूवमेंट करे तो इसका अर्थ है कि उनका पेट भर गया है। वहीं दो महीने से अधिक उम्र के बच्चे थकान होने या मूड खराब होने पर भी कमर मोड़कर प्रतिक्रिया देते हैं। 

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कान पकड़ना

अधिकतर मामलों में बच्चा अपनी बॉडी को एक्सप्लोर करने के लिए ऐसा करता है। लेकिन अगर बच्चा बार-बार कान पकड़कर रोए या फिर यह गतिविधि कई बार करे तो उस समय बाल विशेषज्ञ को एक बार जरूर दिखाना चाहिए।