20 सितंबर से पितृ पक्ष आरंभ हो चुके हैं। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का बहुत अधिक महत्व है। इन दिनों सभी हिंदू परिवारों में पितरों की पूजा की जाती है और उन्‍हें तर्पण दे कर उनकी आत्मा को तृप्त किया जाता है। मगर क्‍या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि तर्पण इतना महत्वपूर्ण क्यों होता है? 

इस विषय पर हमने एस्ट्रोलॉजर डॉक्टर शेफाली गर्ग से बात की है। शेफाली जी बताती हैं, ' किसी प्यासे को जब पानी पिलाया जाता है और उसकी आत्मा तृप्त हो जाती है, तब वह आपको दिल से दुआ देता है। इसी तरह जब आप अपने पितरों को तर्पण देते हैं तो इसका अर्थ है उन्हें जल ऑफर करना होता है। आपके द्वारा दिए गए तर्पण से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और वह आपको आशीर्वाद देते हैं।'

शेफाली जी तर्पण के महत्व के साथ-साथ तर्पण देने के सही विधि और शुभ समय भी बताती हैं- 

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तर्पण देने की विधि 

शेफाली जी कहती है, 'तर्पण की विधि बहुत ही आसान है। केवल जल, तिल और फूल के साथ आप अपने पूर्वजों को तर्पण दे सकते हैं।' वह इसकी विधि बताती हैं- 

  • तर्पण देने के लिए बेस्‍ट है कि आप एक तांबे का लोटा ले लें। तांबे का लोटा नहीं हैं तो स्टील का लोटा भी चलेगा, मगर प्लास्टिक के बर्तन का इस्तेमाल पूजा-पाठ (पूजा पाठ के दौरान इन बातों का रखें ध्‍यान) में नहीं होता है। इसलिए पूर्वजों को प्लास्टिक के ग्लास से जल अर्पित न करें। 
  • पानी साफ-सुथरा पीने लायक ही होना चाहिए। जाहिर है, आप जो पानी खुद पी सकते हैं वहीं दूसरों को भी ऑफर करेंगे। खासतौर से अपने पूर्वजों को हर चीज उनकी पसंद की और साफ-सुथरी ही ऑफर करनी चाहिए। 
  • तर्पण देने के लिए पानी में काले तिल और गुलाब की फूल जरूर डाल लें। तिल को हिंदू धर्म में बहुत ही शुद्ध और पवित्र माना गया है। 
  • हमेशा तर्पण देते वक्त आपका मुंह दक्षिण दिशा में ही होना चाहिए। जब भी आप पूर्वजों का तर्पण करें तो उन्हें साथ ही मिलने के लिए आमंत्रित भी करें। ऐसा करने के लिए आप 'ॐ आगच्छन्तु में पितर एवं ग्रहन्‍तु जलान्‍जलिम' मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का अर्थ है कि 'हे पितरों जल ग्रहण करें और हमसे मिलने के लिए पधारिये।'
  • इतना ही नहीं, आपको पिता को 3 बार जलांजलि देनी चाहिए और बाबा को भी 3 बार जल अर्पित करें। वही मां का स्थान सर्वोच्च होता है इसलिए दक्षिण दिशा में 14 बार उन्‍हें जलांजलि दें। 
 
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किस मुहूर्त में दें जलांजलि 

हिंदू धर्म में हर काम को करने का एक निश्चित समय या शुभ मुहूर्त होता है। देवों को जल अर्पित करने के लिए शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त का जिक्र किया गया है। वहीं शाम के वक्त तंत्र विद्या और अलग तरह की शक्तियों को शांत करने के लिए तर्पण किया जाता है। पूर्वजों को अभिजीत मुहूर्त में ही जलांजलि देनी चाहिए। शेफाली जी कहती हैं, 'हिंदू धर्म में हर काम के लिए समय निर्धारित है। ऐसे में ब्रह्म मुहूर्त (क्‍या होता है ब्रह्म मुहूर्त जानेंदेवताओं के लिए है और शाम के वक्त अलग तरह की शक्तियों को जल अर्पित किया जाता है। इसलिए अभिजीत मुहूर्त ही बचता है, जो हम अपने पूर्वजों को दे सकते हैं।'

शेफाली जी इस बात पर भी प्रकाश डालती हैं कि पूर्वजों का तर्पण करना क्यों जरूरी है। वह कहती हैं, 'देवशयनी एकादशी पर सभी देव सो जाते हैं और फिर 4 माह बाद देवोत्थानी एकादशी पर सोए हुए देवताओं को उठाया जाता है। मगर यह प्रोसेस गणेश चतुर्थी से ही शुरू हो जाता है। गणेश जी को देवताओं में सबसे पहले पूजा जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी आती है और 11 दिन गणपति जी की पूजा की जाती है। इसके बाद पूर्वजों का स्थान होता है। इसलिए पितृ पक्ष का महीना आता है और 15 दिन पितरों का पूजन किया जाता है। इस दौरान ब्राह्मण भोज और तर्पण को बहुत ही महत्व दिया जाता है। पूर्वजों के बाद माता का स्थान प्रथम होता है। इसलिए नवरात्रि में नव दुर्गा की पूजा होती है। इसके बाद धीरे-धीरे करके सभी देवता जागना शुरू हो जाते हैं।' इस तरह से देखा जाए तो गणेश जी के बाद सभी देवी-देवताओं से पूर्व पूर्वजों को महत्व दिया जाता है। 

उम्मीद है कि अब आप समझ चुके होंगे कि तर्पण देने का महत्‍व क्‍या है और इसे किस तरह दिया जाना चाहिए। यदि आप और भी धर्म-अध्यात्म से जुड़ी बातें जानना चाहते हैं, तो हरजिंगदी को फॉलो जरूर करें। 

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