जब हम प्रेम की परिभाषा के बारे में बात करते हैं, तो जहन में केवल एक ही तस्वीर उभरती है जो है श्री राधा-कृष्ण की। हमनें दोनों के प्रेम प्रसंग से जुड़ी अनेकों कथाएं सुनी हैं। मगर सार जग इस बात को भी जानता है कि श्री राधा रानी भगवान श्री कृष्ण की कभी धर्मपत्नी नहीं बन पाई थीं। हालांकि, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार ब्रह्म देव ने स्वयं राधा-कृष्ण का विवाह कराया था। मगर और किसी भी वेद-पुराण में इस बात के साक्ष नहीं मिलते हैं। 

वेद-पुराणों और साहित्य पर विश्वास किया जाए तो श्रीकृष्ण की 8 रानियां थीं, जिनसे उन्होंने विधिपूर्वक विवाह किया था और इन 8 रानियों में सबसे पहली रानी रुक्मिणी देवी थीं। देवी रुक्मिणी और श्रीकृष्ण की शादी की कथा बेहद रोचक है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर श्रीकृष्ण और रुक्मिणी मिले कैसे थे और कैसे दोनों का विवाह हुआ था। 

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कौन थीं देवी रुक्मिणी? 

विदर्भ राज्य के राजा भीष्मक के एक पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्र का नाम रुक्‍मी और पुत्री का नाम रुक्मिणी था। राजा भीष्मक अपनी पुत्री से बहुत प्रेम करते थे और उनके विवाह के लिए योग्य वर की तलाश में थे। इस विषय में राजा भीष्मक के सबसे करीबी मित्र एवं महाभारत कालीन मगध राज्य के नरेश जरासंध को भी पता था। जरासंध को उस वक्त का शक्तिशाली राजा माना जाता था और ऐसा भी कहा जाता था कि जरासंध का वध कोई नहीं कर सकता है। जरासंध देवी रुक्मिणी को अपनी पुत्री जैसा ही मानते थे और इसलिए वह खुद भी रुक्मिणी के लिए योग्य वर की तलाश में थे। मगर रुक्मिणी के मन में शुरू से ही भगवान श्रीकृष्ण की छवि बसी हुई थी। बड़े-बड़े महारथी को परास्त करने वाले श्रीकृष्ण की कथा रुक्मिणी कई लोगों के मुंह से सुन चुकी थीं। देवी रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण के विषय में सुनकर ही यह तय कर लिया था कि वह उन्हीं से विवाह करेंगी। 

मथुरा के राजा कंस को झटके में ढेर करने के बाद तो श्रीकृष्ण की ख्‍याती और भी बढ़ गई थी। उनकी वीरता के चर्चे चौतरफा गूंज रहे थे। मगर वहीं श्रीकृष्ण ने कंस का वध करके बहुत से राज्यों को अपना दुश्मन भी बना लिया था, जिसमें से एक था मगध का राजा जरासंध। दरअसल, कंस जरासंध का दामाद था और इसलिए वह श्रीकृष्ण से घृणा करता था। 

जब जरासंध को इस विषय में ज्ञात हुआ कि रुक्मिणी को श्रीकृष्ण से प्रेम है , तो देवी रुक्मिणी के भाई रुक्‍मी  के साथ मिलकर जरासंध ने छेदी नरेश शिशुपाल के साथ रुक्मिणी का विवाह तय कर दिया। मगर विधि को तो कुछ और ही मंजूर था, इसलिए यह विवाह कभी हो ही नहीं सका। 

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श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की प्रेम कथा 

रुक्मिणी ने अपने पिता को यह बात पहले ही बता दी थी कि वह विवाह केवल श्रीकृष्‍ण से ही करेंगी क्योंकि वह मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी हैं। ऐसे में रुक्मिणी के पिता ने भी उन्हें सहयोग देने की ठान ली। मगर जरासंध और देवी रुक्मिणी के भाई को जैसे ही इस बात की भनक लगी उन्होंने राजा भीष्मक और राजकुमारी देवी रुक्मिणी को कारागार में डाल दिया। 

कारागार में बंदी बने हुए ही देवी रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण की सखी एवं बरसाने की रानी देवी राधा को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके पिता को बंधक बना लिया गया है और वह चाहती हैं कि श्रीकृष्ण उन्हें बचाने के लिए स्वयं विदर्भ राज्य पधारें। 

श्री राधा रानी को जब यह पत्र मिला तो उन्होंने स्वयं श्रीकृष्‍ण से देवी रुक्मिणी की मदद करने का आग्रह किया। इस बात से श्रीकृष्‍ण पहले ही वाकिफ थे कि देवी रुक्मिणी को यदि वह बचाने गए तो उन्हें उनसे विवाह भी करना पड़ेगा। मगर सखी राधा के आग्रह पर उन्‍हें विवशतापूर्वक देवी रुक्मिणी को बचाने के लिए जाना पड़ा। 

श्रीकृष्‍ण जब विदर्भ देश पहुंचे तो वहां देवी रुक्मिणी का स्वयंवर चल रहा था। कृष्ण और देवी रुक्मिणी के भाई रुक्मी के बीच भयानक द्वंद्व हुआ। लोक कथाओं के अनुसार श्रीकृष्‍ण ने रुक्‍मी का वध करने के लिए अपना सुदर्शन भी उठा लिया था मगर देवी रुक्मिणी के आग्रह पर उन्होंने रुक्‍मी को छोड़ दिया भरी सभा में देवी रुक्मिणी को अपहरण कर उन्हें अपने साथ ले गए। 

रुक्मिणी तो पहले ही श्री कृष्‍ण से प्रेम करती थीं और मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी थीं। इस बात को श्रीकृष्ण भली भांति समझते थे और इसलिए अपहरण के बाद जब वह श्रीकृष्ण का रथ गुजरात राज्‍य के छोटे से गांव 'माध्‍वपुर घे' पहुंचा , तो वहां श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मणी से विवाह कर लिया। आपको बता दें कि आज भी माधोपुर में 'माधवराय जी मंदिर' है, जहां हर वर्ष आज भी रामनवमी के अवसर पर विशेष मेले का आयोजन किया जाता है। रुक्मिणी से विवाह के बाद श्रीकृष्‍ण उन्हें अपनी द्वारका नगरी ले गए, जहां उनका धूमधाम से स्वागत किया गया। 

कृष्ण-रुक्मिणी से जुड़ी अन्य कथा 

पद्म पुराण के मुताबिक देवी रुक्मिणी पूर्व जन्म में एक ब्राह्मणी थीं। बचपन में ही उनका विवाह हो गया था और युवावस्था में ही वह विधवा हो गई थी । पति को खोने के बाद ब्राह्मणी भगवान विष्णु की पूजा में समय बिताने लगी। ब्राह्मणी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा, तब ब्राह्मणी ने अगले जन्म में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की पत्नी बनने की इच्छा जताई। इस तरह रुक्मिणी के अवतार में ब्राह्मणी को श्रीकृष्‍ण की पत्‍नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

नोट- अलग-अलग वेद-पुराणों में श्रीकृष्ण की प्रेम लीलाओं, विवाह और उनके अस्तित्‍व पर अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। लेख में बताई गई श्रीकृष्ण-रुक्मिणी प्रेम कथा का विवरण हमें जिन संदर्भों से प्राप्त हुआ है, उन्हें हमने लेख के अंदर ही उल्‍लेखित भी किया है। हो सकता है कि अलग पुराणों में किसी अलग कथा का विवरण आपको मिल जाए। 

 

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