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जानिए अल्फाबेटिक ऑर्डर में क्यों नहीं होते की-बोर्ड के लेटर्स

की-बोर्ड में एल्फाबेट लेटर्स कभी भी सही ऑर्डर में नहीं होते। लेकिन क्या आप जानती हैं कि इसके पीछे की क्या वजह होती है।
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  • Mitali Jain
  • Editorial
Published -06 Aug 2022, 11:14 ISTUpdated -06 Aug 2022, 11:14 IST
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logic behind keyboard alphabet layout

कंप्यूटर आज के समय में हर किसी की जरूरत बन चुका है। बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी को अपने प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए कंप्यूटर या लैपटॉप की आवश्यकता होती है। आप भी हर दिन लैपटॉप पर अपना ऑफिस वर्क करती होंगी और आपने देखा ही होगा कि कंप्यूटर के की-बोर्ड पर लेटर्स अल्फोबेटिक ऑर्डर में नहीं लिखे होते हैं। आप चाहे किसी भी ब्रांड का लैपटॉप खरीद लें, उसके की-बोर्ड का साइज अलग हो सकता है, लेकिन अल्फाबेट्स को लिखने का पैटर्न एक जैसा ही होता है।

हालांकि, इन्हें देखकर क्या कभी आपके मन में यह सवाल उठा है कि की-बोर्ड में इन्हें ऐसे क्यों सेट किया गया है। अगर चाहते तो मेकर्स अल्फाबेटिक ऑर्डर में भी लेटर्स सेट कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। दरअसल, इसके पीछे एक खास वजह है। तो चलिए आज इस लेख में हम आपको इस खास वजह के बारे में बता रहे हैं-

पहले अल्फाबेटिक पैटर्न में थे लेटर्स

आपने हमेशा से ही की-बोर्ड में एक अलग पैटर्न में लेटर्स को देखा होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि यह पैटर्न हमेशा से ही नहीं था। टाइपिंग कीपैड में लेटर्स का यह पैटर्न जो आज हमारे पास है वह लगभग डेढ़ सदी पुराना है। जब टाइपिंग की शुरुआत हुई थी, उस समय अल्फाबेटिक पैटर्न में लेटर्स को लिखा जाता था। पुराने दिनों में टाइपराइटर मशीनों में अल्फाबेटिक पैटर्न में लेटर्स सेट थे। लेकिन बाद में इनके पैटर्न को बदल दिया गया।

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खास वजह से बदला गया था लेटर्स का पैटर्न

keyboard

यूं तो टाइपराइटर मशीनों में अल्फाबेटिक पैटर्न में लेटर्स थे और इन्हें इस्तेमाल करना भी बेहद आसान था। लेकिन फिर भी इन्हें बदलने की जरूरत महसूस हुई। दरअसल, उस समय मशीनों की स्पीड बहुत तेज नहीं थी। जबकि अल्फाबेटिक पैटर्न में लेटर्स होने के कारण इन पर काम करने वालों की स्पीड मशीन से कहीं अधिक होती थी।

अल्फाबेटिक पैटर्न को याद रखने की जरूरत नहीं थी, जिससे उनकी स्पीड खुद ब खुद अधिक होती थी। इस स्थिति में तेजी से टाइप करने से लेटर्स जोर से दब जाते थे और वह खराब हो जाते थे। जिससे इन्हें बदलवाना पड़ता था और इसमें काफी खर्चा आता था।(ऐसे करें लैपटॉप की सफ़ाई)

इतना ही नहीं, बहुत अधिक स्पीड में टाइप करने के कारण जब मशीन उस गति से काम नहीं कर पाती थी, तो ऐसे में कई तरह के टाइपिंग की गलतियां होती थीं। ऐसे में टाइपराइटर के निर्माताओं ने यह महसूस किया कि पूरी तरह से एक नया कीबोर्ड तैयार किया जाए, जहां टाइपिस्टों की स्पीड को स्लो करने के लिए की-बोर्ड के लेटर्स को फिर से सेट किया जाए।

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QWERTY कीबोर्ड किया गया तैयार

querty keyboard

इसके बाद QWERTY कीबोर्ड तैयार किया गया। जिसमें लेटर्स को एक अलग तरह से तैयार किया गया। इसे सेट करते समय कीबोर्ड पर सबसे अधिक बार उपयोग किए जाने वाले अक्षरों को समान रूप से स्थान देने का निर्णय लिया गया था। इससे टाइपराइटर के लिए उन्हें इस्तेमाल करना आसान हो, साथ ही उनकी स्पीड भी कुछ हद तक कम हो जाए।(लैपटॉप डाटा रिकवर करने की ट्रिक्स)

धीरे-धीरे टाइपराइटर को इस्तेमाल करने का चलन खत्म हो गया और उनकी जगह कंप्यूटर व लैपटॉप ने ले ली। लेकिन इसके बाद भी मेकर्स ने इसी तरह से की-बोर्ड को सेट रखा। वर्तमान में, भले ही बटन के खराब होने की संभावना ना के बराबर होती है, लेकिन फिर भी इसी पैटर्न को फॉलो किया जाता है। यहां तक कि फोन व टीवी में भी यही पैटर्न रखा जाता है।

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तो अब इस लेख को पढ़ने के बाद आपको भी अपने सवाल का जवाब मिल ही गया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

Image Credit- freepik 

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