Entry-9 

हेलो! कैसे हैं आप सब लोग? मेरी डायरी के अंक पढ़ने के लिए और मुझे सुझाव देने के लिए आपको बड़ा सा थैंक्यू!

मनोरमा अत्तरी, जूही मिश्रा, सुलोचना मेश्राम, आरोही सैनी...मैंने कितनी सारी नयी दोस्त बनाई हैं!

जब मैं नौकरी छोड़ने की बात सोच रही थी तो आप सब की बातों ने मेरा मार्गदर्शन किया। 

मनोरमा जी ने मुझे लिखा "जिंदगी में छोटी-मोटी बातें होती ही रहेगी, पर आप उसे अनदेखा कीजिए, और घर और ऑफिस अपना बेस्ट दीजिए"

वहीं आरोही का यह कहना कि "आई एम प्राउड ऑफ यू" मुझे बहुत अच्छा लगा!

और हां, जब मैं कन्फ्यूज्ड थी कि गिरीश से मिलने जाऊं या नहीं, तब भी आप सब ने मेरा बहुत साथ दिया। आप सब के कहने पर मैं गिरीश से मिली और मुझे एहसास हुआ कि मेरे लिए मेरा आत्मसम्मान और मेरी पहचान कितनी ज़रूरी हैं।

और पिछले अंक में जब मैंने आपसे पूछा कि दादी को सब सच बता दूं, तो आप की राय यही रही की, झूठ बोलना ठीक नहीं होगा। तो ठीक हैं फिर, दादी अगर पूछेगी तो मैं सब सच-सच कह दूंगी कि मम्मी गई हैं सुरभि भाभी से मिलने और करवाचौथ के लिए सरगी देने। शायद ये बताने से कि सुरभि भाभी मां बनने वाली हैं, दादी का दिल पसीज जाए।

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चाय तो मैंने चढ़ा दी है। शाम के छह बजने को आये हैं और मम्मी का कोई अता-पता नहीं है। दादी संध्या की पूजा करने तक तो बिजी रहेंगी। और फिर उनको याद अपनी सुषमा, यानि की मम्मी आएगी।

"सुसमा!" दादी ने आवाज़ लगाई, "चाय मिलेगी आज या नहीं?"

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"मैं ला रही हूं दादी!"

सुंदर सी ट्रे में एक कप सजाकर, साथ में दाल-मोठ और रस्क लिए, मैं दादी के पास बैठ गई। दादी अभी पूजा करके उठी थीं, तो प्यार से आशीर्वाद का हाथ मेरे साथ पर रख दिया।

वाह! लगता हैं दादी का मूड सही था! बच गई आरती!

"दादी, लो चाय पियो" मैंने लाड में कहा

दादी ने एक नज़र चाय के कप को देखा और फिर कड़क कर पूछा

"सुसमा कहां हैं? चाय वो क्यों नहीं लाई?"

"दादी, तुम चाय पियो तो सही, मम्मी से बेहतर बनाई हैं मैंने"

"कुछ आता हैं तुझे? चाय बनाई हैं! इतना भी नहीं पता कि मैं चाय चीनी-मिट्टी के कप में नहीं बल्कि अपने स्टील के गिलास में पीती हूं।"

अरे यार! ये बेकार की गलती कर दी मैंने! सच में, मैं तो भूल ही गई थी कि दादी को चीनी-मिट्टी के कप का वहम है। किसी ने उनके सामने इसे 'बोन चाइना' का कप बता दिया था। तब से उन्हें लगता हैं कि कप हड्डियों से बना हैं!

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"ओह, सॉरी-सॉरी दादी, मैं अभी इसे गिलास में डालकर ले आती हूं!"

"बेवकूफ़ हैं क्या तू? इस हड्डियों के प्याले की चाय को तो अब तू गिलास में डाल या अपने सर पर, मैं नहीं पियूंगी! सुसमा को भेज! है कहां वो?"

इससे पहले वाले मूड में पूछतीं तो शायद साफ़-साफ़ बता भी देती, अब कैसे बोलूं?

"दादी मैं नई चाय बनाकर ले आती हूं।" 

ये कहकर मैं जल्दी से किचन में घुस गई।

एक हाथ से गैस पर चाय का पानी रखा, दूसरे से फ़ोन मिलाया।

"हेलो! हां मम्मी...कब तक पहुंच रही हो?"

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"आरती! सुरभि की हालत अचानक बिगड़ गई हैं, हम इससे अस्‍पताल ले कर जा रहे हैं। तेरे पापा भी वहीं पहुंच रहे हैं। माता जी को तुझे ही संभालना होगा" मम्मी की डरी हुई सी आवाज़ फ़ोन के उस तरफ से आई।

"ओह..अच्छा कोई नहीं, आप यहां की चिंता मत करो...भाभी का ध्यान रखो"

भगवान! अब क्या होगा?

मैंने इस बार तुलसी, अदरक डालकर बहुत ध्यान से चाय बनाई। दादी के गिलास को धोकर और चमकाकर, उसमें चाय डालकर मैं उनके पास जा रही थीं कि दादी किचन मैं ही आ गई।

"बता क्यों नहीं रही कि सुसमा कहां हैं?" दादी के चेहरे पर अब गुस्सा कम था, फ़िक्र ज़्यादा।

"मैं बता तो रही हूं, आप बैठो तो सही, लो चाय पियो।"

"आरती, बता दे, सब ठीक हैं न? "दादी को मम्मी के लिए इतनी चिंता हैं, बाहर से गुस्सा दिखाती हैं, दादी के मन में प्यार तो है।

"हां दादी, मम्मी ठीक हैं। पर भाभी को अस्पताल ले जा रहे हैं।" मैंने हिम्मत करके बोल ही दिया।

"क्या हुआ सुरभि को?" कहां मैं सोच रही थीं कि दादी भाभी का नाम भी अपनी जुबां से नहीं लेंगी, और कहां दादी चिंता से आधी हो गई थीं।

"दादी वो प्रेगनेंट है न, तो कुछ कम्प्लीकेशन हो गई थीं तो उनको अस्‍पताल ले जाना पड़ रहा हैं"

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"सुरभि पेट से है? तुझे किसने बोला? सुसमा को भी पता है? मुझे किसी ने नहीं बताया। और अब उसकी इतनी तबियत ख़राब हैं कि अस्पताल ले जाना पड़ रहा हैं, ये भी किसी ने मुझे बताने की नहीं सोची।" गुस्सा नहीं था दादी को, ऐसा लग रहा था कि बेचारी का दिल टूट गया।

"दादी...वो सब डर रहे थे.."

"ऋषभ ने भी मुझे नहीं बोला, मैं अपने पोते की ख़ुशी देखकर क्या खुश ना होती...परदादी बन रही हूं...ये ख़ुशी तुम लोग मुझे नहीं देना चाहते..."दादी खड़ी हो गई। बड़बड़ाते हुए उठीं और साड़ी कस ली, दरवाज़े के पास जाकर अपनी चप्पलें पहनकर खड़ी हो गईं।

"दादी, कहां जा रही हो?" मैंने कन्फ्यूज्ड होकर पूछा

"जा रही हो नहीं, हम चल रहे हैं। अस्पताल, चल जल्दी।" दादी इस समय कुछ और नहीं सुनाने वाली, ये तो मैं जानती थीं। पर क्या मुझे दादी को हॉस्पिटल लेकर जाना चाहिए? कहीं अस्पताल में दादी ने गुस्सा करना शुरू किया तो क्या होगा? और न भी किया तो क्या सुरभि भाभी ऐसी हालत में दादी से मिलना चाहेगी?

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पता नहीं, आप ही बताइये, क्या दादी को अस्पताल जाना चाहिए? या भाभी की तबियत संभल जाने के बाद आराम से भाभी और ऋषभ भैया से बात करनी चाहिए? मुझे आपके सुझाव का इंतज़ार रहेगा। इस लिंक पर क्लिक करके कमेंट करें। 

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