साल का सातवां महीना यानि जुलाई, इतिहास की कई छोटी बड़ी घटनाओं के लिए फेमस है। इस महीने का नौंवा दिन भारतीय सिनेमा के लिए काफी बड़ा दिन है। इस दिन वर्ष 1925 में वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण, जिन्हें गुरु दत्त के नाम से जाना जाता है, का जन्म हुआ था। हिंदी सिनेमा में यह बहुत बड़ा नाम हैं। आप यूं समझ लें कि आज भी हर डायरेक्टर इस नाम की भभूत माथे पर सजा कर ही किसी फिल्म का श्री गणेश करता है। भारतीय सिनेमा में गुरु दत्त की  फिल्म प्यासा और कागज के फूल को 100 बेस्ट फिल्म में से एक माना गया है। गुरु दत्त अपनी प्रोफेशनल लाइफ में जितने कामयाब थे उतने ही पर्सनल लाइफ में असफल। उन्होंने जिससे प्यार किया वह उन्हें मिल कर भी नहीं मिल पाई। उनका बसा बसाया घर न किसकी नजर लगने से उजड़ गया। हम बात कर रहे हैं गुरुदत्त की वाइफ गीता दत्त की। चलिए दोनों की प्रेम कहानी की दुखद घटनाएं आपको बताते हैं। 

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कैसे शुरू हुई लव स्टोरी 

गुरु दत्त पहले एक स्कूल में पढ़ाते थे फिर उन्होंने बैंक में भी नौकरी की। मगर, उनका रुझान फिल्मों की ओर था। इसलिए वर्ष 1944 में उन्होंने फिल्म चांद में अभिनय कर फिल्मी करियर की शुरूआत की। मगर, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। गुरु दत्त पर देव आनंद की नजर पड़ी और उन्होंने 1951 में फिल्म बाजी के डायरेक्शन के लिए उनसे कहा। वह भी तैयार थे। गुरु दत्त के जीवन में इस फिल्म ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। जहां एक तरफ उनके करियर को बूस्ट मिला वहीं फिल्म की सिंगर गीता रॉय से उन्हे मोहब्बत हो गई। 

कैसे हुई शादी 

गीता के घर वाले गुरु दत्त को बिलकुल भी पसंद नहीं करते थे। बावजूद इसके मई 26, 1953 में दोनों ने शादी कर ली। गुरु दत्त की बहन ललिता लाजमी ने एक मीडिया पब्लीकेशन हाउस को इंटरव्यू के दौरान बताया था, ‘दोनों शादी के बाद बहुत खुश रहते थे। उनके तीन बच्चे हुए तरुण दत्त, अरुण दत्त और नीना दत्त थे। मगर, बच्चों के बाद जहां गीता घर के कामों में उलझ कर रह गईं वहीं गुरु दत्त भी अपने काम में लग गए।’

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क्यों हुई टकरार 

गुरु दत्त और गीता दत्त, दोनों ही शादीशुदा लाइफ में खुश थे मगर, वक्त को कुछ और ही मंजूर था। गुरु दत्त का नाम एक्ट्रेस वहिदा रेहमान से जुड़ने लगा। यह बात गीता के कानों में पड़ी तो दोनों की शादीशुदा जिंदगी में भूचाल आ गया। गीता बच्चों को लेकर अपने मायके चली गईं। बस यहीं से गुरु दत्त के जीवन में कठिनाइयां शुरू हुईं। गुरु दत्त की बहन ललिता लाजमी ने बताया था, ‘लोग वहिदा को गुरु दत्त और गीता की जिंदगी में तुफान लाने का जिम्मेदार मानते हैं। खुद गीत भी कहीं न कहीं गुरु दत्त पर वहिदा को लेकर शक करत थीं और इसी बात ने उन्हें गुरु दत्त से अलग कर दिया। जबकि वहिदा और गुरु दत्त के बीच कभी वैसे संबंध थे ही नहीं। गुरु दत्त केवल वहिदा को पसंद करते थे। इसमें प्यार कहां से बीच में आ गया था। यह किसी को नहीं पता। वहिदा को भी जब यह पता चला कि गुरु दत्त अपनी पत्नी से अलग हो गए और इसका कारण उन्हें माना जा रहा है तो वह भी गुरु दत्त से दूरियां बनाने लगीं। इतना ही नहीं गुरु दत्त इस वजह से अवसाद के शिकार हो गए थ। वह हमेशा आत्महत्या करने के सोचते थे। और हमेशा गीता और अपने बच्चों को याद करते थें। यहां तक कि जब दूसरी बार गुरु दत्त ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी तो वह 3 दिन के लिए कोमा में चले गए थे। वह जब कोमा से बाहर आए थे तो उन्होंने सबसे पहले जो नाम लिया था वह ‘गीता’ था।’

Guru Dutt Birthday

कैसे हुई डेथ 

ऐसा कहा जाता है कि जिस दिन गुरु दत्त ने दुनिया को अलविदा कहा उस दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था। उन्होनें गीता को फोन किया था और बच्चों से मिलने की बात भी की थी मगर, गीता ने उन्हें इंकार कर दिया था। ललिता लाजमी की मानें तो, ‘मैं मानती हूं कि गुरु दत्त ने कई बार खुदखुशी करने की कोशिश की थी। मगर, उस रोज वह काफी डिप्रेशन (जानें डिप्रेशन का इलाज )में थे। उन्हें नींद न आने की बीमारी भी हो गई थी। उस दिन गीता ने जब बच्चों से उन्हें मिलने नहीं दिया था तो वह और भी ज्यादा दुखी हो गए। उस दिन फिर बिना कुछ खाए ही गुरु दत्त ने खूब शराब पी और बाद में नींद न आने की वजह से नींद की गालियां खा लें। वह मरने के उद्देश्य से नहीं खाई गईं थी मगर, खालीपेट ऐसा करने से वह दुनिया से चल बसे।’

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गुरु दत्त के जाने के बाद गीता दत्त का क्या हुआ 

ललिता लाजमी के अनुसार, ‘दूसरे दिन गुरु दत्त की बेटी नीना ने कई बार अपने पिता को नींद से जगाने की कोशिश की। गीता भी मौजूद थीं। मगर, गुरु दत्त जिंदगी को अलविदा कह चुके थे। बाद में गीता ने बंगाली रिवाज के मुताबिक 10 दिन तक शोक मनाया और साल भर तक सफेद साड़ी भी पहनी। इसके बाद जब मैं उनसे मिली तब वह शराब की आदी हो चुकी थीं।’

गीता को गुरु दत्त की तरह ही शराब की आदत लग गई थी वह, बाथरूम और बुक शेल्फ में शराब की छोटी-छोटी बोतलें छुपा कर रखा करती थीं। अपने आखरी दिनों में वह पूरी तरह से आर्थिक संकट में फंस चुकी थीं। जुलाई 20, 1972 में वह भी दुनिया को अलविदा कह गईं।